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आतंकी हमले में छिपे संदेश

Mon, 27 Jul 2015 08:28 PM IST
सुशांत सरीन
सुशांत सरीन Updated Mon, 27 Jul 2015 08:28 PM IST
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Massage of terror attack

पंजाब के दीनानगर शहर में हुआ आतंकी हमला बेहद चौंकाने वाला है। आखिर इस हमले के पीछे मकसद क्या है और यह भविष्य की कैसी तस्वीर दिखा रहा है? हालांकि अब तक पूरी जानकारी सामने नहीं आई है, मगर चंद सवाल मेरे जेहन में हैं। उदाहरण के लिए, ये आतंकवादी कौन थे और कहां से आए थे? सवाल यह है कि क्या वे जम्मू की सीमा से घुसे थे। अगर हां, तो वे जम्मू से दीनानगर तक पहुंचे कैसे? तो क्या वे पंजाब की सीमा की तरफ से घुसे? वे पाकिस्तानी पंजाबी जेहादी थे या कश्मीरी अलगाववादी या फिर खालिस्तानी आतंकवादी? क्या वे आतंकी सीमा पार से आए या फिर वे उन आतंकी संगठनों के सदस्य थे, जो भारत में सक्रिय रहे हैं और उन्हें सीमा पार करने की जरूरत ही नहीं पड़ी?

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क्या उन आतंकियों का लक्ष्य अमरनाथ यात्रा को बाधित करना था, जैसा कि चंद महीनों से अनुमान लगाया जा रहा था, और वे रास्ता भटककर पंजाब आ गए? यह बात थोड़ी अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है, क्योंकि जब तक पाकिस्तान पूरी तरह से हताश न हो जाए कि वह आतंकियों को बिना पर्याप्त प्रशिक्षण के भेजे, यह हास्यास्पद ही लगता है कि आतंकी बिना पूरी जानकारी के, कि उन्हें कहां जाना है और किस तरह पहुंचना है, सीमा पार करें। अलबत्ता यह हो सकता है कि आतंकियों ने जान-बूझकर जम्मू-कश्मीर के बजाय पंजाब को निशाना बनाया, ताकि यह बताया जा सके कि आतंक अब जम्मू-कश्मीर से बाहर पसरने को तैयार है। सच भी यही है कि जम्मू में होने वाले ज्यादातर आतंकी हमले पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा होते रहे हैं, जबकि कश्मीर में हमलों के पीछे स्थानीय आतंकियों का हाथ माना जाता है। इसलिए भले ही यह साफ न हो कि पंजाब में हुए इस हमले में खालिस्तानी पक्ष है अथवा नहीं, लेकिन यह हमला आतंकी हमलों का दायरा बढ़ने की ओर जरूर संकेत करता है।
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यहां यह भी याद रखने की जरूरत है कि आतंकी 'हमला कर भागने' के फिराक में नहीं थे, बल्कि उनका उद्देश्य 'हमला करना और मरना' था। यानी वे इस मंशा के साथ आए थे कि जो भी रास्ते में आए, उसे मारो, फिर सरकारी भवन पर कब्जा करो, और सैन्य बलों के हाथों मारे जाने से पहले काफी देर तक उनके हमलों का जवाब देते रहो। आमतौर पर इस सोच के पीछे तहलका मचाकर अधिक से अधिक दहशत फैलाने की मंशा होती है। मगर इसके लिए तो उन्हें पंजाब आने की जरूरत नहीं थी। अगर वे यह कार्रवाई जम्मू-कश्मीर के किसी हिस्से में भी करते, तो वहां भी इसी तरह का तहलका मचता। लिहाजा इशारा साफ है कि पंजाब में उनका आना किसी बड़ी साजिश का हिस्सा है।
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आतंकियों ने आखिर पंजाब को ही क्यों चुना? इसकी वजह यह हो सकती है कि खालिस्तान आंदोलन को पाकिस्तान फिर से जीवित करना चाहता है। पिछले कुछ महीनों से पाक खुफिया एजेंसी लंदन, कनाडा और अमेरिका में खालिस्तानी भावना को उभारने की कोशिश में लगी है। कनाडा और अमेरिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी खालिस्तानियों के विरोध-प्रदर्शन का सामना करना पड़ा था। ब्रिटेन में खालिस्तानियों ने न सिर्फ विरोध-प्रदर्शन किया, बल्कि ब्रिटिश संसद में भी उनका मामला गूंजा है। अपने देश में भी विगत जून में जम्मू में जरनैल सिंह भिंडरांवाले के पोस्टरों को हटाने के बाद खालिस्तानी समर्थकों का सड़कों पर विरोध करते हुए उतरना एक संदेश था कि कुछ समय से हालात किस तरह बिगाड़ने की कोशिश हो रही है।

दरअसल, ऐसा लगता है कि 1990 के दशक के मध्य में खालिस्तानी आंदोलन की कमर तोड़ने के बाद पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने खालिस्तानी आतंकवाद की तरफ से अपनी आंखें मूंद लीं। यह उक्ति भुला दी गई कि 'स्वतंत्रता और स्थिरता की कीमत निरंतर सतर्कता है', क्योंकि यह मान लिया गया था कि खालिस्तानी आंदोलन खत्म हो गया है और यह फिर से नहीं उभर सकता। मगर वर्ष 2003-04 की अपनी पाकिस्तान यात्रा में वहां के एक संपादक ने मुझे बताया था कि आईएसआई खालिस्तानी आंदोलन को उभारने की कोशिश में लगातार लगी है, लेकिन उसे ज्यादा मौका नहीं मिल रहा। बेशक खालिस्तान के समर्थक ज्यादा नहीं हैं, लेकिन पाकिस्तान लगातार अपनी कोशिश में जुटा रहा है। इसलिए दीनानगर हमला एक बड़े तूफान के आने का संकेत है, जिसे अब भी रोका जा सकता है, अगर कुछ ठोस कदम उठाए जाएं।

इसके लिए सबसे पहले केंद्र और राज्य सरकार को नशे के उस कारोबार को खत्म करना होगा, जो पंजाब में पसरा है। न सिर्फ पंजाब के युवा इस कारोबार में बर्बाद हो रहे हैं, बल्कि राज्य की छवि भी 'नशे में लिप्त राज्य' की बन रही है, क्योंकि यहां के मंत्री, अधिकारी और यहां तक कि मुख्यमंत्री के संबंधियों तक पर नशे के कारोबार में लिप्त होने के आरोप लगे हैं। नशे के कारोबार और आतंकवाद में गहरे संबंध को देखते हुए इसे खत्म करना राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। इसके साथ ही खालिस्तान समर्थकों के प्रति राज्य सरकार का उदार रुझान भी खतरनाक है। सीमा-प्रबंधन और उस पर चाक-चौबंद निगरानी भी एक जरूरी मुद्दा है।


पंजाब सरकार ने आतंकियों का मुकाबला करने के लिए पुलिस बल को जिस तरह आगे किया, वह सराहनीय है; हालांकि जवाबी कार्रवाई के दौरान एसपी की मौत दुखद है। लेकिन ऐसे हमलों का मुकाबला पुलिस को ही करना चाहिए। जरूरत राज्य में खुफिया तंत्र को मजबूत करने की भी है, ताकि आतंकवाद का पौधा पनप ही न सके। हां, यहां केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वे भी न सिर्फ खालिस्तानी समूहों पर नजर रखें, बल्कि राज्य की एजेंसियों के साथ सूचनाएं भी साझा करें।

-लेखक विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के सीनियर फेलो हैं

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