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पाक का रक्षा बजट : लोगों की उंगलियां सेना की तरफ उठ रही हैं

Fri, 07 Jun 2019 01:54 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Fri, 07 Jun 2019 01:54 AM IST
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Meaning of cuts in defense budget
इमरान खान - फोटो : amar ujala

रमजान का महीना आम तौर पर पाकिस्तान में शांत होता है, क्योंकि सरकारी कार्यालयों और शिक्षण संस्थानों में कम ही समय काम होता है। लेकिन इस बार पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी जारी रही। प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार न केवल विपक्षी पार्टियों के दबाव में, बल्कि सड़क पर आंदोलन कर रहे लोगों के दबाव में भी है, क्योंकि मुद्रास्फीति के आंकड़े में भारी वृद्धि हुई है।


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रमजान का महीना आम तौर पर पाकिस्तान में शांत होता है, क्योंकि सरकारी कार्यालयों और शिक्षण संस्थानों में कम ही समय काम होता है। लेकिन इस बार पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी जारी रही। प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार न केवल विपक्षी पार्टियों के दबाव में, बल्कि सड़क पर आंदोलन कर रहे लोगों के दबाव में भी है, क्योंकि मुद्रास्फीति के आंकड़े में भारी वृद्धि हुई है।

विपक्ष का मुख्य मुद्दा नवाज शरीफ की जेल की सजा को लेकर है कि जवाबदेही प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण है और विपक्ष के नेताओं पर ही निशाना साधा जाता है। लोगों की उंगलियां सेना की तरफ उठ रही हैं, क्योंकि उसकी वजह से नवाज शरीफ और अन्य विपक्षी नेता जेल में होने के कारण जनता का नेतृत्व नहीं कर पा रहे हैं।

सेना का अचानक काफी चौंकाने वाला बयान आया कि उसने एक जनरल को उम्रकैद और एक ब्रिगेडियर तथा एक असैन्य डॉक्टर को मौत की सजा सुनाई है, जो खुफिया सेवा से जुड़कर जासूसी का काम कर रहे थे। सूत्रों के मुताबिक, यह मामला सेना के वरिष्ठ अधिकारियों एवं एक असैन्य डॉक्टर द्वारा परमाणु से संबंधित गुप्त सूचनाएं अमेरिका को बेचने से संबंधित है।

आम तौर पर जासूसी के मामलों को पाकिस्तान सार्वजनिक नहीं करता, क्योंकि इससे दुश्मन को फायदा होता है। इसके बजाय वैज्ञानिक यह कहकर जासूसी के मामलों को कमतर बता देते हैं कि जो गुप्त जानकारियां दूसरे देश को दी गईं, वे अब अप्रासंगिक हैं। होना तो यह चाहिए था कि अपने ही अधिकारियों को जासूसी के लिए जिम्मेदार ठहराने और सजा देने पर सेना की तारीफ होती पर इसके बजाय देश भर में इसे लेकर शर्मनाक प्रतिक्रिया थी कि अगर परमाणु रहस्यों को सेना सुरक्षित नहीं रख सकती, तो कौन रख सकता है?

लोकतांत्रिक सरकार के सामने फिर यह समस्या आई है कि सेना कुछ और ताकत चाहती है। इमरान खान यह जानते हैं, पर उन्हें किसी तरह की मुश्किल नहीं हो रही। बेनजीर भुट्टो और नवाज शरीफ की तरह वह सेना पर पलटवार करने के लिए तैयार नहीं हैं। सेना मुख्यालय को खुश करने के लिए प्रधानमंत्री नेशनल एसेंबली के स्पीकर को दो सांसदों का प्रोडक्शन ऑर्डर (संदिग्ध सांसदों के बारे में जानकारी और दस्तावेजों का खुलासा करना) लिखने की अनुमति नहीं दे रहे हैं, जो पुलिस हिरासत में हैं।

ये दोनों सांसद मोहसिन डकार और अली वजीर निर्दलीय सदस्यों के रूप में चुने गए थे, लेकिन ये पख्तुन तहफ्फुज मूवमेंट (पीटीएम) के समर्थक हैं। ये दोनों अफगानिस्तान सीमा से लगे वजीरिस्तान में एक छोटे से विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे। सेना के एक चेक पोस्ट पर हालात तब काबू से बाहर हो गए, जब प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी गई।

नतीजतन पीटीएम के तेरह प्रदर्शनकारी मारे गए, कई घायल हुए, जबकि सेना के भी कुछ जवान मारे गए। उनकी गिरफ्तारी के बाद संसद में उनकी मौजूदगी के लिए आवाज उठने के बावजूद स्पीकर ने अपने फैसले से हटने से इनकार कर दिया। संसद में सबसे जोरदार आवाज पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो की थी, जिन्होंने कई बार सरकार का विरोध किया है।

ईद के दौरान भारत और पाकिस्तान से कुछ बड़ी खबरें आईं। भारत के नए नौसेना प्रमुख ने नौसेना में मितव्ययिता से संबंधित कुछ नए उपायों की घोषणा की, जिनमें संस्कृति और धर्म से संबंधित कुछ पुरानी परंपराओं को खत्म करना भी शामिल हैं। इससे पाकिस्तान में ऐसा लगा कि नौसेना प्रमुख धर्मनिरपेक्ष भारत की झलक वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे भाजपा द्वारा हिंदुत्व की राजनीति कर सत्ता में आने से पहले दुनिया भर में सराहा जाता रहा है।

ईद की छुट्टी के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने नेशनल एसेंबली में नए वित्त मंत्री हाफिज शेख द्वारा बजट की घोषणा से पहले रक्षा बजट में स्वैच्छिक कटौतियों की घोषणा की। इससे हर कोई पूरी तरह आश्चर्यचकित था, क्योंकि जहां तक मुझे याद है, पाकिस्तानी सेना ने पहली बार रक्षा बजट में कटौती की घोषणा की है। तुरंत सैन्य प्रचार विंग आईएसपीआर के महानिदेशक जनरल आसिफ गफूर ने घोषणा की कि 'साल भर के लिए रक्षा बजट में स्वैच्छिक कटौती रक्षा और सुरक्षा की कीमत पर नहीं होगी।

हम सभी संभावित खतरों के लिए प्रभावी प्रतिक्रिया क्षमता बरकरार रखेंगे। तीनों सेना उचित आंतरिक उपायों के जरिये कटौती के प्रभावों का प्रबंधन करेगी। जनजातीय क्षेत्रों और बलूचिस्तान के विकास में भागीदारी करना महत्वपूर्ण है।'

हालांकि भारतीय मीडिया ने यह खबर उठाई, तो वहां पाकिस्तान द्वारा यह कदम उठाने की विभिन्न कारणों से भारी आलोचना हुई। उस दिन ईद की छुट्टी थी और अमूमन जब तक बहुत जरूरी न हो, पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय भारतीय मीडिया में छपने वाली खबरों की अनदेखी करता है। पर जनरल गफूर ने तुरंत ही स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि रक्षा बजट में कटौती भारत के हित में नहीं है, क्योंकि पाकिस्तानी एकजुट हैं और हमेशा सेना के साथ हैं।

पाक सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने एक बयान में कहा कि 'किसी भी खतरे के प्रति हमारी प्रतिक्रिया क्षमता और सेना के जीवन की गुणवत्ता पर इस कटौती का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। वेतन वृद्धि न करने का फैसला केवल अधिकारियों के लिए है, सैनिकों के लिए नहीं।'

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि पाकिस्तान आर्थिक रूप से बहुत ही कमजोर है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से लाखों डॉलर कर्ज लेने की प्रक्रिया में है। मुझे लगता है कि सैन्य बजट में कटौती का एक कारण यह हो सकता है, क्योंकि कर्ज का पैकेज देने से पहले आईएमएफ की यह अघोषित शर्त हो सकती है।

पिछले कुछ वर्षों से पाक सेना धीरे-धीरे सैन्य सहयोग और सहायता के लिए अमेरिका के बजाय चीन और अन्य देशों का रुख करने लगी है। पर किसी भी विकासशील देश के लिए रक्षा खरीद पर अरबों डॉलर खर्च करना बुद्धिमानी नहीं है, जबकि उनके नागरिक गरीबी में डूबे रहे हों। अगर यह संस्कृति हमारे दौर में बदलती है, तो सुखद आश्चर्य होगा!
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