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नया रास्ता गढ़ेगी सम्राट की यात्रा
तरुण विजय
Updated Fri, 29 Nov 2013 09:41 PM IST
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जापान के सम्राट अकीहितो तथा साम्राज्ञी मिचिको की छह दिवसीय भारत यात्रा पिछले अनेक दशकों में भारत आने वाले विदेशी नेताओं की यात्राओं में सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जापान के सम्राट अमूमन बहुत ही कम विदेश यात्राओं पर जाते हैं और भारत सरकार की ओर से उन्हें आने का निमंत्रण पिछले दस वर्षों से लंबित पड़ा था।
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माना जाता है कि प्रखर राष्ट्रवादी एवं भारत मित्र जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे द्वारा सत्ता संभालने के बाद अचानक इस निमंत्रण को स्वीकार करने का निर्णय हुआ। यद्यपि जापान के सम्राट वास्तविक राजनीतिक शक्ति से दूर एक सांविधानिक और परंपरागत जापानी मूल्यों तथा आस्था के ही प्रतीक हैं, पर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि सम्राट और साम्राज्ञी वहां की राष्ट्रीय अस्मिता एवं आत्मा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।
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इस यात्रा को चीन या किसी तीसरे देश के प्रभाव के सम्मुख भारत-जापान की बढ़ती सामरिक साझेदारी के रूप में निरुपित करना ठीक नहीं होगा। जब बुद्ध जापान नहीं पहुंचे थे, उससे पहले से ही भारत के साथ उसके संबंध हैं, जो दो हजार साल पुराने कहे जाते हैं। एक शोध के अनुसार, जापानी भाषा के लिए जब लिपि की खोज हो रही थी, तब तमिल लिपि भी उनके ध्यान में थी, लेकिन एक आकस्मिक संयोग के कारण चीन की कांजी लिपि (चित्राक्षर) अपना ली गई।
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79 वर्षीय सम्राट अकीहितो का भारत प्रेम असंदिग्ध है। वह नवंबर, 1960 में बतौर राजकुमार भारत आए थे और तब इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली का शिलान्यास किया था। 53 साल बाद अब वह पुनः आए हैं सम्राट के नाते। वह जापानी शिंतो दर्शन के विद्वान हैं और उसके हाकानासा सिद्धांत को मानते हैं, जिसके अनुसार यद्यपि नदी सनातन है, लेकिन उसका जल सदैव बदलता रहता है। इसी प्रकार बदलते हुए जीवन की स्मृति और परंपराएं सनातन हैं, जिनकी सुरक्षा से ही समाज और राष्ट्र बचता है।
जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने दारा शिकोह की उपनिषदों पर की गई व्याख्या से एक वाक्य उधार लेते हुए कहा था कि भारत के साथ हमारी मित्रता दो महासागरों के मिलन की तरह है। संभवतः विश्व में शायद ही ऐसे दो देश होंगे, जिनके बीच भरोसे और आस्था का इतना गहरा महासागर है, जितना भारत और जापान के बीच में है। बुद्ध और शिंतोवाद, दोनों देशों के समाज और उनकी संस्कृति को जोड़ते हैं। शिंतो आस्था हिंदू धर्म के बहुत निकट तथा उनके विश्वास हमसे मिलते-जुलते हैं। सम्राट इस मिलन के सर्वश्रेष्ठ प्रतीक हैं।
भारत के महान क्रांतिकारियों रासबिहारी और सुभाषचंद्र बोस को जापान में शरण देने के अलावा वहां रवींद्रनाथ ठाकुर के प्रति सामान्य जन की गहरी आस्था है। बुद्ध का प्रभाव तो सर्वत्र व्याप्त है ही। जापान के बौद्ध भिक्षु बंगलूरू तथा बोधगया जैसे नगरों में आकर यहां से क्योटो, कोबे और टोक्यो में बनने वाले नए बौद्ध मंदिरों के लिए मूर्तियां और शिल्पकार भी ले जाते हैं। आधुनिक समय में इस सांस्कृतिक विश्वास और आस्था की नींव पर विराट आर्थिक सहयोग के प्रकल्प स्थापित हुए।
यदि मारुति सुजूकी यहां वाहन क्रांति ले आई, तो मेट्रो तथा पश्चिमी भारवाहक रेल गलियारा भारत के रेल मानचित्र को बदल रहे हैं। जापान की गाड़ियां, कैमरे, कंप्यूटर, पुर्जे तथा प्रौद्योगिकी के शिखर छूते नवीन आयाम भारतीय प्रौद्योगिक क्रांति का सबसे बड़ा सहारा बने। लेकिन इससे भी बढ़कर विश्व के दो सर्वाधिक सशक्त लोकतांत्रिक देशों के मध्य सामरिक एवं सैन्य सहयोग भारत के पूर्वी क्षेत्र में रक्षा का नया अध्याय बना रहा है।
चीन यदि सर्वाधिक आशंकाग्रस्त होता है, तो जापान और भारत के मध्य बढ़ रहे सामरिक संबंधों के कारण। भविष्य की रक्षा नीति समुद्री रणनीति से प्रभावित होगी। हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी, प्रशांत महासागर तथा दक्षिण चीन सागर आर्थिक और सामरिक कूटनीति के मूलाधार बने हैं। इन तीनों क्षेत्रों में चीन अभी तक निर्बाध प्रभुत्व बढ़ाता जा रहा था, पर 2007 और 2011 में जापान के साथ भारत के सामरिक एवं रणनीतिक करारों के बाद दोनों देशों की नौसेना ने ऑस्ट्रलिया और अमेरिका को भी साथ में मिलाते हुए संयुक्त नौसैनिक अभ्यास प्रारंभ किए और चीन की एकाधिकारवादी नीति को रोका।
जापान के सम्राट की भारत यात्रा रक्षा और सांस्कृतिक-सामरिक कूटनीति के क्षेत्र में नया अध्याय रचेगी। जापान विश्व के सर्वाधिक सशक्त लोकतांत्रिक सामरिक सहयोग के लिए भारत के साथ दूरगामी एवं दीर्घकालिक करार करने के लिए उत्सुक है। लेकिन क्या भारत जापान के इस उत्साह का उसी प्रबलता के साथ उत्तर देने की स्थिति में है
जापानी सम्राट और साम्राज्ञी के स्वागत और भारत में उनके आगमन को एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय घटना बनाने के लिए हमारी सरकार को जो तैयारी करनी थी, उसका दशमांश भी नहीं दिखा। विडंबना यह है कि सामान्य भारतीय सत्ता मानस आज भी पश्चिमी देशों की धुरी से अटका हुआ है और यह समझ नहीं पा रहा कि भारत का भविष्य पश्चिम के साथ नहीं, बल्कि पूर्वी देशों के साथ जुड़ा है। आशा करनी चाहिए कि जापान के सम्राट की इस अत्यंत महत्वपूर्ण यात्रा के भविष्योन्मुखी, कूटनीतिक और सामरिक लाभ से भारत स्वयं को वंचित नहीं करेगा और इसे एक यादगार व सफल यात्रा के रूप में 'दो महासागरों का वास्तविक मिलन' होने देगा।