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मतदाताओं का मन: 17वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव के समय इसका जिक्र करना मौजूं भी है

Mon, 06 May 2019 04:40 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Mon, 06 May 2019 04:40 AM IST
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Loksabha election 2019: mind of voter's
फाइल फोटो
भारतीय चुनावों से संबंधित एक शाश्वत सत्य यह है कि इनमें 'विशेषज्ञ' अक्सर गलत साबित हो जाते हैं। इसकी वजह स्पष्ट है। और सत्रहवीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव के समय इसका जिक्र करना मौजूं भी है। जैसे कि उस दिन एक नामचीन टेलीविजन पत्रकार ने कहा, 'लोग कैमरे के सामने जो कुछ भी कहते हैं, अकेले में आमने-सामने मिलने पर उससे अलग बात कहते हैं।' भारतीय मतदाता, उनमें भी खासकर ग्रामीण मतदाता बहुत चालाक होते हैं।

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भारतीय चुनावों से संबंधित एक शाश्वत सत्य यह है कि इनमें 'विशेषज्ञ' अक्सर गलत साबित हो जाते हैं। इसकी वजह स्पष्ट है। और सत्रहवीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव के समय इसका जिक्र करना मौजूं भी है। जैसे कि उस दिन एक नामचीन टेलीविजन पत्रकार ने कहा, 'लोग कैमरे के सामने जो कुछ भी कहते हैं, अकेले में आमने-सामने मिलने पर उससे अलग बात कहते हैं।' भारतीय मतदाता, उनमें भी खासकर ग्रामीण मतदाता बहुत चालाक होते हैं।

वे जानते हैं कि चुनाव के समय अचानक उनके इलाके में टपक पड़ने वाले और उनसे राय मांगने वाले पत्रकारों को सच बताना जोखिम भरा हो सकता है, इसलिए वे जमीनी वास्तविकताएं बताने के बजाय यथास्थिति को स्वीकार करने को ही प्राथमिकता देते हैं। ग्रामीण मतदाता वोटिंग पैटर्न के बारे में बाहर से आए पत्रकारों को सच्चाई बताने का साहस नहीं करते, बल्कि ज्यादातर वही कहते हैं, जो पत्रकारों या वहां मजबूत राजनीतिक दल के अनुकूल हो।

इसको इस तरह भी समझा जा सकता है कि ट्रेन या बस में, या हाइवे पर स्थित चाय की दुकानों पर कोई मतदाता जो कुछ भी कहता है, वह अमूमन सच नहीं होता, क्योंकि जब वह पत्रकारों के सवालों के जवाब दे रहा होता है, तब आसपास खड़े और भी अनेक लोग उसे सुन रहे होते हैं। चूंकि उनमें से कुछ लोग उसके परिचित हो सकते हैं, इसलिए वह अपने मन की बात कहकर किसी से शत्रुता मोल नहीं ले सकता।

इसके विपरीत, एक पत्रकार का सच्चाई से सामना तब होता है, जब वह मुख्य सड़क को छोड़कर दूर के गांव में निकल जाता है और वहां लोगों से उनके घर में जाकर मिलता है। चूंकि घर के अंदर मौजूद लोग  अपने ही होते हैं, लिहाजा वहां कही गई बातें अमूमन सच होती हैं। यह बात खासकर उन मतदाताओं के बारे में सच होती है, जो दबाव में होते हैं और समाज के हाशिये पर भी होते हैं। इनमें शहरी निम्न वर्ग के लोग, गरीब दलित, कर्ज में डूबे किसान के अलावा वे लोग भी होते हैं, जिन्हें लगता है कि उनकी आवाज नहीं सुनी जाती।

हाल में ही उत्तर प्रदेश में, जो कि देश के मतदाताओं का मिजाज मापने का बैरोमीटर है, एक लंबी सड़क यात्रा करते हुए,  मुझे भी कई मूल्यवान सूत्र हाथ लगे। उसमें से एक बात यही है कि लोग क्या कह रहे हैं, वह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि वे कौन हैं, और कहां आपसे बात कर रहे हैं। और इसके बाद भी उनकी कथनी और करनी में फर्क हो सकता है। कोई कुछ भी कहे, सच्चाई तो आखिरकार 23 मई को ही सामने आएगी।

छोटे शहरों, हाइवे पर स्थित ढाबों और चाय की दुकानों पर मुझे ज्यादातर वही बातें सुनने को मिलीं, जो कद्दावर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के संबंध में लगातार दिए जा रहे तर्कों से ही संबंधित थीं। उत्तर प्रदेश के खासकर शहरी इलाकों में मुझे यही बातें सुनने को मिलीं। वाराणसी में एक ब्यूटी पार्लर में काम करने वाले युवक ने मेरे सामने यह स्वीकारा कि उसके अपने जीवन में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया है, लेकिन वह नई सड़कें, पुल और फ्लाइओवर से प्रभावित है। उसका भी मानना है कि सिर्फ नरेंद्र मोदी ही पाकिस्तान और देशद्रोहियों को सबक सिखा सकते हैं।

पर लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे से गुजरते हुए और कन्नौज जिले के बेहरीन गांव में लोगों से बात करते हुए पता चला कि वहां के लोगों ने सत्ताधारी पार्टी से किस तरह दूरी बना ली है। उस गांव के किसान आवारा पशुओं के उपद्रव और इससे होने वाले फसल के नुकसान के कारण क्षुब्ध हैं।

उस गांव के ही एक बुजुर्ग किसान राजकिशोर ने शिकायती लहजे में कहा कि रात में अपनी फसलों को आवारा पशुओं के हमले से बचाने के लिए गांव के लोगों को रात भर जागना पड़ता है, 'प्रधानमंत्री कहते हैं कि वह चौकीदार हैं, पर असल चौकीदार तो किसान हैं। हम दिन को चिलचिलाती धूप में खेतों में काम करते हैं और रात को अपनी फसल की रखवाली करने के लिए जागने को मजबूर हैं। इस गांव का कोई भी आदमी गाय पालना नहीं चाहता, क्योंकि जब वे बूढ़ी हो जाएंगी, तब उनका हम क्या करेंगे? तब उन्हें कौन चारा देगा? पहले हम बूढ़ी गायें बेच देते थे, पर अब ऐसा नहीं कर सकते। इसलिए हम अब भैंस पालने लगे हैं। इसके बावजूद दूसरे गांवों से गायें आ जाती हैं। जब हमारे पास अपने पशुओं को चारा देने के लिए ही पैसे नहीं हैं, तब हम दूसरे की गायों के लिए घास और चारे का प्रबंध भला किस तरह कर सकते हैं?'

बहुत सारे किसान इस बात से खिन्न दिखे कि आवारा गायों को रखने के लिए पर्याप्त संख्या में गोशालाओं का निर्माण नहीं किया गया है, ऊपर से गायों को बेचना कठिन है। ऐसे में किसानों के सामने अपनी बूढ़ी गायों को खुला छोड़ देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है, क्योंकि वे उन गायों के घास-चारे का बोझ नहीं उठा सकते, जो दूध नहीं देतीं। उसी गांव की बी.एससी. प्रथम वर्ष की छात्रा कुंती की शिकायतें अलग हैं। उसका कॉलेज गांव से सात किलोमीटर दूर है और उसे लगभग रोज रिक्शे से यह दूरी तय करनी पड़ती है।

वह बताती है कि उसके कॉलेज में कोई प्रयोगशाला नहीं है। बेहरीन गांव में शिक्षित युवा तो बहुत हैं, पर रोजगार की कमी है, जिससे परेशानी है। ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों को उनके परिवार वाले निजी क्षेत्र में नौकरियां नहीं करने देते। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि सिर्फ वही देश की चिंता क्यों करें।

यह कहना कठिन है कि चुनावी दौरे में मैंने जिन लोगों से मुलाकातें कीं, उन्होंने किसे वोट दिया है या किसे वोट देंगे। पर चुनाव के इस समय में हम जो कुछ भी सुनते हैं, वह इस पर भी निर्भर करता है कि हमने ये बातें मुख्य सड़क से कितनी दूर जाकर सुनी हैं। जो लोग देश की इस चुनावी सच्चाई से परिचित हैं, वही वास्तविकता का बेहतर आकलन करने में सक्षम हो सकते हैं।
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