महान शिक्षा शास्त्री की याद: आधुनिक बंगाली समाज पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भी कर्ज है
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माता-पिता के ऋण की तरह आधुनिक बंगाली समाज पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भी कर्ज है। 19 वीं शताब्दी के मध्य से आज तक हम गौरव की दो कहानियां पतन के इस दौर में नहीं भूल पाए हैं। वे हैं- आधुनिक शिक्षा और आधुनिक समाज के संस्कार में हमारे पूर्वजों का गौरवशाली नेतृत्व। इन दोनों ही क्षेत्रों में विद्यासागर महाशय का योगदान ऐतिहासिक रहा है। करीब दो सौ वर्ष पहले 1820 में जब उनका जन्म हुआ था, तब शिक्षा संस्कार और बांग्ला भाषा के आधुनिकीकरण की दिशा में कोशिशें बेशक शुरू हो चुकी थीं, लेकिन उनमें किसी तरह का समन्वय नहीं था।
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माता-पिता के ऋण की तरह आधुनिक बंगाली समाज पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भी कर्ज है। 19 वीं शताब्दी के मध्य से आज तक हम गौरव की दो कहानियां पतन के इस दौर में नहीं भूल पाए हैं। वे हैं- आधुनिक शिक्षा और आधुनिक समाज के संस्कार में हमारे पूर्वजों का गौरवशाली नेतृत्व। इन दोनों ही क्षेत्रों में विद्यासागर महाशय का योगदान ऐतिहासिक रहा है। करीब दो सौ वर्ष पहले 1820 में जब उनका जन्म हुआ था, तब शिक्षा संस्कार और बांग्ला भाषा के आधुनिकीकरण की दिशा में कोशिशें बेशक शुरू हो चुकी थीं, लेकिन उनमें किसी तरह का समन्वय नहीं था।
शिक्षा के उद्देश्य, उसकी पद्धति और पाठ्यक्रम में भी बहुत फर्क था। सात दशक बाद अपने प्रयाण के समय (1891) विद्यासागर एक व्यावहारिक बांग्ला भाषा, प्राथमिक और नीति शिक्षा की कई किताबें तथा बांग्ला माध्यम से स्कूलों में पढ़ाई और स्त्री शिक्षा की मजबूत बुनियाद रख गए थे। गौर करने की बात है कि उनके द्वारा निर्मित बांग्ला भाषा की नींव पर ही आधुनिक बांग्ला साहित्य का पहला अध्याय खड़ा हुआ है।
अपनी पढ़ाई के दौरान ही विद्यासागर को पाश्चात्य शिक्षा का महत्व समझ में आ गया था। उनकी मौलिकता इसमें है कि उन्होंने आधुनिक सोच के लिए अंग्रेजी शिक्षा का जस का तस अनुकरण करने के लिए नहीं कहा। इसके बजाय उन्होंने बांग्ला समेत दूसरी भारतीय भाषाओं में आधुनिक सोच लागू करने पर जोर दिया। उनका मानना था कि इसी से भारतीय समाज आधुनिक और वैज्ञानिक सोच से संपन्न होगा। नई शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत से पहले इस देश में पढ़ाई की दो भिन्न धाराएं थीं।
इस देशज शिक्षा व्यवस्था के जरिये आधुनिक परिवर्तन लाने के मामले में विद्यासगर को संदेह था, क्योंकि इस व्यवस्था में बदलाव लाना तो संभव ही नहीं था। पर्यवेक्षक के तौर पर ग्रामीण बंगाल के व्यापक भ्रमण के दौरान देशज शिक्षा व्यवस्था की अव्यावहारिकता को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था। उल्लेखनीय है कि संस्कृत कॉलेज के अध्यक्ष के अलावा मई, 1855 में वह बंगाल के दक्षिणी भाग के चार जिलों- नदिया, हुगली, बर्धमान और मिदनापुर के बांग्ला स्कूल के सहायक इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए थे। इन चारों जिलों के स्कूलों का उन्होंने दौरा किया था। अगले एक साल में ही उन्होंने इन चारों जिलों में पांच-पांच-यानी कुल बीस आदर्श या मॉडल बांग्ला स्कूल खोले थे, जो एक विराट उपलब्धि थी।
स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने तीन स्तरों पर काम किया। पहला यह कि वकील और भारत में स्त्री शिक्षा के प्रसारक जॉन इलियट ड्रिंकवॉटर बेथुन के सहायक के तौर पर विद्यासागर ने कोलकाता में स्त्री शिक्षा के प्रसार की कोशिश की। दूसरा यह कि बेथुन की मृत्यु के बाद उन्होंने बेथुन द्वारा स्थापित स्कूल की संचालन समिति में अवैतनिक अधिकारी के तौर पर रहते हुए उस स्कूल की प्रगति की दिशा में लगातार कदम उठाए। उल्लेखनीय है कि पूरे एशिया में स्त्री शिक्षा के इस शुरुआती स्कूल ने असंख्य लड़कियों का जीवन संवारा, जिनमें सैकड़ों तो ऐसी थीं, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना गया। तीसरे स्तर पर ग्रामीण बंगाल में स्त्री शिक्षा के प्रसार के लिए विद्यासागर ने लंबी-लंबी यात्राएं कीं और लोगों को मनाया।
आधुनिक बांग्ला भाषा और पाठ्यपुस्तक के क्षेत्र में उनका काम भी उतना ही उल्लेखनीय है। विद्यासागर के समय में स्तरीय पाठ्यपुस्तकों का अभाव था। रेनेसां के शुरुआती दौर में यूरोप में भी स्थानीय भाषाओं में स्तरीय पाठ्यपुस्तकों का अभाव था, जिस कारण लैटिन से अनुवाद करना पड़ा था। पाठ्यपुस्तक तैयार करने के अलावा किताबों के संपादन में भी उनकी उतनी ही रुचि थी। चर्यापद की खोज करने वाले पंडित हरप्रसाद शास्त्री लखनऊ जाते हुए एक रात विद्यासागर के यहां रुके थे। उन्होंने विद्यासागर को पूरी रात और सुबह भी कथामाला और बोधोदय के प्रूफ देखते हुए पाया था।
जब सुबह उन्होंने विद्यासागर से इसका जिक्र किया, तो उनका कहना था, 'भाषा ऐसी ही चीज है। एक शब्द लिखकर सोचता हूं कि इसकी जगह अगर दूसरा कोई शब्द रखूं, तो वह ज्यादा स्पष्ट और उचित होगा। इसीलिए मैं हमेशा एक शब्द को काटकर उसकी जगह दूसरा शब्द लिखने में विश्वास करता हूं।'
जिन रवींद्रनाथ को हम विश्वकवि कहते हैं, खुद उन्होंने विद्यासागर को आदिकवि कहकर उनका महत्व प्रतिपादित किया था। रवींद्रनाथ ने अपनी जीवनस्मृति में इसका उल्लेख किया है कि जब वह छात्र थे, तब घर पर पढ़ाने आने वाले अपने संस्कृत शिक्षक के अनुरोध पर वह मैकबेथ का बांग्ला अनुवाद विद्यासागर को सुनाने उनके स्कूल में गए थे। वह मुलाकात हालांकि दोनों में से किसी के लिए बहुत उत्साहवर्धक नहीं थी। चूंकि बालक रवींद्रनाथ के मन में स्कूली शिक्षा के प्रति उत्साह नहीं था, ऐसे में, गुरुगंभीर विद्यासागर उनके लिए प्रेरणास्रोत हो भी नहीं सकते थे, लेकिन बाद के दिनों में महाकवि ने बार-बार विद्यासागर की उपलब्धियों को सादर नमन किया।
(आनंद बाजार पत्रिका से)