पड़ोस में युद्ध, पाकिस्तान बेपरवाह: ईरान-इस्राइल टकराव से कई मुल्कों पर असर लाजिमी, तेल की कीमतों में लगेगी आग
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विस्तार
पिछले रविवार को जैसे ही पाकिस्तान के लोग जगे, उन्हें यही खबर मिली कि ईरान ने इस्राइल पर हवाई हमला कर दिया है और सैन्य अभियान अब भी जारी है। मेरी तत्काल प्रतिक्रिया थी कि इस्राइल भी पलटवार करेगा और इस क्षेत्र में एक नया युद्ध शुरू होने जा रहा है। ईरान और इस्राइल के बीच स्थित कई अरब देश भी इससे प्रभावित होंगे। हालांकि पिछले रविवार पाकिस्तान की सड़कों पर जीवन सामान्य था और आम लोगों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि ईरान ने युद्ध की घोषणा कर दी है। जो लोग टीवी देख रहे थे, केवल वही इस खबर में दिलचस्पी ले रहे थे, अन्यथा किसी को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। यहां तक कि पाकिस्तान की हुकूमत भी चुप थी। हालांकि पाकिस्तान में एक्स (ट्विटर) पर प्रतिबंध है, अधिकांश लोग इसे एक्सेस करने के लिए वीपीएन का इस्तेमाल कर रहे हैं। सरकार की तरफ से भी इस पर कोई बयान नहीं आया, विदेश मंत्री का भी नहीं।
मैंने ट्वीट करके प्रधानमंत्री को आपातकालीन सुरक्षा बैठक बुलाने के लिए कहा, क्योंकि स्थिति बहुत अप्रत्याशित थी और यह युद्ध किसी भी दिशा में जा सकता था। हालांकि दुनिया की कई सरकारें एक-दूसरे तथा ईरान और इस्राइल के संपर्क में थीं, लेकिन पाकिस्तान के मंत्री एवं अधिकारी बिल्कुल शांत थे। अन्य मुल्कों की तरह पाकिस्तान में तेल बहुत महंगा है और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की पहुंच से बाहर है। इसलिए मेरा पहला विचार यही था कि अगर पड़ोस में युद्ध होता है, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।
पड़ोस में युद्ध पाकिस्तान के लिए कोई नई बात नहीं है। हममें से कई लोग भारत के साथ युद्ध से गुजर चुके हैं और अफगानिस्तान भी कभी शांत नहीं रहा है। इसलिए अब दूसरे पड़ोसी ईरान को युद्ध में शामिल होते और इसके प्रभाव को पसरते देखना डरावना था। लंबी और साझी सीमा के साथ ईरान पाकिस्तान का निकट पड़ोसी है। कभी-कभी दोनों तरफ के आतंकवादी हमले करते हैं और पाकिस्तान-ईरान सीमा पर तस्करों के साथ झड़पें होती हैं, लेकिन आम तौर पर स्थानीय प्रशासन इससे निपटता है। सीमा पर विशेष रूप से पेट्रोल की तस्करी आम बात है और ऊपर से लेकर नीचे तक के अधिकारियों की इसमें मिलीभगत होती है और यह लगातार उनकी नाक के नीचे होता है। व्यवसायी अक्सर शिकायत करते हैं कि ईरान से होने वाली तस्करी उनके व्यवसाय को नुकसान पहुंचा रही है, लेकिन सरकार उस पर कोई ध्यान नहीं देती।
एक बार सरकार ने घोषणा की कि वह तस्करी को बर्दाश्त नहीं करेगी और उससे कठोरता से निपटेगी। इससे थोड़े समय के लिए तस्करी पर विराम लगा, लेकिन क्वेटा के दुकानदारों ने ईरानी दरी की कीमत बढ़ा दी। उनकी शिकायत थी कि इन दरियों की भारी मांग है, लेकिन सीमा पार से दरियां नहीं आती हैं, इसलिए कीमत बढ़ गई है। लेकिन तस्करी सौ फीसदी कभी नहीं रुकी और अब भी जारी है।
कुछ समय पहले ईरान ने बलूचिस्तान के भीतर हवाई हमले करके दुनिया को चौंका दिया था। उसका आरोप था कि ईरान-विरोधी आतंकवादी गुट वहां रहते हैं। उसके बाद पाकिस्तान ने भी ईरान के इलाकों पर बमबारी की और दावा किया कि ईरान के भीतर पाकिस्तान-विरोधी आतंकी गुटों को सुरक्षित पनाह मिली हुई है। सवाल उठता है कि अगर पाकिस्तान और ईरान, दोनों जानते हंै कि उनकी जमीन पर आतंकवादी गुट हैं, तो उन्हें दोनों मुल्कों द्वारा संरक्षण क्यों दिया जाता है। क्या दोनों मुल्क उन्हें प्रॉक्सी के तौर पर इस्तेमाल करते हैं? इससे दोनों मुल्कों के नागरिकों को बेहद खतरनाक और भ्रामक संदेश जाता है, जो एक-दूसरे को अपना मजबूत सहयोगी और मुस्लिम भाईचारे के हिस्से के रूप में देखते हैं और कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक साथ खड़े हैं। खैर, दोनों पक्षों के पीछे हटने से समझदारी कायम हुई। ईरान ने कूटनीतिक रिश्ते की बहाली के लिए अपने विदेश मंत्री को पाकिस्तान भेजा। अब दोनों मुल्कों के रिश्ते बेहतर हैं और इसी महीने के अंत में ईरानी राष्ट्रपति पाकिस्तान के दौरे पर आने वाले हैं।
इस्राइल पर ईरान के हमले ने, जिसमें अमेरिका, अन्य पश्चिमी देश एवं जॉर्डन इस्राइल की सहयता के लिए आगे आए, मुझे दो बातें याद दिला दीं।
पहली, दुनिया भर के मुल्कों को आशंका थी कि ईरान सीरिया में अपने राजनयिक मिशन पर हमले और वरिष्ठ अधिकारियों की मौत का बदला लेगा, लेकिन शक्तिशाली वायु सेना का दावा करने वाला इस्राइल हमले से हैरान रह गया। अमेरिका के नेतृत्व में बाहरी शक्तियां उसकी मदद के लिए आगे आईं। पश्चिमी समर्थकों की मदद के बिना इस्राइल अपनी रक्षा करने में असमर्थ था और वहां जान-माल का भारी नुकसान होता। दिलचस्प है कि जब इस्राइल ने कूटनीतिक नियमों का उल्लंघन कर सीरिया में ईरानी वाणिज्य दूतावास पर हमला किया, तो पश्चिमी देशों ने उसकी आलोचना नहीं की, लेकिन जब ईरान ने जवाबी कार्रवाई की, तो वे सभी ईरान की आलोचना करने लगे।
दूसरी बात को इस हफ्ते पाकिस्तान दौरे पर आए सऊदी विदेश मंत्री फैसल बिन फरहान और पाकिस्तानी विदेश मंत्री मोहम्मद इशाक डार ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में अच्छी तरह से समझाया। उन्होंने कहा कि कुछ ऐसी बातें हैं, जिन पर बात करने में सबको शर्म आती है। दोनों विदेश मंत्रियों ने कहा कि जबसे इस्राइल और हमास के बीच युद्ध शुरू हुआ है, इस्राइल ने 30 हजार से ज्यादा फलस्तीनियों की गाजा में हत्या कर दी है। उन्होंने पूछा कि जब इस्राइल ने गाजा में अस्पतालों, स्कूलों, खेल के मैदानों, आवासीय घरों पर बम गिराया, तो इस्राइल समर्थक पश्चिमी लॉबी ने उन्हीं तकनीकों से इस्राइल को रोकने की कोशिश क्यों नहीं की, जिन तकनीकों से उन्होंने ईरानी हमले से इस्राइल को बचाया है? आप कल्पना कर सकते हैं कि ऐसा करने पर कितने सारे बच्चे बच जाते!
सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने इस्राइल को तत्काल ईरान पर बमबारी करने से रोका और उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि इस्राइल ईरान पर हमला करता है, तो अमेरिका समर्थन नहीं करेगा। लेकिन क्या इस्राइल ईरान पर हमला करने से बाज आएगा? सऊदी विदेश मंत्री ने कहा, 'हम एक अस्थिर क्षेत्र में रहते हैं। यह क्षेत्र गाजा की मानवीय आपदा का दंश झेल रहा है और हमें और संघर्ष की आवश्यकता नहीं है, हम और टकराव नहीं चाहते।'