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भाषाओं को लेकर बदल रहा है मानस : राष्ट्रीय पर्व के मौके पर राष्ट्रीयता और भारतीयता की अभिव्यक्ति का जरिया
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विस्तार
राष्ट्रीय पर्व के मौके पर राष्ट्रीयता और भारतीयता की अभिव्यक्ति का जरिया भले ही हिंदी रही हो, लेकिन शायद यह पहला मौका है कि लाल किले के प्राचीर से भारतीय भाषाओं पर गर्व करने की बात की गई हो। नई आर्थिकी और उदारीकरण के विस्तार के दौर में भारतीय भाषाओं की चर्चा प्रगतिशीलता के उलट मानी जाने लगी। कुछ एक भारतीय भाषाएं इसका अपवाद हो सकती हैं। ऐसे मानस से घिरे देश के समक्ष अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले के ऐतिहासिक प्राचीर से भारतीय भाषाओं पर गर्व करने की अपील करते हैं, तो उसे बदलाव के वाहक के तौर पर देखा जाना चाहिए।
पंद्रह अगस्त के अहम मौके पर प्रधानमंत्री ने नई शिक्षा नीति के संदर्भ में जो बात कही, उस पर एक बार फिर निगाह डालनी चाहिए। उन्होंने कहा, 'हमने देखा है कि कभी-कभी हमारी प्रतिभा भाषा की बेड़ियों में बंध जाती है। यह गुलाम मानसिकता का परिणाम है। हमें अपने देश की हर भाषा पर गर्व होना चाहिए। हम भाषा जानते हों या न जानते हों, लेकिन हमें गर्व होना चाहिए कि यह मेरे देश की भाषा है और यह दुनिया को पूर्वजों द्वारा दी गई भाषा है।'
यह सही है कि अंग्रेजों ने जिस तरह की शिक्षा व्यवस्था को भारत में विकसित किया, उसका असर आजादी के बाद भी रहा। भले ही गांधी जी बुनियादी तालीम की बात करते रहे, लेकिन मानस विदेशी ही बना रहा। हमारी सोच पर गुलाम मानसिकता हावी रही। इसका दैनंदिन जीवन में असर भी दिखा। अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों को जिंदगी के तमाम मोर्चों पर भारतीय भाषाएं जानने-बूझने वालों की तुलना में ऊंचा रसूख हासिल होता रहा।
इसी वजह से हमने खुद को मापने के लिए अपने पारंपरिक तरीके और मानक तक छोड़ दिए। हम दुनिया के नजरिये से ही अपने को भी मापने-तौलने लगे। साठ के दशक में लोहिया की अगुआई में अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चला। उसका मकसद अंग्रेजी से ज्यादा अंग्रेजी मानसिकता को हटाना रहा। लेकिन दुर्भाग्यवश वह हिंदी बनाम अंग्रेजी में तब्दील हो गया और कतिपय राजनीतिक तंत्र के अंग्रेजी भक्तों ने धीमे से इसे हिंदी बनाम अन्य भारतीय भाषाओं का रूप दे दिया।
इससे वह आंदोलन सफल नहीं हो पाया और भारतीय भाषाओं की बनिस्बत अंग्रेजी चिरकाल के लिए भारतीय उच्च मानस के प्रतीक के रूप में स्थापित हो गई। इसकी वजह से राजनीतिक वर्ग भी इस सवाल को छेड़ने से बचने लगा। ऐसे माहौल में अगर प्रधानमंत्री भारतीय भाषाओं में सोचने वाली भारतीय मनीषा को प्रोत्साहित करने की बात करते हैं तो उसका स्वागत ही होना चाहिए। यह भी सच है कि जिस आर्थिकी ने भारतीय भाषाओं की तुलना में अंग्रेजी की ताकत और ज्यादा बढ़ाई, अब वही आर्थिकी भारतीय भाषाओं की क्षमता को और गहराई से समझने लगी है।
यही वजह है कि अब पश्चिमी देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी भारतीय त्योहारों पर भारतीय भाषाओं में भारतीयों को संबोधित करने लगे हैं। भारत के 76वें स्वाधीनता दिवस पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैंक्रो का हिंदी में ट्वीट इसी बदलाव का उदाहरण है। ट्वीट के जरिये भारतीयों को बधाई देते हुए उन्होंने लिखा है, 'प्रिय भारतवासियो, स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाइयां! आप जब पिछले 75 वर्षों में भारत की शानदार उपलब्धियों का गर्व से जश्न मना रहे हैं, आप भरोसा कर सकते हैं कि फ्रांस हमेशा आपका साथ देगा।'
फ्रांसीसी राष्ट्रपति अकेली पश्चिमी शख्सियत नहीं रहे, जिन्होंने हिंदी में भारतीयों को बधाई दी। इंग्लैंड की क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान केविन पीटरसन ने भी हिंदी में ही ट्वीट करके अपना शुभकामना संदेश दिया। पीटरसन ने लिखा, '75वें स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं..भारत गर्व करो...आप सभी के लिए एक बेहतर कल का निर्माण कर रहे हैं।' साफ है कि भारतीय भाषाओं और हिंदी को लेकर दुनिया का मानस बदल रहा है।