फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Mid day meal Issue

उत्तर के सवालों का दक्षिण में जवाब

Sun, 11 Aug 2013 06:08 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Sun, 11 Aug 2013 06:08 PM IST
विज्ञापन
Mid day meal Issue

अपने देश में कमजोर जनता के कल्याण के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों का एक सार्वभौमिक सच यह है कि उनकी गुणवत्ता भी कमजोर है। आज वही लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजते हैं, जो बेहद गरीब हैं, क्योंकि वहां मुफ्त में शिक्षा मिल जाती है।

विज्ञापन


ऐसे स्कूलों में आधारभूत सुविधाओं और शिक्षण का घोर अभाव है। द इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के हाल के एक आलेख में बताया गया है कि 1978-86 के दौरान प्राथमिक विद्यालयों में कुल नामांकन वृद्धि में से सिर्फ 2.8 फीसदी निजी स्कूलों की वजह से थी।
विज्ञापन


वर्ष 1993 से लेकर 2002 के बीच इसमें उछाल आया और यह 24 फीसदी रही। एक बार जब निजी स्कूल तेजी से उभरे तो अच्छी माली हालत वाले लोगों ने अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर इनमें भेजना शुरू कर दिया। निजी स्कूलों में सबसे ज्यादा पलायन अच्छी माली हालत वाले तबके और ऊंची जातियों से संबंध रखने वाले परिवारों के बच्चों का हुआ।
विज्ञापन
विज्ञापन


दोपहर का भोजन देने वाले सरकारी स्कूलों में सामान्य वर्ग के बच्चों के नामांकन में गिरावट आई है। इससे समझा जा सकता है कि किस तरह बच्चों को भूख से बचाने और शिक्षा की उपलब्धता बढ़ाने के लिए एक अच्छे उद्देश्य वाले राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम का यह हश्र हुआ।

बच्चों के दोपहर के भोजन में कहीं मरी हुई छिपकली मिलती है, तो कहीं दूषित तेल में खाना पकाया जाता है। हाल के दिनों में बिहार काफी चर्चा में रहा है। पिछले महीने छपरा जिले में कीटनाशक युक्त दूषित तेल में पकाए गए भोजन को खाकर 23 बच्चे अपनी जान गंवा बैठे।

इस कार्यक्रम को लागू करने में गंभीर खामियों और निगरानी की कमी को लेकर नीतीश कुमार सरकार कटघरे में है। लेकिन बिहार कोई अकेला राज्य नहीं है, जहां दोपहर के भोजन की योजना घोर अव्यवस्था का शिकार है। बिहार की घटना सामने आने के बाद देश भर से इस योजना के क्रियान्वयन में लापरवाही की बातें सामने आई हैं।

विभिन्न रपटों में यह बात सामने आई है कि भोजन तैयार करने में प्रयुक्त होने वाली सामग्री की खराब गुणवत्ता, किचन में पर्याप्त साफ-सफाई न होना, कई बार तो स्कूलों में किचन के ऊपर ठीक से छत भी नहीं होती, सामग्री मुहैया कराने वाली आपूर्ति श्रृंखला और खाना बनाने वाले पर पर्याप्त निगरानी जैसे मुद्दों को नजरअंदाज करने के चलते इस योजना की यह हालत हुई है।

दक्षिण भारत के तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी दोपहर के भोजन की योजना चल रही है, लेकिन सभी दलों के नेता इसे राजनीतिक प्राथमिकता देते हैं। स्कूल में भोजन देने वाले दुनिया के इस सबसे बड़े कार्यक्रम में उनका निवेश केवल उनकी समझदारी का परिचायक ही नहीं है, बल्कि वहां जमीनी स्तर पर लोग अपने इस अधिकार के बारे में जागरूक हैं।

इससे लोगों और नागरिक समाज की तरफ से इसमें लगातार सुधार को लेकर दबाव बना रहता है। प्राथमिक स्कूलों में दोपहर की भोजन योजना लागू करने वाला पहला राज्य तमिलनाडु ही था। वहां 1962-63 में यह योजना शुरू की गई थी।

इस योजना को लेकर गंभीरता की बात इसी से समझी जा सकती है कि स्कूली बच्चों को दोपहर में मिलने वाले भोजन में कितने अंडे होने चाहिए, यह वहां एक राजनीतिक मुद्दा है। यहां इससे फर्क नहीं पड़ता कि किस पार्टी की सरकार सत्ता में है।

दोपहर के भोजन की योजना के तहत करुणानिधि सरकार ने हर सप्ताह एक बच्चे को तीन अंडे देने की व्यवस्था की थी। जयललिता सरकार ने इसे बढ़ाकर एक सप्ताह में पांच अंडे कर दिया।

तमिलनाडु उन पहले राज्यों में से है, जिसने इस योजना की सफलता में खाना पकाने वाले की भूमिका को पहचाना और वह अकेला राज्य है, जहां दोपहर का भोजन तैयार करने वालों को कई सुविधाओं के साथ स्थायी सरकारी कर्मचारी बनाया गया है।

इसका मतलब यह नहीं है कि वहां सब कुछ दुरुस्त है। उन राज्यों में भी कुछ गड़बड़ियां सामने आ सकती हैं, जहां तुलनात्मक रूप से यह व्यवस्था दुरुस्त है।

उदाहरण के लिए बिहार में हुई दुखद घटना के बाद तमिलनाडु के कडेलोर जिले में 100 से ज्यादा स्कूली लड़कियां दूषित अंडे के सेवन से बीमार हो गईं। लेकिन गौर करने वाली बात हालात को दुरुस्त करने के लिए की जाने वाली कार्रवाई की रफ्तार की है।

माता-पिता को अधिकार है कि वे अपने बच्चे को किस स्कूल में भेजते हैं। जिनकी क्षमता है, वे अच्छे स्कूलों में अपने बच्चों को भेजेंगे। भारत में वास्तव में कितने लोग गरीब हैं, इस संख्या पर भी हम बहस कर सकते हैं।


लेकिन इसी देश में पांच साल से कम उम्र के 43 फीसदी बच्चे रकम वजन के हैं और कुपोषण की वजह से 48 फीसदी बच्चों की लंबाई कम है तो हमारे राजनेता उन बच्चों के भविष्य को नजरअंदाज कर सकते हैं, जिनके मां-बाप उन्हें अच्छे स्कूलों में भेजने या फिर पोषण युक्त आहार देने में अक्षम हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed