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Baby Milk: शिशु दूध के नमूनों का अवैध वितरण, संबंधित कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कब

Subhash Chandra Kushwaha सुभाष चंद्र कुशवाहा
Updated Wed, 22 Feb 2023 06:03 AM IST
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सार
आईएमएस ऐक्ट 1992  की धारा 4(ए) में स्पष्ट लिखा हुआ है कि उपहार स्वरूप डॉक्टरों के बीच शिशु दुग्ध पैकेट का वितरण अवैध है।
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milk powder illegal marketing of baby formula samples no action against companies
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

बाजार में शिशु दूध के पैकेटों की भरमार है। तमाम कंपनियों के पैकेटों पर बकायदा आईएसआई मार्क लगा हुआ है, जिन्हें ऑनलाइन भी खरीदा जा सकता है। एलबीडब्लू यानी लो बर्थ वेट इन्फेंट मिल्क (समय पूर्व जन्मने वाले कम वजन के बच्चों के लिए) दूध बेचे जा रहे हैं, लेकिन इधर कुछ कंपनियों ने डॉक्टरों के बीच ‘लो बर्थ वेट इन्फेंट मिल्क फार्मूला’ सैंपल पैकेट बांटना शुरू किया है। ऐसा कंपनियां डॉक्टरों के माध्यम से शिशु दुग्ध पैकेटों को स्वीकृति दिलाने के लिए करती हैं, जिनका वितरण पूरी तरह से अवैध है। खानापूरी के लिए वैधानिक चेतावनी के रूप में इन पैकेटों पर लिखा रहता है- ‘मां का दूध आपके बच्चे के लिए सर्वोत्तम है।’ इस तरह से एक बार फिर शिशु खाद्य को बाजार द्वारा हथियाने का कुचक्र रचा जा रहा है।



विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, नवजात बच्चों के लिए मां के दूध का कोई विकल्प नहीं है। पूरी दुनिया में छह माह तक के नवजात बच्चों को सिर्फ मां का दूध देने का अभियान छेड़ा गया है। पहले अपने यहां सेरीलैक जैसे उत्पादों को कंपनियों ने नियंत्रणकारी संस्थाओं को प्रभावित कर खूब बेचा। बेबी पाउडर, साबुन आदि सौंदर्य प्रसाधनों को बेचकर बच्चों की सेहत को नुकसान पहुंचाया। जब हकीकत सामने आई और बेबी पउडर में पाए जाने वाले हानिकार एस्बेस्टस का खुलासा हुआ, तो जॉनसन ऐंड जॉनसन पर अमेरिका में जुर्माना लगा। फिर उसने अपने उत्पादों को बाजार से हटाया।


कुछ जागरूक डॉक्टरों की पहल पर अपने देश में ‘द इन्फेंट सब्स्टीट्यूट्स, फीडिंग बॉटल्स ऐंड इन्फेंट फूड्स (रेगुलेशन ऑफ प्रोडक्शन, सप्लाई ऐंड डिस्ट्रीब्यूसन) ऐक्ट 1992’ बना। इस अधिनियम  की धारा 4(ए) में स्पष्ट लिखा हुआ है कि उपहार स्वरूप शिशु दुग्ध पैकेट का वितरण अवैध है। लेकिन आज इन कंपनियों को कानून की कोई परवाह नहीं है। संक्षेप में, इस ऐक्ट को आईएमएस ऐक्ट कहते हैं। इसकी धारा तीन और चार में इसलिए प्रावधान किए गए हैं कि बच्चों के डॉक्टर छह माह तक केवल मां का दूध पीने की सलाह दें और शिशु दुग्ध के नाम पर बेची जा रही कंपनी उत्पादों का समर्थन न करें।

पूर्व आईएमएम सदस्य, बालरोग विशेषज्ञ, जॉ के पी कुशवाहा कहते हैं, ‘बाहरी खाद्य पदार्थ बच्चों के मानसिक विकास और प्रतिरोधी क्षमता को आजीवन प्रभावित करते हैं।’ मगर बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने लाभ के लिए डॉक्टरों को प्रभावित कर, उनके माध्यम से डिब्बा या पैकेट बंद शिशु खाद्यान्नों को बाजार में स्थापित करने का कुचक्र करती रही हैं। यह पूरी तरह से आईएमएस ऐक्ट 1992 का उल्लंघन है।

 कंपनियां जानती हैं कि इस ऐक्ट के अंतर्गत कार्यरत फूड इंस्पेक्टर की तैनाती न तो पर्याप्त है और न उनके पास जांचने के पर्याप्त साधन हैं। डॉक्टरों को सुख-सुविधा देकर बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्रभावित करती हैं। भारतीय चिकित्सा संगठन द्वारा बनाए गए नियम 6.8.1 में ही खामी दिखती है, जो डॉक्टरों द्वारा दवा कंपनियों से उपहार, किराया सुविधा लेने को रोकने की वकालत तो करता है, पर सहकारिता अधिनियम की धारा 1860 के अंतर्गत पंजीकृत संस्थानों पर यह नियम लागू नहीं माना जाता। भारतीय बालरोग परिषद, राष्ट्रीय प्रतिरक्षण सलाहकार समूह का सदस्य है, ऐसे में वह लाभ प्राप्त कर, कंपनियों के उत्पादों के हित में काम करता है, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।  

पद्मश्री विजेता डॉ. के के अग्रवाल ने बहुत पहले कहा था कि, ‘शिशुओं के लिए, बाजार में जो तमाम उत्पादों के विज्ञापन आते हैं, जिनमें उनकी हड्डियों को मजबूत करने के लिए तेल, त्वचा की हिफाजत के लिए अलग तेल और नहाने के लिए भिन्न प्रकार के साबुन की वकालत की जाती है, ये सब कंपनियों के झूठे प्रचार के बल पर अकूत धन कमाने का षड्यंत्र है। लगभग सभी बेबी पाउडर बच्चे को नुकसान पहुंचाते हैं।’ अब देखना यह है कि डॉक्टरों के बीच बांटे जा रहे शिशु दुग्ध सैंपल पैकेटों के लिए संबंधित कंपनियों के विरुद्ध कार्रवाई होती है या नहीं?

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