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दीपोत्सव: पग-पग दिवाली की श्री... बच्चों को स्नेह-सद्भाव की अपनी उज्ज्वल सांस्कृतिक परंपरा के उजाले में लाना..

Thu, 31 Oct 2024 04:20 AM IST
mamata kalia ममता कालिया
Updated Thu, 31 Oct 2024 04:20 AM IST
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सार
मन की मलिनता को मिटाने और अंतर के अंधेरे को दूर करने की प्रेरणा हमें दिवाली से मिलती है। दिवाली के ठीक बाद छठ का त्योहार आता है, जो नदियों के किनारे मनाया जाता है। इसलिए साफ-सफाई का यह कार्यक्रम दिवाली से लेकर छठ घाट पर ही संपन्न होता है।
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Messae of Diwali let our children grow in light of enlightened bright cultural society
प्रतीकात्मक फोटो - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यों तो आम तौर पर सारे हिंदू पर्व-त्योहार शुक्ल पक्ष में मनाए जाते हैं, लेकिन दिवाली की खासियत है कि यह कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है और वह भी अमावस्या की गहन अंधेरी रात को। मान्यता है कि इसी दिन 14 वर्ष के वनवास के बाद भगवान श्रीराम भाई लक्ष्मण एवं सीता जी के साथ अयोध्या लौटे थे और उसी की खुशी में दिवाली मनाई गई थी, जो परंपरा के रूप में आज तक चली आ रही है। लेकिन मुझे लगता है कि यह मनुष्य की उस अदम्य इच्छाशक्ति का भी त्योहार है कि वह घनी अंधेरी रात को भी अपने उद्यम के दीपों से रोशन कर सकता है। तमसो मा ज्योतिर्गमय-यानी अंधेरे से उजाले की तरफ जाने की मनुष्य की अदम्य इच्छाशक्ति ही है, जो सारे जगत में उजियारा फैला देती है।



अंधेरे से उजाले की तरफ जाने की मनुष्य की यही अदम्य इच्छाशक्ति हमें अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जाती है और अपने चारों तरफ ज्ञान की रोशनी फैलाने के लिए प्रेरित करती है। ज्ञान के बगैर चेतना नहीं और चेतना के बिना मन के भीतर का अंधेरा नहीं मिट सकता है। और जब तक हम अपने भीतर के कलुष को, मन की मलिनता को नहीं मिटा देते, तब तक लाख दीये जला लें, खुशहाली का उजाला नहीं फैल सकता है। शायद यही कारण रहा होगा कि गौतम बुद्ध ने अप्प दीपो भव का आह्वान किया था, क्योंकि हमारे मन के भीतर के अंधेरे को कोई दूसरा नहीं मिटा सकता, हमें खुद ही दीपक बनना होगा और अपने भीतर के अंधेरे को मिटाने के साथ ही अपने चारों तरफ अज्ञानता के अंधेरे को मिटाना होगा। मन की मलिनता को मिटाने और अंतस के अंधेरे को दूर करने की यही प्रेरणा हमें दिवाली से पहले अपने घर-द्वार से लेकर आसपास के वातावरण की साफ-सफाई के लिए प्रेरित करती है। दिवाली के ठीक बाद छठ का त्योहार आता है, जो नदियों के किनारे मनाया जाता है। इसलिए साफ-सफाई का यह कार्यक्रम दिवाली से लेकर छठ घाट पर ही संपन्न होता है।


एक और खास बात है कि हमारे ज्यादातर सांस्कृतिक त्योहार प्रकृति, पर्यावरण और कृषि संस्कृति को सहेजने और संरक्षित करने के भी अवसर होते हैं। बचपन में हमने देखा है कि घरों में जब दिवाली के दिन दीये जलाए जाते थे, तो एक दीया कुएं, तालाब, पेड़-पौधों, फुलवारी के पास भी जलाया जाता था। यानी अपने उत्सव में प्रकृति और पर्यावरण को भी शामिल करने की हमारी संस्कृति रही है। हालांकि दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि ग्रामीण संस्कृति के पराभव और महानगरीय संस्कृति के इस चकाचौंध वाले दौर में हमारी वह पारंपरिक संस्कृति छीजती जा रही है। अभी हाल यह है कि दिवाली से पहले ही वायु की गुणवत्ता दिल्ली-एनसीआर समेत कई शहरों में इतनी खराब हो चुकी है कि सांस लेने में भी मुश्किल हो रही है और मन यही सोचकर डर रहा है कि दिवाली के बाद न जाने हवा कैसी होगी! पटाखों का शोर और धुआं त्योहार की खुशहाली को धूमिल करते हैं।

यही नहीं, दिवाली के अवसर पर परस्पर मिलने-जुलने की जो संस्कृति थी, उसमें भी कमी आई है। हालांकि पहले भी हर शहर की त्योहार मनाने की अपनी-अपनी संस्कृति होती थी, जो हमारी बहुलतावादी संस्कृति की परिचायक थी। मैं पहले कोलकाता में रहती थी और वहां मैंने देखा कि कोलकाता के लोग त्योहारों को कलात्मक ढंग से मनाते हैं। बहुत ही सौम्य और सुरुचिपूर्ण तरीके से कोलकाता में दिवाली मनाई जाती है। फिर दशकों इलाहाबाद (जो अब प्रयागराज हो गया है) में रही और वहां दिवाली का अवसर परस्पर मिलने-जुलने का होता था। लेकिन आजकल दिल्ली-एनसीआर में रहती हूं, जहां अपार्टमेंट कल्चर में लोग खुद में ही सिमटे रहते हैं और यहां दिखावे की संस्कृति हावी रहती है। लोग अपनी संपन्नता और समृद्धि का दिखावा करते दिखते हैं।

महादेवी वर्मा की एक कविता है-मधुर-मधुर मेरे दीपक जल। दीपावली का सौंदर्य दीपों की मधुर और सौम्य रोशनी में ही निखरता है, समृद्धि की चकाचौंध वाली रोशनी में नहीं। लेकिन आजकल दिवाली के मौके पर समृद्धि की यह चकाचौंध इतनी ज्यादा है कि असमानता की अंधेरी खाई साफ दृष्टिगोचर होती है। इसलिए तो अज्ञेय को कहना पड़ा-यह दीप अकेला स्नेह भरा/ है गर्व भरा मदमाता/ पर इसको भी पंक्ति को दे दो। यहां अज्ञेय कहते हैं कि यह स्नेह और गर्व से जो मदमाता दीप है, वह पूर्णता के बोध से अकेला हो गया है। लेकिन अकेला होकर कोई कितना भी पूर्ण और समृद्ध हो जाए, वह सार्थक नहीं हो सकता है। इसलिए इस एकाकी दीप को भी अन्य दीपों की पंक्तियों में शामिल कर लिया जाए। सोहनलाल द्विवेदी लिखते हैं-राजा के घर, कंगले के घर/हैं वही दीप सुंदर सुंदर!/दिवाली की श्री है पग-पग/जगमग जगमग जगमग जगमग! केदारनाथ सिंह की यह कविता देखिए-एक दीया वहां जहां अभी-अभी धुले/नये चावल का गंधभरा पानी फैला है/एक दीया उस घर में/जहां नई फसलों की गंध छटपटाती हैं,/एक दीया उस जंगले पर जिससे/दूर नदी की नाव अक्सर दिख जाती हैं/एक दीया वहां जहां झबरा बंधता है/एक दीया वहां जहां पियरी दुहती है...।

दीपावली को लक्ष्मी पूजन का पर्व भी कहा जाता है और यह भी माना जाता है कि लक्ष्मी और सरस्वती में वैर होता है, लेकिन मेरा मानना है कि ऐसा नहीं है, बल्कि सरस्वती और लक्ष्मी एक-दूसरे की पूरक हैं। अगर सरस्वती (ज्ञान और बुद्धि) का साथ न हो, तो लक्ष्मी आ भी जाए, तो टिकती नहीं है। मैं सरस्वती की साधिका हूं, मेरे पास तो जो भी लक्ष्मी आती है, वह सरस्वती की बदौलत ही आती है। मेरे लिए, तो किताबों से बढ़कर कोई धन नहीं, कोई देवी-देवता नहीं।

यह ठीक है कि दिवाली सुख-समृद्धि का उत्सव है, लेकिन यह त्योहार बुराइयों के अंधेरे से ज्ञान के उजाले की तरफ बढ़ने का भी उत्सव है। आजकल दिवाली के अवसर पर महंगे उपहारों को खरीदने-बेचने की संस्कृति बढ़ी है। लेकिन वास्तव में यह खुशहाली बांटने और समाज के अंधेरे कोनों को रोशन करने का त्योहार है। अपनी समृद्धि का दिखावा करने से हमें बचना चाहिए और उन लोगों की तरफ मदद का हाथ बढ़ाना चाहिए, जो वंचित हैं। हमें अपने बच्चों को स्नेह-सद्भाव की अपनी उज्ज्वल सांस्कृतिक परंपरा के उजाले में लाना चाहिए, क्योंकि हमारे सांस्कृतिक मूल्य ही हमें जीवन-शक्ति प्रदान करते हैं।

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