दिनाकरण की जीत का मतलब
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तमिलनाडु के आरके नगर विधानसभा उपचुनाव में शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरण ने जीत हासिल की है। दिनाकरण की इस जीत से तमिलनाडु की सियासत में अनिश्चितताओं का दौर शुरू होना निश्चित है। दिनाकरण ने एक तीर से दो शिकार किए हैं। सबसे पहले तो दिनाकरण ने यह सुनिश्चित किया कि अन्नाद्रमुक का चुनाव चिह्न दो पत्ती को लेकर पन्नीरसेलवम और पलानीस्वामी गुट का प्रचार झूठा है। टीटीवी दिनाकरण के नए चुनाव चिह्न प्रेशर कूकर के सामने अन्नाद्रमुक के प्रत्याशी टिक नहीं पाए। दूसरा शिकार उन्होंने मुख्य विपक्षी पार्टी द्रमुक का किया, जो इस उपचुनाव में जमानत भी नहीं बचा पाई। भाजपा को उन्होंने अंतिम स्थान पर धकेल दिया। भाजपा को वहां मात्र कुछेक सौ वोट मिले। कांग्रेस वहां लड़ाई में कहीं नहीं थी। राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के अभाव में राज्य की राजनीति आखिर किधर जा रही है? तमिलनाडु की सीमा श्रीलंका से सटी हुई है और चीन भारत के साथ दुस्साहस दिखाता है। ऐसे में केंद्र की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन ऐसी भी चर्चा रही कि मतदाताओं को प्रति वोट दस हजार रुपये रिश्वत दी गई। तो क्या वाकई टीटीवी दिनाकरण की जीत में पैसे ने अहम भूमिका निभाई है?
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यहां सवाल यह भी उठता है कि क्या 2 जी मामला इस चुनाव में मुद्दा नहीं बना। आरके नगर में दिनाकरण की जीत ऐसे समय में हुई है, जब 2 जी मामले में ए राजा और कनिमोझी निर्दोष साबित हुए हैं। दिनाकरण पर मतदाताओं को दस-दस हजार रुपये देने का आरोप लगा है। तो क्या इसका मतलब यह है कि भ्रष्टाचार लोगों के लिए अब कोई मुद्दा नहीं रहा और उसका मतदान पर कोई असर नहीं पड़ा? मतदाताओं को लुभाने के लिए पैसे बांटने की बीमारी कब खत्म होगी? इसका बहुत बुरा संदेश जा रहा है।
दिनाकरण की जीत का एक संकेत यह भी है कि तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक सरकार संकट में है। दिनाकरण ने घोषणा की है कि वह पन्नीरसेलवम और पलानीस्लामी गुट को तोड़ देंगे, क्योंकि उनके बहुत से लोग इन गुटों में गुपचुप तरीके से शामिल हैं। दिनाकरण के ये लोग बगावत करेंगे, जिससे सरकार गिर जाएगी। इस संकट से उबरने के लिए राज्य सरकार के पास क्या उपाय है? जब तक पन्नीरसेलवम-पलानीस्वामी गुट दिनाकरण गुट के अन्नाद्रमुक में विलय का रास्ता नहीं बनाता, तीन साल सरकार चलाना उनके लिए मुश्किल होगा। तमिलनाडु में अगला विधानसभा चुनाव 2021 में होगा। अन्नाद्रमुक सरकार के सामने कई चुनौतियां हैं। राज्य विधानसभा का सत्र बुलाया जाना है। जनवरी के मध्य में राज्य विधानसभा का बजट सत्र शुरू होगा। इसके अलावा मार्च, 2018 में राज्य में स्थानीय निकाय के चुनाव भी होने हैं। दक्षिणी जिलों में आए भयंकर चक्रवात ने भारी नुकसान पहुंचाया है। ये ऐसे तात्कालिक विषय हैं, जिनसे राजनीतिक नेतत्व को निपटना है। पन्नीरसेलवम-पलानीस्वामी मूक दर्शक बने नहीं रह सकते।
नए राजनीतिक संगठन का उभार लोकतंत्र में स्वागतयोग्य है, लेकिन प्रमुख विपक्षी दल की तबाही लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है। इसके अलावा राज्य का नागरिक प्रशासन भी लड़खड़ा गया है। जयललिता के निधन के बाद से राज्य सरकार ऑटो पायलट मोड पर है। अगर सरकार स्थिर नहीं होगी, तो न बुनियादी ढांचे का विकास होगा, न प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आएंगे। वरिष्ठ अधिकारी कानून-व्यवस्था की समस्याओं को लेकर परेशान हैं। राज्य के मंत्रिगण पार्टी के काम से बाहर हैं। कहा जा रहा है कि अन्नाद्रमुक की दूसरी पंक्ति के कुछ नेता सरकार के खजाने और प्राकृतिक संसाधन को चपत लगा रहे हैं, जैसे नदी बांध रेत-खनिज आदि।
दिलचस्प है कि जयललिता की अन्नाद्रमुक में से कोई भी सांसद या विधायक करुणानिधि की द्रमुक में नहीं गया है। पन्नीरसेलवम, पलानीस्वामी और दिनाकरण के गुट के बीच ही नेताओं की आवाजाही हुई है। इसका साफ संकेत है कि लोग द्रमुक को पसंद नहीं कर रहे। साफ है कि द्रमुक का भविष्य भी धुंधला है।
तमिलनाडु की राजनीति में जाति बहुत महत्वपूर्ण है, और अन्नाद्रमुक में थेवर समुदाय का वर्चस्व है। हालांकि मौजूदा मुख्यमंत्री पलानीस्वामी गोंडर समुदाय से आते हैं, लेकिन पन्नीरसेलवम और दिनाकरण थेवर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। इस जातिगत राजनीति से करुणानिधि की द्रमुक अलग नहीं है, लेकिन वहां पारिवारिक राजनीति हावी है। करुणानिधि की तीन पत्नियां हैं और उनके बच्चे द्रमुक का संचालन करते हैं। आखिर यह वंशवादी राजनीति राज्य में कब खत्म होगी?
ऐसा भी नहीं लगता कि तमिल राजनीति में रजनीकांत और कमल हासन के प्रवेश से कोई फर्क पड़ेगा, क्योंकि मतदाताओं को घूस देने की बीमारी कोई नई बात नहीं है। पिछले पंद्रह वर्षों से ऐसा हो रहा है। हर चुनाव में मतदाताओं को छह से आठ हजार रुपये दिए जाते रहे हैं। रजनीकांत मराठी गायकवाड समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, जो पिछले चार दशकों से तमिलनाडु में हैं। हिंदू होने के नाते वह भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति के करीब माने जाते हैं। पिछले दस वर्षों में नरेंद्र मोदी उनसे कई बार मिले हैं। इसलिए रजनीकांत का झुकाव दक्षिणपंथी आंदोलन की दिशा में है, जबकि कमल हासन के साथ ऐसा नहीं है। वह वामपंथी विचारधारा के करीब हैं।
आरके नगर उपचुनाव में द्रमुक की हार से स्पष्ट है कि राज्य में द्रविड़ राजनीति का अंत करीब है। पिछले पचास वर्षों से या तो द्रमुक या अन्नाद्रमुक ही राज्य में शासन में रही है। संभवतः इसलिए लोगों ने दिनाकरण शैली की एक अलग स्वतंत्र राजनीति के विकल्प को अपनाया, जो कुछ हद तक द्रविड़ राजनीति के करीब है।
जब तक भाजपा या कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी का राज्य की राजनीति पर पूर्ण नियंत्रण नहीं होगा, तब तक यहां वंशवाद खत्म नहीं होेगा। नरेंद्र मोदी को तमिलनाडु से भ्रष्टाचार और जाति आधारित द्रविड़ राजनीति को उखाड़ फेंकना होगा।