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औरत की चुप्पी टूटने का मतलब

Fri, 29 Nov 2013 10:59 AM IST
सुभाषिनी अली/ माकपा नेत्री
सुभाषिनी अली/ माकपा नेत्री Updated Fri, 29 Nov 2013 10:59 AM IST
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means to break women's silence

मीना कुमारी की एक फिल्म थी, मैं चुप रहूंगी, जिसे काफी ख्याति मिली। अपने खिलाफ होने वाले अन्याय को चुपचाप बर्दाश्त करने वाली नारी इस फिल्म की नायिका थी। और वही नारी हमारे सामने आदर्श के रूप में जमाने-जमाने से पेश की जा रही है।

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चुप्पी साधे रखने से ही महिलाएं अपने आपको, अपनी इज्जत को और अपने परिवार की इज्जत को बचाकर रख सकती हैं। इस चुप्पी का जन्म अगर भय से होता है, तो इस बात की उम्मीद उसका पोषण करती है, कि कभी न कभी इस चुप्पी का सिला मिलेगा, उसका श्रेय प्राप्त होगा। उनकी इस चुप्पी का महत्वपूर्ण पहलू लड़कियों और महिलाओं से छिपाया जाता है। उनकी यह चुप्पी उन पर अन्याय करने वालों का मन बढ़ाता है और उसे स्वीकृति और सहमति का रूप देकर उन्हें ही अपने साथ होने वाले अन्याय के लिए जिम्मेदार ठहराता है।
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1978 में महाराष्ट्र के ठाणे जिले के ठुंबा थाने में एक नाबालिग आदिवासी लड़की को उसके भाई के साथ रात भर रखा गया। दूसरे दिन लड़की ने शिकायत की कि उसके साथ रात में पुलिस वालों ने सामूहिक बलात्कार किया था। पहले उच्च न्यायालय और बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपियों को यह कहकर बरी कर दिया कि चूंकि लड़की ने प्रतिरोध नहीं किया, इसलिए जो कुछ हुआ, सहमति से हुआ। 12 साल की लड़की ने वर्दीधारियों का प्रतिरोध क्यों नहीं किया, यह हम समझ सकते हैं, पर न्यायाधीश नहीं समझ पाए।
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इस लड़की का मुकदमा जिन संगठनों ने लड़ा था, उन्होंने कानून में संशोधन की लड़ाई लड़ी। जिसके बाद नाबालिग लड़की के खिलाफ यौन संबंध बलात्कार ही माना गया। यही नहीं, हिरासत में होने वाले बलात्कार के मामलों में सख्त धाराएं जोड़ी गईं। पिछले साल दिल्ली की घटना के बाद बलात्कार की परिभाषा को विस्तृत किया गया और कानून को और सख्त बनाया गया। काम की जगह पर होने वाले यौनिक शोषण के खिलाफ भी कानून पारित किया गया। उम्मीद बनी थी कि अब लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा बढ़ेगी, लेकिन पिछले दिनों की घटनाओं से यह उम्मीद फीकी पड़ गई है।

विगत 21 अगस्त को दिल्ली के कमला नगर थाने में एक 16 वर्षीय लड़की ने एफआईआर दर्ज की कि 15 अगस्त की रात में आसाराम ने अपने जोधपुर स्थित आश्रम में उसे यौन हिंसा का शिकार बनाया। कई दिनों के बाद ही इस पर कार्रवाई हुई और हफ्तों के बाद आसाराम जेल भेजे गए। अदालत के सामने नामी-गिरामी वकील राम जेठमलानी ने लड़की की चुप्पी का सवाल उठाया, 'जब वह कमरे से निकली, तो वह बोली क्यों नहीं। कमरे के अंदर वह चिल्लाई क्यों नहीं।' वकील साहब ने उसकी उम्र अधिक होने का भी दावा किया और अंत में यह भी कह डाला कि यह परिवार कुछ कांग्रेस के लोगों द्वारा प्रेरित है।

लड़की का नाबालिग होना उसके स्कूल के सार्टिफिकेट से साबित हो चुका है। एक नाबालिग लड़की ऐसे व्यक्ति के प्रहार से, जिन्हें वह भगवान मानती है, चुप क्यों नहीं होगी? और जब वह व्यक्ति उसके मां-बाप को मार डालने की धमकी देता है, तो फिर वह चुप क्यों नहीं होगी? जब उसके आश्रम की दीवारों पर उसकी तस्वीर तमाम नेताओं के साथ लटकी हुई हैं, तो वह चुप क्यों नहीं रहेगी? आश्चर्य की बात यह है कि आखिर उसने बोलने की हिम्मत जुटाई और उसके बोलने से तमाम लोगों की जुबान खुल गई है।

तरुण तेजपाल हैरान हैं कि उन पर यौन हिंसा का आरोप लगाने वाली, उनके मातहत काम करने वाली, उनकी बेटी की हमउम्र दोस्त, चुप क्यों रही। दिल्ली उच्च न्यायालय के सामने उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि उन्होंने उसके साथ कुछ हल्की-फुल्की मजाकिया बातचीत की। आगे वह कहते हैं कि आखिर वह लड़की बोली क्यों नहीं, इससे स्पष्ट हो जाता है कि वह झूठ बोल रही है और हो सकता है कि भाजपा से प्रेरित है।

कमाल की बात यह है कि तरुण तेजपाल भूल गए कि घटना के तुरंत बाद उन्होंने लड़की को मेल भेजा, 'मैं तुमसे इस बात के लिए बिना शर्त माफी मांगता हूं कि मैंने बहुत ही शर्मनाक विवेकहीनता के कारण दो बार तुम्हारे साथ यौन संबंध स्थापित करने की कोशिश की, जबकि यह बहुत स्पष्ट था कि तुम इसके पक्ष में नहीं हो।'

लड़की के केवल शरीर को ही नहीं, उसके मानस को चोट पहुंचाई गई थी, जब उसने अपने संपादक से शिकायत की, तो वहां से भी उसको सहारा नहीं मिला। अब गोवा पुलिस ने अपनी कार्रवाई शुरू कर दी है और लड़की ने उनके सामने बयान देकर यह सिद्ध कर दिया है कि वह तेजपाल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई चाहती है। ऐसा करके उसने उन चंद तथाकथित महिला नेताओं का कथन झुठला दिया है कि शायद लड़की कानूनी कार्रवाई के पक्ष में नहीं है।

दो हफ्ते पहले, एक महिला वकील ने खुलासा किया कि पिछले साल उसके साथ सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने लैंगिक छेड़छाड़ की भाषा का इस्तेमाल किया था। जब सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीश ने इसकी जांच का फैसला लिया, तो एक वकील ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक याचिका पेश की कि उस वकील की परवरिश भारतीय परंपराओं के अनुसार नहीं हुई है और भारतीय शास्त्रों के अनुसार किसी भी महिला की वाणी पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। उसकी चुप्पी टूटने के बाद कई और शिकायतें सामने आई हैं और सर्वोच्च न्यायालय ने दस सदस्यीय स्थायी जांच समिति का गठन कर दिया है।


अब देखना यह है कि क्या गुजरात की वह महिला चुप्पी तोड़ेगी, जिससे बातचीत के जुर्म में एक आईएएस अधिकारी को निलंबित करके जेल भेज दिया गया था। चुप्पी तोड़ना महिलाओं और लड़कियों के लिए महंगा साबित होता है। हरियाणा की बलात्कार की शिकार दलित लड़की ने जब मुंह खोला, तो उसकी मां की हत्या कर दी गई। लेकिन यह भी सच है कि मुंह खोलकर यातना भुगतने वाली इन लड़कियों और औरतों ने दूसरों के लिए न्याय का दरवाजा खोला है।

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