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मनरेगा बनाम जी राम जी: नाम के साथ विधान में भी बदलाव, पर क्या बदलेंगे मजदूरों के हालात

Fri, 26 Dec 2025 08:05 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Fri, 26 Dec 2025 08:05 AM IST
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सार
अन्य कल्याणकारी योजनाओं की तरह, मनरेगा भी खामियों से जूझ रही थी। ग्रामीण विकास पर संसद की स्थायी समिति ने लगातार यह सवाल उठाया है कि मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान क्यों किया जा रहा है? सवाल यह है कि क्या योजना का नया रूप वहां सफल होगा, जहां पुराना कानून नाकाम रहा?
 
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MNREGA vs G Ram G: Changes in legislation along with name, but will this chang conditions of laborers
मनरेगा की फाइल फोटो

विस्तार

पिछले हफ्ते, संसद ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को रद्द कर विकसित भारत गारंटी कानून लागू किया। मनरेगा की शुरुआत 2005 में हुई थी। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ‘मनरेगा’ का नाम बदलकर वीबी-जी-राम-जी कर दिया गया है। आप कह सकते हैं कि ग्रामीण लोगों की तकलीफें कम करने का बोझ महात्मा गांधी से हटाकर भगवान राम पर डाल दिया गया है। आइए, देखते हैं कि मूल बदलाव क्या हुए हैं-


नया कानून 100 दिनों के बजाय 125 दिनों के काम की गारंटी देता है। पहले मजदूरी की फंडिंग का बोझ 100 प्रतिशत केंद्र सरकार पर था, जिसे घटाकर 40 प्रतिशत राज्यों के जिम्मे कर दिया गया है। बुआई/कटाई के मौसम में 60 दिनों के अवकाश को जरूरी बनाया गया है। इसमें चार खास क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है-पानी, सुरक्षा, आधारभूत संरचना और जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता। दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना को बंद करने की वजह (जो 741 जिलों, 2.69 लाख पंचायतों और 12.1 करोड़ मजदूरों को कवर करती थी और जिस पर औसतन 90,000 रुपये खर्च होते थे) दिल्ली के नारों और बयानबाजी के धुएं में खो गई है। दरअसल, संसद में वीबी-जी-राम-जी विधेयक पेश होने से दो दिन पहले, सरकार ने ‘टिकाऊ संपत्ति बनाने, बेहतर पानी की सुरक्षा, मिट्टी के संरक्षण और जमीन की अधिक उत्पादकता के जरिये ग्रामीण गरीबों को रोजी-रोटी की सुरक्षा देने में महात्मा गांधी नरेगा की भूमिका’ की तारीफ की थी। असल में, विपक्ष बयानों और आस्था से जुड़े मुद्दों के जाल में फंस गया।


भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने अपने आधार को मजबूत करने और विपक्ष को गुस्सा दिलाने के लिए नए कानून का नाम वीबी-जी-राम-जी रखा। यह रणनीति काम कर गई, क्योंकि नाम को लेकर बयानबाजी शुरू हो गई। साफ तौर पर, मुद्दे पर बहस करने के बजाय, तरीके पर बात होने लगी। संसद में मंत्रियों और वक्ताओं ने मनरेगा में फैले भ्रष्टाचार के बारे में बातें कीं। नया कानून बनने से पहले, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) संजय मूर्ति ने पाया था कि नकद लाभ हस्तांतरण प्रणाली (डीबीटी) में गंभीर कमियां थीं। सीएजी की बात ध्यान देने लायक है-मई 2025 तक डीबीटी के जरिये 43 लाख करोड़ रुपये से अधिक हस्तांतरित किए जा चुके हैं और सरकार का दावा है कि 2015 से डीबीटी की वजह से 3.48 लाख करोड़ रुपये की बचत हुई है। जो भी हो, इस बयान पर कोई चर्चा या बहस नहीं हुई है, न ही इसका कोई जवाब दिया गया है। इससे भी अहम बात यह है कि सीएजी ने मनरेगा का आखिरी पूरा ऑडिट 2013 में किया था, जिसके बाद 2021 में पंजाब का ऑडिट और 2016 में सोशल ऑडिट यूनिट्स की समीक्षा की गई थी। विपक्ष ने भी न तो ऑडिट की मांग की और न सवाल उठाया। संसद में कोई पक्का आंकड़ा भी पेश नहीं किया गया।

टैक्स देने वाले लोग नारेबाजी से परे भ्रष्टाचार की गंभीरता से अनजान हैं। अन्य कल्याणकारी योजनाओं की तरह, मनरेगा भी खामियों से जूझ रही थी। ग्रामीण विकास पर संसद की स्थायी समिति ने लगातार यह सवाल उठाया है कि मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से कम (200 रुपये और उससे भी कम) भुगतान क्यों किया जा रहा है? लगभग हर साल, समिति ने बिना खर्च किए गए पैसे और मजदूरों के बकाया भुगतान के बारे में बताया। अगस्त 2025 में, समिति ने पूछा कि 12,219.18 करोड़ रुपये बिना भुगतान मजदूरी के तौर पर क्यों पड़े हुए हैं-यह मनरेगा के इस साल के बजट का लगभग 14 प्रतिशत है। क्या ग्रामीण रोजगार योजना का नया रूप वहां सफल होगा, जहां पुराना कानून नाकाम रहा?

सार्वजनिक नीति की भविष्यवाणी पिछले अनुभवों के आधार पर की जाती है। वीबी-जी-राम-जी कानून मनरेगा के 100 दिनों के मुकाबले, हर ग्रामीण परिवार को 125 दिनों के रोजगार का वादा करता है। पिछले पांच वर्षों के रोजगार का आंकड़ा 52 से 48 दिनों के बीच रहा है। 2024-25 में, काम करने वाले 5.78 करोड़ परिवारों में से सिर्फ 40 लाख परिवारों ने ही पूरे 100 दिन का रोजगार किया। नया कानून सिर्फ एक नया रूप नहीं है, बल्कि कल्याण के प्रति नजरिये में एक बड़ा बदलाव है। बुआई/कटाई के दौरान अवकाश समझदारी भरा लगता है, लेकिन यह मजदूरों की मोलभाव करने की शक्ति को कम करता है, जो उन्हें मौसम में एक बार अपनी मजदूरी बढ़ाने का मौका देता है। यह तर्क दिया जा सकता है कि प्रौद्योगिकी से भ्रष्टाचार पर रोक लग सकती है। हो सकता है कि पानी, जलवायु और बुनियादी ढांचे जैसे विषयों पर ध्यान केंद्रित करने से 125 दिन का लक्ष्य पूरा हो जाए। पर सवाल यह है कि क्या व्यवस्था में नौकरियों की मांग को इन विषयगत लक्ष्यों से जोड़ने की क्षमता है? और जब ऐसा होगा, तो क्या नेता सहानुभूति दिखाएंगे और जरूरत पड़ने पर सही समय पर दखल देंगे?

राजनीतिक वर्ग अल्पकालिक सोच के जाल में फंसा हुआ है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, 2.12 लाख करोड़ रुपये का सबसे बड़ा मुफ्त खाद्यान्न कार्यक्रम, जिसमें 81 करोड़ लाभार्थी शामिल हैं, 50 करोड़ लोगों को कवर करने वाला सबसे बड़ा स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम, 10 करोड़ किसानों के लिए सबसे बड़ा आय सहायता कार्यक्रम, छात्रों के लिए सबसे बड़ा मध्याह्न भोजन कार्यक्रम, और 2029 तक दो करोड़ घरों के लिए ग्रामीण आवास कार्यक्रम चला रहा है। इन पर सरकारी खजाने का लगभग छह लाख करोड़ रुपये खर्च होता है। इसमें राज्यों का खर्च भी जोड़ दें, तो सिर्फ 15 से ज्यादा राज्यों द्वारा महिलाओं को नकद लाभ हस्तांतरण पर ही अनुमानित तीन लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे। क्या ये योजनाएं नतीजे दे रही हैं? फिर परेशानी के बने रहने की वजह क्या है?

भारत की सरकारें एक अजीब मानसिकता से पीड़ित रही हैं। नेता नतीजों पर ध्यान देते हैं, पर कारणों पर नहीं। जो चीजें विकास में रुकावट डालती हैं, उन्हें ठीक करने से परेशानी कम होगी, रोजगार पैदा होंगे और विकास होगा। दुखद है कि चुनावी फायदे के लिए मुफ्त के वादे किए जाते हैं। यह बात साबित हो चुकी है कि कोई भी शासक उस चीज को वापस नहीं ले सकता, जो उसने स्वेच्छा से दी हो। फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की के शब्दों में कहें, तो चैरिटी की राजनीतिक व्यवस्था देने वाले और लेने वाले, दोनों को भ्रष्ट करती है। लोकलुभावनवाद का बढ़ता दायरा विकास को रोकने, पहल को बाधित करने और आकांक्षाओं को खत्म करने का खतरा पैदा करता है। edit@amarujala.com
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