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इनके घोषणापत्र तो निराश ही ज्यादा करते हैं

Thu, 08 May 2014 07:46 PM IST
उदय प्रकाश अरोड़ा
उदय प्रकाश अरोड़ा Updated Thu, 08 May 2014 07:46 PM IST
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Menifesto of political parties

विभिन्न राजनीतिक दलों ने जब अपने घोषणापत्र जारी किए थे, तब यह सहज जिज्ञासा थी कि जिस भारत की वे सेवा करना चाहते हैं, वह उनके लिए क्या अर्थ रखता है? कांग्रेस चूंकि देश की सबसे पुरानी पार्टी है, इसलिए अपनी उपलब्धियों को गिना सकने की उसे सुविधा है। उसका मानना है कि स्थापना के समय से लेकर आज तक समाज के हर वर्ग के लिए उसने आवाज उठाई है। यद्यपि गांधी के अतिरिक्त नेहरू, पटेल और मौलाना आजाद सहित कई हस्तियों ने कांग्रेस का मार्गदर्शन किया, किंतु पार्टी के घोषणापत्र में गांधी के अतिरिक्त किसी का नाम नहीं लिया गया है। वहां भी सिर्फ इतना कहना पर्याप्त समझा गया कि भारत के विषय में कांग्रेस की वही सोच है, जो गांधी जी की थी।

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लेकिन आजादी के बाद की कांग्रेस को क्या गांधी के नेतृत्व में कार्य कर रही कांग्रेस की निरंतरता माना जा सकता है? स्वतंत्रता के बाद की कांग्रेस एक राष्ट्रीय आंदोलन नहीं, बल्कि और दलों की ही तरह मात्र एक राजनीतिक पार्टी है। गांधी जी का मानना था कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस की कोई आवश्यकता नहीं। ऐसे में वर्तमान कांग्रेस यदि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और 1885 में स्थापित कांग्रेस की वैध उत्तराधिकारी केवल स्वयं को मानती है, तो यह एक विचारणीय विषय होगा।
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स्वतंत्रता संग्राम में हिंदुओं के साथ मुसलमानों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। किंतु आम आदमी पार्टी को छोड़ किसी ने अपने घोषणापत्र में मुस्लिम नेताओं का उल्लेख नहीं किया। आप ने गांधी के अलावा सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, अश्फाक उल्लाह खां, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल और मंगल पांडे को स्मरण किया है। उसने 1857 के महासंग्राम की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित किया, जो किसी अन्य घोषणापत्र में नहीं है। आप के नारों में भी कौमी एकता दिखाई पड़ती है। उनकी जनसभाओं में युवाओं द्वारा क्रांतिकारियों की कुर्बानी संबंधित नाटक पेश किए जाते हैं। यह सब ऐसा है, जो भारत के चुनावी राजनीतिक मंचों पर मुश्किल से दिखाई पड़ता है।
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कांग्रेस और आप राष्ट्रीयता का स्रोत ढूंढने आजादी की लड़ाई के इतिहास के पीछे जाना जरूरी नहीं समझतीं, जबकि भाजपा भारत को विश्व की प्राचीनतम सभ्यता मानते हुए ईसा से हजारों वर्ष पूर्व से भारतीय राष्ट्रीयता का स्रोत ढूंढना प्रारंभ करती है। वह मानती है कि वेद, उपनिषद, गौतम, महावीर, कौटिल्य और चंद्रगुप्त के समय से लेकर लगभग 18वीं शताब्दी के अंत तक भारत विश्व के समृद्धशाली देशों में था। मुस्लिम शासकों का काल भी समृद्धि का युग था, पर यह विचार संघ से जुड़े दक्षिणपंथी इतिहासकारों से मेल नहीं खाता। गौरतलब है कि भाजपा का घोषणापत्र 11वीं सदी के एक स्पेनिश मुस्लिम कादी अल-अंदलूसी द्वारा लिखे गए शब्दों से प्रारंभ होता है, 'भारत पहला ऐसा देश है, जिसने वैज्ञानिक ज्ञान को आगे बढ़ाया है।'

जिन महापुरुषों ने इस राष्ट्र के लिए कुर्बानी दी, उनमें भाजपा ने तिलक, गांधी, अरबिंद, पटेल और बोस को स्मरण किया है। उसने विवेकानंद और श्री मां (माता आनंदमयी) के वचनों को उद्धृत किया है। पर अपने खजाने में से किसी को भी उसने जिक्र करने के योग्य नहीं समझा, अन्यथा सावरकर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी आदि में से किसी का तो उल्लेख किया जा सकता था।


इसी तरह बाबा साहेब अंबेडकर बसपा के कब्जे में हैं, तो सपा के घोषणापत्र में नेताजी ही छाए हुए हैं। वहां लोहिया को भी स्मरण करने की आवश्यकता नहीं समझी गई। जाहिर है, स्थापित राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्रों को गहराई से देखने पर निराशा ही हाथ लगती है। ऐसे में, उनसे किस आदर्श की उम्मीद की जाए?

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