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जिसकी लाठी उसकी भैंस

Thu, 28 Aug 2014 07:43 PM IST
तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन Updated Thu, 28 Aug 2014 07:43 PM IST
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Might is right

मैं अगर यहूदी होती, तो हजारों वर्षों से जो लोग जिस जमीन पर रह रहे हैं, उन्हें वहां से हटाकर उस जमीन पर अपना देश नहीं बनाती। अगर मैं इस्राइली होती, तो फलस्तीनियों को खत्म कर देने की साजिश का, इस्राइली सत्ता के वर्चस्ववादी तौर-तरीके का विरोध करती। अगर मैं फलस्तीनी होती, तो उस देश को निशाना बनाकर पेट्रोल बम, रॉकेट, पत्थर, बोतल और पटाखे नहीं फेंकती, जिसके पास दुनिया में सबसे उन्नत तरीके के बम, अत्याधुनिक शस्त्रास्त्र, लड़ाकू विमान तो हैं ही, ताकतवर सेना है, यहां तक कि परमाणु हथियार भी उसकी पहुंच में हैं, और जो पड़ोसी देश की बस्तियों में घुसकर ताकत का प्रदर्शन करने, उनके घरों, स्कूलों और अस्पतालों को ध्वस्त करने में हिचकता नहीं है, बमबारी कर सैकड़ों शिशुओं की हत्या कर देने में जिसे गुरेज नहीं है। अगर मैं फलस्तीनी मुस्लिम होती, तो खुद को फिदायीन बम में तब्दील नहीं करती, न ही किसी को आत्मघाती हमलावर बनने के लिए उकसाती।

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मैंने जब-जब इस्राइल के हवाई हमले देखे, उसे तोप दागते देखा, सैकड़ों निर्दोष नागरिकों को मरते हुए देखा, मैं समझ ही नहीं पाई कि फलस्तीनी अपने जीवन को दांव पर लगाकर जमीन के छोटे टुकड़े से चिपककर क्यों बैठे हैं। मिट्टी जीवन से कीमती तो नहीं है। जन्मभूमि छोड़ देने, पूर्वजों की जमीन छोड़ कहीं दूर जा बसने का मतलब हार जाना नहीं है। जीने के लिए मनुष्य ने हमेशा ही गांव-घर छोड़े हैं।
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टेलीविजन पर हिंसा के भीषण दृश्य देखते हुए, मृत्यु और ध्वंसस्तूप के बीच सब कुछ खो चुके लोगों को देखते हुए मैं खुद को उनसे एकमेव पाती हूं। तब मैं समझती हूं कि हमास का रवैया कितने क्षोभ और गुस्से से उपजा है। किंतु एक छोटे और अत्यंत ताकतवर के बीच युद्ध तो संभव नहीं। हमास को यह पता है। इसके बावजूद वह हमले करता है। हालांकि कहने को दोनों के बीच संघर्ष विराम पर समझौता हुआ है। लेकिन क्या यह स्थायी समाधान है?
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इस समझौते के लिए नेतन्याहू की इस्राइल में जैसी आलोचना हो रही है, और मुस्लिम देशों में इसे जिस तरह हमास की जीत बताया जा रहा है, उससे भला कौन मानेगा कि इन दोनों के बीच फिर हिंसा नहीं होगी? हमें और कितनी मौतें देखनी होंगी? और कितने शिशुओं की हत्या? और कितना खून? और कितनी वीभत्सता? इस्राइल की शिकायत है कि हमास आवासीय इलाकों में रॉकेट छिपाकर रखता है। उसका यह भी कहना है कि हमास शिशुओं को ढाल की तरह इस्तेमाल करता है, और उसी की वजह से पिछले दिनों इतने निर्दोष, निहत्थे फलस्तीनी मारे गए।

इस्राइल के तर्कों से ऐसा लगता है कि फलस्तीनी नागरिकों को निशाना बनाने के सिवा उसके पास और कोई विकल्प नहीं था। जबकि उसके पास विकल्प था। जो बम निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाते हों, उन बमों का इस्तेमाल क्यों करना चाहिए? हमास ने संभवतः उन जगहों में रॉकेट छिपा रखे थे, जहां बम फेंकना युद्ध के कानून के मुताबिक भी निषिद्ध है। पर क्या हमास नहीं जानता कि इस्राइल किसी कानून की परवाह नहीं करता? कानून की परवाह करने पर क्या वह समुद्र तट पर खेलते फलस्तीनी बच्चों को निर्दयतापूर्वक मारता? वहां तो हमास का कोई सदस्य नहीं था।

पैदा होने के बाद से ही मैं सुन रही हूं कि फलस्तीनियों पर इस्राइल नाम का एक देश कहर ढा रहा है। मैं किसी एक पक्ष की बात सुनकर यकीन कर लेने वाली नहीं हूं। मैंने पश्चिम एशिया के इस विवाद का पूरा अध्ययन किया है। फलस्तीन में बच्चों को इस्राइल से घृणा करने की जो सीख दी जाती है, अपने लोगों को आत्मघाती बम में तब्दील होने के लिए फलस्तीन में जिस किस्म का दबाव बनाया जाता है, मैं उसकी घनघोर आलोचक हूं। इसी तरह, इस्राइल सामूहिक रूप से फलस्तीन को ध्वस्त करने की जिस रणनीति पर चलता रहा है, मैं उसकी भी निंदा करती हूं।

पिछले दिनों इस्राइल की एक दीवार पर यह लिखा देख मैं चौंक गई थी-फलस्तीनी अरबों को गैस चैंबर में भेज देना चाहिए। नाजियों ने यहुदियों को गैस चैंबर में मारा था। विश्व इतिहास में ऐसी क्रूरता और कहीं नहीं दिखी, जब करीब साठ लाख यहुदियों की हत्या की गई थी। उन्हीं यहूदियों के वंशज आज अगर अपने विरोधियों को गैस चैंबर में भेजना चाहते हैं, तो हैरत होगी ही। इस्राइल ने गाजा में डाइम बम फेंके हैं। उसने यूरेनियम लगे वे बम भी फेंके हैं, जिनका उपयोग अमेरिका ने इराक पर किया था। इन दोनों बमों से कैंसर फैलता है। स्वाभाविक ही इससे फलस्तीनियों की भारी क्षति हुई है। हमने शायद यह मान लिया है कि मरते-मरते फलस्तीनी एक दिन विलुप्त हो जाएंगे। तब इस्राइली बगैर किसी खतरे के अरब भूखंड में रह पाएंगे।

बचपन में एक कहावत सुनती थी-जिसकी लाठी उसकी भैंस। इस्राइल का रवैया इसका ज्वलंत उदाहरण है। जोर-जबर्दस्ती करने वाले कानून नहीं मानते। धन और मारक हथियार हों, तो कानून न मानने से कुछ बिगड़ता नहीं है। वैसे देशों के सामने संयुक्त राष्ट्र भी चुप रहता है। इस्राइल और फलस्तीन को दो देश बना दो। इराक को तोड़कर तीन टुकड़े कर दो। सद्दाम हुसैन को गद्दी से उतारकर परिवार समेत मार डालो। अमेरिका ने इराक को लोकतंत्र का उपहार दिया है। इराकी लोकतंत्र का हाल देखकर दुख और क्रोध से फट पड़ने का जी करता है। वही इराक अब एक और भीषण खून-खराबे का मंच बना हुआ है। साम्राज्यवादी देशों ने क्या कभी भलाई के लिए किसी दूसरे देश में पांव पसारे हैं?


अगर मैं इस्राइली यहूदी या फलस्तीनी मुस्लिम होती, तो वह जमीन छोड़ हमेशा के लिए चली जाती। यह पृथ्वी हमारी है, कहीं न कहीं तो जगह मिलती मुझे। इतनी मारामारी, इतनी लड़ाई, इतनी हिंसा, इतना रक्तपात देख मैं मनुष्य होने की शर्म से मुंह छिपाती हूं। जगह के लिए लड़ाई करूं, आत्मघाती बम बनकर अपने साथ दो लोगों को मार डालूं, बम बरसाकर शहरों को ध्वंस कर दूं, पड़ोसियों को चींटी की तरह मसल दूं-मनुष्यता का इतिहास इस पर कतई गर्व नहीं करेगा।

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