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सुबह सुबह यह दिख जाए तो अपनी आंखें बंद कर लेनी चाहिए

Tue, 12 May 2015 09:39 AM IST
श्रीरामलाल जी
श्रीरामलाल जी Updated Tue, 12 May 2015 09:39 AM IST
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miserly money is wasted on earth

मालवेश्वर भोज को राजसिंहासन पर बैठे कुछ ही दिन हुए थे। एक दिन प्रातःकाल वह अपने रथ पर आसीन होकर राजकीय उद्यान की ओर क्रीड़ा के लिए जा रहे थे। उनका रथ बड़ी तेजी से राजपथ पर बढ़ा जा रहा था। सहसा महाराज भोज ने रथ रोकने का आदेश दिया।

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वह एक ब्राह्मण देवता को देखकर रथ से उतर पड़े। उस ब्राह्मण का नाम गोविंद था, और देखने में वह मनीषी लगता था। महाराज भोज ने उसका सादर अभिवादन किया, ब्राह्मण ने दोनों नेत्र मूंद लिए। राजा भोज उसके इस आचरण से विस्मय में पड़ गए।
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महाराज भोज ने बड़े आदर से जिज्ञासा प्रकट की, न तो आपने स्वस्ति-वाचन किया और न आशीर्वाद ही दिया। आपने मुझे देखते ही दोनों नेत्र बंद कर लिए। इसका कारण बताने की कृपा कर सकते हैं?

गोविंद ने महाराज भोज से अत्यंत खरा सत्य कहते हुए कहा, आप वैष्णव हैं, आप अनजाने में भी दूसरों को पीड़ा नहीं पहुंचा सकते हैं, और न आप ब्राह्मणों के प्रति उत्पात कर सकते हैं, इसलिए मुझे आपसे कोई भय नहीं है। आप किसी को कुछ दान भी नहीं देते।

लोकोक्ति है कि सुबह सुबह कृपण का मुख देखकर नेत्र बंद कर लेने चाहिए। अप्रगल्भ की विद्या, कृपण का धन और कायर का बाहुबल-ये तीनों पृथ्वी पर व्यर्थ हैं।

उन्होंने कुछ क्षण रुककर फिर कहा, राजा के पास संपत्ति भले न हो; पर यदि वह गुणग्राही है, तो सेव्य है। दधीचि, शिवि और कर्ण आदि स्वर्ग जाने पर भी अपने दान के बल पर पृथ्वी पर अमर हैं। लोग उनका यश गाते हैं और उनकी उदारता तथा दानशीलता की प्रशंसा करते हैं। महाराज, यह देह नश्वर है, अनित्य है, इसलिए कीर्ति ही उपार्जनीय है।

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