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भूल नहीं पाता फिदेल कास्त्रो से वह मुलाकात

Sat, 03 Aug 2013 08:12 PM IST
कैलाश वाजपेयी/वरिष्ठ साहित्यकार
कैलाश वाजपेयी/वरिष्ठ साहित्यकार Updated Sat, 03 Aug 2013 08:12 PM IST
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meeting with fidel castro

हम पहले कभी इसी स्तंभ में लिख चुके हैं कि हमें अपने मित्र युधिष्ठिर के साथ जाना था मानसरोवर, मगर फिदेल कास्त्रो के कारण हमें भेज दिया गया हवाना। कारण हमें बाद में ज्ञात हुआ।

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यों समझें कि मेक्सिको में रहते हुए हमने तीन-तीन पुस्तकें स्पैनिश भाषा में प्रकाशित की। हमारे प्रकाशक डॉ. लुइस मुनीस के अनुसार हमारी आवाज की एक सीडी भी शायद यहां-वहां सुनने को मिल जाती है।
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संप्रति यहां इतना भर कहना अलम होगा कि सन् 1983 में जब फिदेल कास्त्रो अपने मित्र गाब्रियल गार्सिया-मारकेस (लातिनी भाषा में यही शब्द बोला जाता है।) के साथ दिल्ली आए तो राष्ट्रपति होने के कारण फिदेल को तो राष्ट्रपति भवन में ही ठहराया गया, लेकिन गाब्रियल को अकबर होटल में।
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हमारी तत्कालीन प्रधानमंत्री की निजी सचिव उषा भगत ने फोन पर सूचना दी कि हम गाब्रियल के साथ थोड़ा समय बिताएं। हमारी टूटी-फूटी स्पेनिश और मारकेस की कामचलाऊ अंग्रेजी दोनों का तालमेल ठीक ही रहा। उसी मुलाकात के दौरान यह पता चला कि फिदेल के मन में रचनाकारों के प्रति कितना आदरभाव है।

इसी के साथ यह भी कि ज्ञान के प्रति कास्त्रो के मन में एक अदम्य प्यास है। फिदेल ने स्पेनिश भाषा में उपलब्ध हमारी कोई पोथी जरूर पढ़ी होगी। वरना उषा भगत के माध्यम से हमें '1 सफदरजंग' में यों ही न बुलाया गया होता। इंदिरा जी कवि-कलाकारों को जितना स्नेह देती थीं, फिदेल भी शायद स्वभाव से कुछ ऐसे ही थे।

तभी तो वे गाब्रियल गार्सिया-मारकेस को अपने साथ दिल्ली ले आए थे। उस मुलाकात की परिणति यह हुई कि दो सप्ताह के भीतर हमें हवाना जाना पड़ा। हमारे साथ राजा राधा रेड्डी और मारग्रेट अल्वा भी सांस्कृतिक मंडल की नेता बनकर गईं।

अमेरिका होकर क्यूबा (स्पेनिश भाषा में कूबा) पहुंचना उन दिनों वर्जित था। आज भी क्यूबा जाने के लिए पहले कनाडा जाना होता है। हम भी पहले कनाडा गए। फिर वहां से समुद्र के ऊपर उड़ते हुए हवाना पहुंचे।

हवाना के हवाई अड्डे का नाम है, होसे मार्ती। सेन्योर होसे मार्ती, वहां बिलकुल उसी तरह पूजे जाते हैं, जिस तरह अपने यहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी। इन्हीं होसे मार्ती ने सन् 1878 से 1895 के बीच अपने देश के लोगों का नेतृत्व करते हुए क्यूबा को गुलामी के चंगुल से छुड़ाकर स्पेन की दासता से मुक्त कराया था।

आज जब रूस जैसा देश माफियाग्रस्त है, चीन में घूसखोरी का राजरोग फैल चुका है और भारत में धर्मगुरु मुर्दों तक के आभूषण लूट लेते हैं, तब भी क्यूबा अकेला ऐसा देश है, जहां कार्ल मार्क्स का वर्चस्व अभी भी कायम है। पहले दिन हवाना के विश्वविद्यालय में राजा राधा रेड्डी के नृत्य का कार्यक्रम हुआ।

दूसरे दिन राइटर्स यूनियन के सभागार में क्यूबा के राष्ट्र कवि निकोलस गिएन की अध्यक्षता में काव्यपाठ हुआ, जिसमें स्थानीय कवियों के ही साथ हमने भी अपनी पुस्तक ‘एक आर्बोल दे कार्ने’ (मांसवृक्ष) से कुछ रचनाओं का पाठ किया। अगले दिन राइटर्स यूनियन के उसी सभागार में एक व्याख्यान आयोजित था।

व्याख्यान के बाद जैसा कि होता है प्रश्नोत्तर श्रृंखला देर तक चली। दूसरे दिन अखबार में छपा-‘एन ला इंदिया से हासे अहोरा उना पोएजिया मास सोसियाला जादा’ अर्थात भारत में इन दिनों समाजवादी कविता लिखी जा रही है।

उसी शाम फिदेल कास्त्रो के आवास पर हमें प्रीति भोज में शामिल होने के लिए ले जाया गया। कास्त्रो के महल के भीतर छोटे पहाड़ और कृत्रिम सी लगती हरीतिमा के बीच से होकर कई झरने बहकर नीचे बने सरोवर में गिर रहे थे, जहां जलकुंभी के बीच तैरती मछलियां अठखेलियां कर रही थीं।

बाहर के तापमान को चुनौती देती, पता नहीं किन अदृश्य झरोखों से ठंडी हवाएं आ रही थीं। हमारे वहां पहुंचते ही फिदेल ने मारग्रेट अल्वा का गर्मजोशी से स्वागत किया। हाथ मिलाते हुए हमने झिझकते हुए राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो से धीमे स्वर में कहा, ‘सेन्योर! ऊस्तेद कासा एस मास ग्रांदे’ अर्थात श्रीमान आपका आवास अत्यधिक शानदार है।

कास्त्रो ने तपाक से उत्तर दिया, ‘सी पेरो एस्ता कासा आई दे ला हुन्ता दे कूबा’ अर्थात यह आवास मेरा नहीं कूबा की जनता का है। उत्तर सुनकर हमें लगा फिदेल कास्त्रो सही अर्थों में जननायक हैं। भोज के बीच राष्ट्रकवि निकोलस गिएन ने बताया, 'फिदेल ने जब यहां सत्ता संभाली तो यहां के चर्च और अन्य प्रार्थनाघरों को मुगलों की तरह नष्ट नहीं किया। तुम्हें यह जानकर अच्छा लगेगा कि यहां एक कृष्णमंदिर भी है।'

दूसरे दिन हमें उस चर्चनुमा मंदिर ले जाया गया। क्यूबा के अन्य प्रार्थनाघरों की तरह वह मंदिर भी वीरान पड़ा था। एक सरकारी चौकीदार उसे साफ कर बाहर खड़ा था। दुभाषिनी ने बताया कि सन् 48 के आसपास न्यूयॉर्क स्थित ‘डिवाइन लाइट मिशन’ के श्रीयोगानंद हवाना आए थे।


उन्होंने ही यह मंदिर बनाया था। भीतर घुसते ही सामने की दीवार पर एक तैलचित्र अंकित था। यह वही चित्र था, जिसमें श्रीकृष्ण वल्गा संभाले सारथि बने खड़े हैं। चित्र देखकर आंखें खुली की खुली रह गईं। दुभाषिनी ने बताया कि भारत जाने से पहले स्पेनिश भाषा में छपी गीता (जिसकी भूमिका के अंत में आपका नाम छपा है) पढ़कर फिदेल भी यहां आए थे। शायद इसलिए आप आज यहां हमारे राष्ट्रपति के मेहमान हैं। तभी हमें याद आए श्रीकृष्ण के ये शब्द, ‘हे कौन्तेय! अंत में सभी भूत मुझमें ही लीन हो जाते हैं।’

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