फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Modern Bengali society is obliged to Ishwar Chandra Vidyasagar

महान शिक्षा शास्त्री की याद: आधुनिक बंगाली समाज पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भी कर्ज है

Sun, 29 Sep 2019 03:30 AM IST
शिवाजी प्रतिम बसु शिवाजी प्रतिम बसु
शिवाजी प्रतिम बसु Published by: शिवाजी प्रतिम बसु Updated Sun, 29 Sep 2019 03:30 AM IST
विज्ञापन
Modern Bengali society is obliged to Ishwar Chandra Vidyasagar
Ishwar chandra vidyasagar - फोटो : सोशल मीडिया

माता-पिता के ऋण की तरह आधुनिक बंगाली समाज पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भी कर्ज है। 19 वीं शताब्दी के मध्य से आज तक हम गौरव की दो कहानियां पतन के इस दौर में नहीं भूल पाए हैं। वे हैं- आधुनिक शिक्षा और आधुनिक समाज के संस्कार में हमारे पूर्वजों का गौरवशाली नेतृत्व। इन दोनों ही क्षेत्रों में विद्यासागर महाशय का योगदान ऐतिहासिक रहा है। करीब दो सौ वर्ष पहले 1820 में जब उनका जन्म हुआ था, तब शिक्षा संस्कार और बांग्ला भाषा के आधुनिकीकरण की दिशा में कोशिशें बेशक शुरू हो चुकी थीं, लेकिन उनमें किसी तरह का समन्वय नहीं था।


loader

माता-पिता के ऋण की तरह आधुनिक बंगाली समाज पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भी कर्ज है। 19 वीं शताब्दी के मध्य से आज तक हम गौरव की दो कहानियां पतन के इस दौर में नहीं भूल पाए हैं। वे हैं- आधुनिक शिक्षा और आधुनिक समाज के संस्कार में हमारे पूर्वजों का गौरवशाली नेतृत्व। इन दोनों ही क्षेत्रों में विद्यासागर महाशय का योगदान ऐतिहासिक रहा है। करीब दो सौ वर्ष पहले 1820 में जब उनका जन्म हुआ था, तब शिक्षा संस्कार और बांग्ला भाषा के आधुनिकीकरण की दिशा में कोशिशें बेशक शुरू हो चुकी थीं, लेकिन उनमें किसी तरह का समन्वय नहीं था।

शिक्षा के उद्देश्य, उसकी पद्धति और पाठ्यक्रम में भी बहुत फर्क था। सात दशक बाद अपने प्रयाण के समय (1891) विद्यासागर एक व्यावहारिक बांग्ला भाषा, प्राथमिक और नीति शिक्षा की कई किताबें तथा बांग्ला माध्यम से स्कूलों में पढ़ाई और स्त्री शिक्षा की मजबूत बुनियाद रख गए थे। गौर करने की बात है कि उनके द्वारा निर्मित बांग्ला भाषा की नींव पर ही आधुनिक बांग्ला साहित्य का पहला अध्याय खड़ा हुआ है।

अपनी पढ़ाई के दौरान ही विद्यासागर को पाश्चात्य शिक्षा का महत्व समझ में आ गया था। उनकी मौलिकता इसमें है कि उन्होंने आधुनिक सोच के लिए अंग्रेजी शिक्षा का जस का तस अनुकरण करने के लिए नहीं कहा। इसके बजाय उन्होंने बांग्ला समेत दूसरी भारतीय भाषाओं में आधुनिक सोच लागू करने पर जोर दिया। उनका मानना था कि इसी से भारतीय समाज आधुनिक और वैज्ञानिक सोच से संपन्न होगा। नई शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत से पहले इस देश में पढ़ाई की दो भिन्न धाराएं थीं।

इसके तहत प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा से परिचय कराने के अलावा साधारण गणित (जोड़, घटाव, गुणा, भाग और पहाड़ा) और उसकी अगली कड़ी में श्रुतलेख, चिट्ठियों के मसौदे का ज्ञान, धर्मग्रंथ पाठ और व्यावहारिक गणित (मूलधन पर सूद तथा जमीन की माप आदि से संबंधित तथ्य याद करना) होता था। पाठशाला में यह शिक्षा संपन्न करने के छात्र संस्कृत शिक्षा और दर्शनशास्त्र का ज्ञान प्राप्त करने के लिए टोल या चतुष्पाठी में प्रवेश लेते थे, जबकि अरबी-फारसी के छात्र मदरसे में दाखिला लेते। टोल या चतुष्पाठी में प्रवेश लेने का अधिकार सिर्फ सवर्ण छात्रों को ही था। देशज शिक्षा की यह प्राथमिक और उच्च श्रेणी हमारे सामाजिक विभाजन की तरह ही थी।

इस देशज शिक्षा व्यवस्था के जरिये आधुनिक परिवर्तन लाने के मामले में विद्यासगर को संदेह था, क्योंकि इस व्यवस्था में बदलाव लाना तो संभव ही नहीं था। पर्यवेक्षक के तौर पर ग्रामीण बंगाल के व्यापक भ्रमण के दौरान देशज शिक्षा व्यवस्था की अव्यावहारिकता को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था। उल्लेखनीय है कि संस्कृत कॉलेज के अध्यक्ष के अलावा मई, 1855 में वह बंगाल के दक्षिणी भाग के चार जिलों- नदिया, हुगली, बर्धमान और मिदनापुर के बांग्ला स्कूल के सहायक इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए थे। इन चारों जिलों के स्कूलों का उन्होंने दौरा किया था। अगले एक साल में ही उन्होंने इन चारों जिलों में पांच-पांच-यानी कुल बीस आदर्श या मॉडल बांग्ला स्कूल खोले थे, जो एक विराट उपलब्धि थी।

स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने तीन स्तरों पर काम किया। पहला यह कि वकील और भारत में स्त्री शिक्षा के प्रसारक जॉन इलियट ड्रिंकवॉटर बेथुन के सहायक के तौर पर विद्यासागर ने कोलकाता में स्त्री शिक्षा के प्रसार की कोशिश की। दूसरा यह कि बेथुन की मृत्यु के बाद उन्होंने बेथुन द्वारा स्थापित स्कूल की संचालन समिति में अवैतनिक अधिकारी के तौर पर रहते हुए उस स्कूल की प्रगति की दिशा में लगातार कदम उठाए। उल्लेखनीय है कि पूरे एशिया में स्त्री शिक्षा के इस शुरुआती स्कूल ने असंख्य लड़कियों का जीवन संवारा, जिनमें सैकड़ों तो ऐसी थीं, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना गया। तीसरे स्तर पर ग्रामीण बंगाल में स्त्री शिक्षा के प्रसार के लिए विद्यासागर ने लंबी-लंबी यात्राएं कीं और लोगों को मनाया।

चूंकि उस दौर में समृद्ध घरानों की महिलाएं पालकी में चलती थीं, इसे ध्यान में रखते हुए विद्यासागर महाशय ने हर पालकी पर महानिर्वाणतंत्र का एक श्लोक लिखवा दिया था, जो लड़कियों की शिक्षा के महत्व के बारे में बताता था। चूंकि बंगाली समाज में संस्कृत को ही विद्वता का परिचायक माना जाता था और ज्यादातर संस्कृत के विद्वान ही स्त्री शिक्षा के आलोचक थे, ऐसे में विद्यासागर द्वारा पालकी में स्त्री शिक्षा का महत्व बताते हुए श्लोक लिखवाना न केवल एक मौलिक कदम था, बल्कि विद्यासागर की सोच के बारे में भी बताता था। करीब डेढ़ सौ साल पहले पालकी में स्त्री शिक्षा के पक्ष में लिखे श्लोक की तुलना आज बसों और रेलगाड़ियों पर लिखे विज्ञापनों से की जा सकती है,  और इसकी कल्पना की जा सकती है कि चलती हुई पालकी पर लिखे श्लोक ने रास्तों से गुजरते कितने लोगों को प्रभावित किया होगा या कितने पंडितों को अपनी कट्टरता पर पुनर्विचार करने के लिए विवश किया होगा।

आधुनिक बांग्ला भाषा और पाठ्यपुस्तक के क्षेत्र में उनका काम भी उतना ही उल्लेखनीय है। विद्यासागर के समय में स्तरीय पाठ्यपुस्तकों का अभाव था। रेनेसां के शुरुआती दौर में यूरोप में भी स्थानीय भाषाओं में स्तरीय पाठ्यपुस्तकों का अभाव था, जिस कारण लैटिन से अनुवाद करना पड़ा था। पाठ्यपुस्तक तैयार करने के अलावा किताबों के संपादन में भी उनकी उतनी ही रुचि थी। चर्यापद की खोज करने वाले पंडित हरप्रसाद शास्त्री लखनऊ जाते हुए एक रात विद्यासागर के यहां रुके थे। उन्होंने विद्यासागर को पूरी रात और सुबह भी कथामाला और बोधोदय के प्रूफ देखते हुए पाया था।

जब सुबह उन्होंने विद्यासागर से इसका जिक्र किया, तो उनका कहना था, 'भाषा ऐसी ही चीज है। एक शब्द लिखकर सोचता हूं कि इसकी जगह अगर दूसरा कोई शब्द रखूं, तो वह ज्यादा स्पष्ट और उचित होगा। इसीलिए मैं हमेशा एक शब्द को काटकर उसकी जगह दूसरा शब्द लिखने में विश्वास करता हूं।'

जिन रवींद्रनाथ को हम विश्वकवि कहते हैं, खुद उन्होंने विद्यासागर को आदिकवि कहकर उनका महत्व प्रतिपादित किया था। रवींद्रनाथ ने अपनी जीवनस्मृति में इसका उल्लेख किया है कि जब वह छात्र थे, तब घर पर पढ़ाने आने वाले अपने संस्कृत शिक्षक के अनुरोध पर वह मैकबेथ का बांग्ला अनुवाद विद्यासागर को सुनाने उनके स्कूल में गए थे। वह मुलाकात हालांकि दोनों में से किसी के लिए बहुत उत्साहवर्धक नहीं थी। चूंकि बालक रवींद्रनाथ के मन में स्कूली शिक्षा के प्रति उत्साह नहीं था, ऐसे में, गुरुगंभीर विद्यासागर उनके लिए प्रेरणास्रोत हो भी नहीं सकते थे, लेकिन बाद के दिनों में महाकवि ने बार-बार विद्यासागर की उपलब्धियों को सादर नमन किया।

(आनंद बाजार पत्रिका से)
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed