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नजरिया: गृह मंत्रालय के सीधे हस्तक्षेप से ही सामने आएगा मणिपुर हिंसा का सच
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सार
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Manipur Violence (File Photo)
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विस्तार
केंद्र सरकार को मणिपुर में हिंसा भड़काने के मामले में चीन पर अंकुश लगाने के लिए एक नई रणनीति बनानी होगी। दरअसल पूर्व सैन्य प्रमुख एमएम नरवाणे ने खुलासा किया है कि मणिपुर में हिंसा भड़काने के लिए विभिन्न विद्रोही गुटों की सहायता करने में चीन की भागीदारी की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता।
मणिपुर म्यांमार के साथ 400 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है, जो राजनीतिक उथल-पुथल की चपेट में है, इसलिए हथियार एवं वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए वहां से संचालित विद्रोही गुटों का झुकाव चीन की तरफ है। आतंकी समूहों को तस्करी के जरिये हथियार मुहैया कराने का चीन का इतिहास रहा है, जिसके बारे में सैन्य जनरलों ने चार साल पहले कहा था।
विश्लेषकों का कहना है कि गृह मंत्रालय को मणिपुर की स्थिति संभालने के लिए सीधे हस्तक्षेप करना चाहिए और पूर्व सैन्य प्रमुख ने जिस तरह से इसके पीछे विदेशी हाथ होने की आशंका जताई है, उसकी जांच करनी चाहिए। उनकी आशंका को हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता के अलावा उनका कोई निहित स्वार्थ नहीं हो सकता। मणिपुर की राज्यपाल अनुसुइया उइके ने भी सीमा पार से शत्रुओं के घुसपैठ की आशंका जताई है।
ध्यान रखना चाहिए कि म्यांमार से घुसपैठियों के प्रवेश को विपक्ष हमारे सुरक्षा बलों की विफलता बता रहा है। भारत को चीन की संदिग्ध भूमिका की जांच अवश्य करनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्व सेना प्रमुख के पास म्यांमार से संचालित होने वाले विद्रोही समूहों के माध्यम से चीनी सहायता के बारे में कुछ सुराग हो सकते हैं। चीन हमेशा शांतिपूर्ण सीमावर्ती राज्यों, जैसे-मणिपुर, अरुणाचल आदि को अस्थिर करने का प्रयास करेगा, जो रणनीतिक रूप से उसके लिए उपयुक्त है।
यहां तक कि म्यांमार की सेना ने भी चीन पर आतंकी समूहों की मदद करने का आरोप लगाया है। म्यांमार के सैन्य जनरलों ने अराकन आर्मी (एए) और अराकन रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (एआरएसए) जैसे आतंकवादी संगठनों को आपूर्ति किए जा रहे हथियारों के बारे में म्यांमार की चिंताओं को उजागर किया था, जो चीन की सीमा से लगे पश्चिमी म्यांमार के रखाइन प्रांत में सक्रिय थे। सैन्य अधिकारियों ने चीन निर्मित हथियारों का हवाला दिया था, जिनका इस्तेमाल आतंकवादी समूहों ने 2019 में सेना पर किए गए बारूदी हमलों में किया था।
इस पृष्ठभूमि में चीन म्यांमार में सैन्य शासन के तहत दबाव महसूस करने वाले विद्रोहियों का समर्थन करने के लिए म्यांमार सीमा का उपयोग करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेगा। चूंकि दुनिया का ध्यान अभी यूक्रेन युद्ध की तरफ है, इसलिए म्यांमार का सैन्य शासन आंग सान सू की के नेतृत्व वाले लोकतांत्रिक ताकतों पर ज्यादती कर रहा है और भारत तटस्थ रुख अपनाए रखने की कोशिश कर रहा है, जो महंगा साबित हो रहा है, क्योंकि म्यांमार की सेना और आम लोगों के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि म्यांमार के सैन्य जनरलों को सत्ता से चिपके रहने से मतलब है, इसलिए उन्हें घुसपैठ और मणिपुर के हिंसक विद्रोही गुटों को सीमा पार से हथियारों की आपूर्ति की कोई चिंता नहीं है।
मणिपुर में लगातार गृहयुद्ध जैसी स्थिति पड़ोसी राज्यों में भी 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को प्रभावित कर सकती है, जहां भाजपा का वर्चस्व है। इस वर्ष के अंत तक राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में चुनाव होंगे, जो 2024 में केंद्र में सत्ता में बने रहने की खातिर भाजपा के लिए महत्वपूर्ण होंगे। मणिपुर में शांति की स्थापना भाजपा के लिए अनिवार्य है, क्योंकि वहां की सरकार को 'डबल इंजन' की सरकार कहा जाता है। वहां शांति स्थापित करने में विफलता से नकारात्मक संदेश जाएगा, क्योंकि विपक्ष पर बढ़त पाने के लिए भाजपा अक्सर 'डबल इंजन सरकार' का नारे के रूप में उल्लेख करती है। इसके अलावा, आगामी चुनावों में मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष भी इस मुद्दे पर फायदा उठा सकती है।
भले ही मणिपुर मुद्दे को हमारा आंतरिक मामला बताया जा रहा है, लेकिन यूरोपीय संसद ने एक प्रस्ताव पारित कर हमारी सरकार से तमाम जरूरी कदम उठाने और ईसाई समुदाय जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा करने के लिए जातीय एवं धार्मिक हिंसा को तत्काल रोकने के लिए अधिकतम प्रयास करने को कहा है। इससे पूरी दुनिया में भारतीय लोकतंत्र की छवि खराब हुई है। भारत ने औपनिवेशिक मानसिकता रखने के लिए यूरोपीय संसद को फटकार लगाई है।
लेकिन मणिपुर हिंसा मोदी सरकार और नवगठित विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' के बीच खुले टकराव का मुद्दा बन गई है, जिसने अपने 21 सांसदों के प्रतिनिधिमंडल को मणिपुर भेजा था। विपक्ष ने संसद की कार्यवाही को बाधित किया और इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री के बयान की मांग की। प्रधानमंत्री मोदी ने मणिपुर मुद्दे पर संसद से बाहर संक्षिप्त टिप्पणी की और राष्ट्र को गुमराह करने के लिए विपक्ष को कोसा। उन्होंने कांग्रेस शासित राज्यों-राजस्थान और छत्तीसगढ़ में महिलाओं पर अत्याचार रोके जाने के लिए कहा, जिससे कांग्रेस नेतृत्व नाराज हो गया। अब संसद में आमने-सामने की लड़ाई जारी है, और आखिरकार अविश्वास प्रस्ताव पर चली बहस के दौरान मणिपुर पर चर्चा हुई।
दुर्भाग्य से सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों का ध्यान राजनीतिक लाभ पर केंद्रित हो सकता है, जो आत्मघाती होगा, क्योंकि मणिपुर हिंसा ने राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। इसी तरह से युद्धरत समुदाय अपनी-अपनी कहानी सुना रहे हैं, जो सच्चाई से दूर हो सकती है और शांति और समाधान चाहने वाले लोगों की उम्मीदों को झुठला सकती हैं। विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र सरकार को तेजी से म्यांमार-भारत की 163 किलोमीटर की सीमा पर बाड़ लगाने चाहिए, ताकि सीमा पार से आंतकियों की घुसपैठ रोकी जा सके। हालांकि भारत के आतंकी गुट, जो म्यांमार में भागकर शरण लेते हैं, कभी नहीं चाहेंगे कि सीमा पर बाड़ लगाई जाए।
मणिपुर के लोग शांति के हकदार हैं, इसलिए हिंसा रोकने के लिए मजबूत पहल की जरूरत है, जिसने वहां के सामाजिक ताने-बाने और विभिन्न समुदायों के बीच भाईचारे को नष्ट कर दिया है। इसके लिए केंद्र सरकार और विपक्ष को छुद्र राजनीति से ऊपर उठकर संयुक्त प्रयास करने होंगे, जो देश के लिए भी अच्छा होगा।