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टेंडर की तरह मेनिफेस्टो

Fri, 15 Aug 2014 11:53 AM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Fri, 15 Aug 2014 11:53 AM IST
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Menifesto like tender

पिछली बार गलती हो गई थी कि विपक्षी दल का मेनिफेस्टो आने से पहले ही सरकारी दल ने अपना घोषणापत्र जारी कर दिया था। चुनाव के बाद वही सरकारी दल विपक्षी दल हो गया! तब यह मान लिया गया था कि मेनिफेस्टो जारी करने में जल्दबाजी ने चुनाव हरवा दिया, क्योंकि सरकारी दल ने जो-जो वायदे किए थे, विपक्षी दल ने उसमें एक-एक बढ़ा दिया। जैसे सरकारी दल ने कहा था कि हर घर से एक व्यक्ति को काम दिया जाएगा, तो विपक्षी दल ने दो को काम देने की बात कह दी। त्रिशूल में संजीव कुमार जितने का टेंडर भरते थे, अमिताभ एक रुपया कम कर टेंडर ले उड़ते थे।

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टेंडर का ठीक उलटा होता है मेनिफेस्टो में। मेनिफेस्टो से पार्टी को यह फायदा होता है कि हारने के बाद आपस में लड़ने और जुबानी तीर चलाने के बजाय यह मान लिया जाता है कि घोषणापत्र में कमी की वजह से चुनाव हारे हैं। मेनिफेस्टो कोई एक तो बनाता नहीं है कि उसे दोष दिया जाए। यह तो परंपरा की तरह होता है। कोई नहीं जानता कि पहला घोषणापत्र किसने लिखा था। बाद के नेताओं ने कभी अपनी तरफ से कुछ जोड़ने की समझ इसलिए भी नहीं दिखाई कि उन्हें खुद पढ़ना-लिखना कहां आता था! पढ़े-लिखे होते, तो कहीं पक्की सरकारी नौकरी कर रहे होते, भला इस टेंपररी जॉब में क्यों जीवन भर अटके रहते। जो बाद की पीढ़ी पढ़-लिख गई, उसे भी लगा कि बड़े-बुजुर्गों ने बनाया है घोषणापत्र, तो ढंग का ही होगा। फेरबदल उचित नहीं।
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कई दलों को तो आज तक नहीं मालूम कि उनका पहला मेनिफेस्टो किसने तैयार किया था। यह तो चार सौ मीटर रिले दौड़ के बैटन की तरह इस हाथ से उस हाथ जा रहा है। बैटन पकड़ने वाले को क्या मालूम कि बैटन किसका है, उसे तो लेकर दौड़ना भर है। पार्टी में और मुद्दों पर भले ही बहसबाजी हो जाती हो, मेनिफेस्टो पर कोई जुबान नहीं लड़ाता। घोषणापत्र को लेकर किसी नेता ने आज तक न तो उंगली उठाई है, न ही मुंह फुलाया है, पार्टी छोड़ने की तो बात रहने ही दीजिए।
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मेनिफेस्टो असल में, जारी करने के लिए ही तैयार होता है। यह एक तरह का शुभ शगुन है कि मेनिफेस्टो तैयार हो गया है, तो सारा चुनाव निर्विघ्न निपट जाएगा। मेनिफेस्टो बनाने वाले यदि परेशान नहीं होते, तो वोटर भी इससे एक हाथ दूर ही रहते हैं कि पढ़ लिया, तो और कलेजा जलेगा। चुनाव में मेनिफेस्टो ही वह संधि बिंदु है, जहां नेता और जनता एकमत हैं। यानी किसी को न तो उम्मीद है, न ही शिकायत। चुनाव की ऐसी शुरुआत क्या बुरी है!

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