हाथ से निकल न जाए दूध बाजार
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देश के अन्य उद्योगों की तरह भारतीय दुग्ध उद्योग की संरचना बहुत संगठित नहीं है। देश में काम कर रहे तकरीबन सभी को-ऑपरेटिव फेडरेशन लघु एवं मध्यम उद्योग क्षेत्र से संबंध रखते हैं। बिचौलियों की बढ़ती दखलंदाजी और आपूर्ति शृंखला के बीच तालमेल के अभाव की वजह से दूध की गुणवत्ता और आपूर्ति शृंखला की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है। अमूल जैसे प्रयोगों को छोड़ दिया जाए, तो दुग्ध उद्योग के बाजार पर डेयरी सहकारिता संस्थानों और दलालों का कब्जा है। इस क्षेत्र को संगठित करने के सरकार एवं संगठित क्षेत्र की निजी कंपनियों के प्रयासों को दूध के ठेकेदार के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी अब भारतीय दुग्ध बाजार में दिलचस्पी लेने लगी हैं। अभी देश में इसका बाजार 4.40 लाख करोड़ रुपये का है, जिसके 2020 तक दोगुना हो जाने की संभावना है। इसके बावजूद कोई भी भारतीय कंपनी अकेले इस बाजार पर अपना सिक्का नहीं जमा पाई है। यानी देश में दूध का कारोबार बाजार की बयार से अछूता रहकर पारंपरिक गति से आगे बढ़ रहा है। जरूरी निवेश न होने से इसका सीधा असर दूध की गुणवत्ता और कीमतों पर पड़ रहा है। यही नहीं, इस उद्योग में सूचना संचार तकनीकी का भी बहुत कम इस्तेमाल हो रहा है, जबकि अन्य उद्योगों में इसके इस्तेमाल से गुणवत्ता बढ़ाने के साथ कीमतों को नियंत्रण में रखा गया है। असंगठित क्षेत्र में इसका ज्यादातर काम हाथों के जरिये ही हो रहा है।
इस क्षेत्र की महत्ता को देखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय डेयरी योजना लागू की है, जिसका उद्देश्य दुधारू पशुओं की उत्पादकता बढ़ाकर दूध एवं दुग्ध उत्पाद की मांग की पूर्ति को सुनिश्चित करना है और दुग्ध उत्पादन में लगे ग्रामीणों की पहुंच संगठित क्षेत्र के दुग्ध प्रसंस्करण संस्थानों तक सुगम बनाना है। अर्थव्यवस्था की तरक्की के साथ देश में मध्यवर्ग का दायरा बढ़ा है और दुग्ध एवं दुग्ध उत्पादों की मांग भी बढ़ी है।
हालांकि भारत दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देशों में है, लेकिन अमूल को छोड़कर कोई भारतीय कंपनी दुनिया के शीर्ष बीस कंपनियों में शामिल नहीं है। इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के अनुसार, भारत के सात करोड़ ग्रामीण परिवारों द्वारा उत्पादित दूध में से केवल पच्चीस प्रतिशत ही संगठित क्षेत्र के बाजार में बिकता है, शेष पचहत्तर प्रतिशत फुटकर विक्रेताओं के जरिये उपभोक्ताओं तक पहुंचता है। इससे इस क्षेत्र में मौजूद अपार अवसर का अंदाजा लगाया जा सकता है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस मलाईदार बाजार में अपना हिस्सा सुनिश्चित करना चाहती हैं। निजी कंपनियां इस क्षेत्र में साल 2010 से अब तक पहले ही 862 करोड़ रुपये का निवेश भी कर चुकी हैं। जनवरी, 2014 में ही विश्व की सबसे बड़ी दुग्ध कंपनी ग्रुपी लेक्टेलिस एसए ने हैदराबाद की त्रिमुला मिल्क प्रोडक्ट्स को सत्रह सौ पचास करोड़ रुपये में खरीद लिया। जापानी दूध कंपनी मेजी भी भारतीय बाजार में प्रवेश के लिए तैयार है। यदि भारतीय डेयरी बाजार को एक संगठित उद्योग में परिवर्तित करने में सफलता मिलती है, तो न केवल बिचौलियों से ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों को फायदा होगा, बल्कि दुग्ध उत्पादों के दामों में भी भारी कमी आएगी और उनकी गुणवत्ता भी बढ़ेगी। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे और सरकार की कमाई में भी इजाफा होगा।