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जीवन के रंगमंच पर मुखौटे के किरदार, कला और कलाकार दोनों मुश्किल में
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बहुरूपिया (सांकेतिक तस्वीर)।
- फोटो :
सोशल मीडिया
विस्तार
हम जिनको रंगमंच के कलाकार कहते हैं, दरअसल वे मुखौटे हैं और उनके कलाकार बनने के लिए फ्लड लाइट से लेकर तमाम तरह की रंगीनियत पैदा करने वाली लाइट, अलग-अलग इफेक्ट का साउंड सिस्टम और बैकग्राउंड म्यूजिक की दरकार होती है। जिसका एक अभिनय न जाने कितनी कितनी रिहर्सल से गुजरता है।
दूसरी तरफ जीवन के रंगमंच में भांड, बहुरूपिया, नक्काल और डूम जैसे कलाकार हैं, जिन्हें मुखौटों और ऐसी रंग-बिरंगी बैसाखियों की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिनका अभिनय ही रिहर्सल है और कला का सम्मान उनका पारितोषिक है। ये भारत की सबसे प्राचीन विलक्षण विधाएं है, जहां संवाद के बोलने से लेकर श्रृंगार और पहनावे का चयन खुद से करना पड़ता है। यहां रीटेक का कोई मौका नहीं है, बल्कि एक टेक में आपको सब कुछ करना पड़ता है। उसी एक टेक से उसकी बॉडी लैंग्वेज, अभिव्यक्ति और अभिनय तय होता है।
रंगमंच का इतिहास तो करीब सवा सौ वर्षों का है। जबकि ये समुदाय तो हजारों वर्षों से जीवन के रंगमंच को दिखा रहे हैं। और आज भी वैसे ही निरंतर जारी है। इसके लिए कोई पढ़ाई की स्कूल कैसे हो सकती है?
यह विडंबना ही है कि जो व्यक्ति जीवन के स्कूल में पास नहीं हुआ, वह रंगमंच के स्कूल में पास होकर कलाकार बन जाएगा? बहुरूपिया, भांड, नक्काल और डूम समुदाय के लोग पहले अपने जीवन के स्कूल में पास होते हैं। उसके बाद कलाकार बनते हैं। इनको मजहब की दीवारों में नहीं बांटा जा सकता। मुस्लिम बहुरूपिया शिव और पार्वती का किरदार निभाता है, तो हिंदू बहुरूपिया फकीर और मुस्लिम साधु बनने में कोई गुरेज नहीं करता।
रामायण और महाभारत के किरदारों को, उनके चरित्र को उनके श्रृंगार से लेकर संवाद और पहनावे तक को गांव- गांव किसने पहुंचाया? सिनेमा को आए तो मुश्किल से 100 वर्ष बीते हैं, जबकि गांवों में रामायण-महाभारत का अभिनय तो पीढ़ियों से चला आ रहा है। हिंदू देवी- देवताओं की वेशभूषा कैसी होगी, ये किसने तय किया? उनके चेहरे पर मूंछे होंगी या दाढ़ी होगी, ये किसने बताया?
ये काम इन बहुरूपियों, भांडो, नक्कालों और डूम समुदाय ने तय किया है। ये घुमंतू समुदाय से संबंधित हैं, जो अपनी वाक्पटुता और अभिनय से सामने वाले व्यक्ति के मन को मोह लेते हैं। ये सभी लोग राजदरबार से संबंधित रहे हैं, जिन्हें राज-परिवार का संरक्षण प्राप्त था।
भांड गाल बजाने का काम करते थे। डूम चंग बजाकर राज परिवारों के लुभावने गुणगान करते। नक्काल मनोरंजन के लिए लोगों की नकल करते थे, किंतु इसका कोई मेकअप और गेटअप नहीं होता था। इनमें बहुरूपिया भी होता था, जिसका खास मेकअप और गेट अप होता था। जो वह खुद से बनाता था।
ये लोग मनोरंजन के साथ-साथ राजे-रजवाड़ों के लिए खुफिया काम भी करते थे। जैसे बहुरूपिया कभी साधु का भेष बनाकर तो कभी व्यापारी का रूप बनाकर अन्य राज्यों में जाता, वहां की खुफिया जानकारी लाता। उनकी सेना की स्थिति, उसमें कितने तीरंदाज हैं, असलहा कितना है (गोला- बारूद) और राज दरबार के विश्वासी व्यक्तियों के बारे में जानकारी एकत्र करता।
यहां कला और कलाकार के फन की सफलता उसकी ईमानदारी से तय होती है। बहुरूपिए और भांड को सुबह आठ बजे से मेकअप करने के बाद बिना कुछ खाये-पिये तीन-चार बजे तक ऐसे ही रहना पड़ता है। अपने संवाद में वही दम, ऊर्जा और चेहरे पर ताजगी चाहिए, जो सुबह की शुरुआत में थी, अन्यथा आपका किरदार नाकाम हो जाएगा।
आज ये कला और कलाकार दोनों मुश्किल में है। उनको न तो सम्मान मिलता है और न ही गुजारा करने लायक पैसा। उनको हमने भिखारी बना दिया। हमने 2006 में एक कानून बनाया था, 'एंटी बेगिंग एक्ट', इसके तहत अगर ये लोग सड़क किनारे फुटपाथ पर या गली-मोहल्लों में जाकर अपना कार्य करें, तो उनका यह कार्य भीख की कोटि में आता है।
हालांकि दिल्ली हाई कोर्ट ने इस कानून की वैधता पर प्रश्न किया है, किंतु हम अपनी विरासत और जीवंत सभ्यता से कितने विमुख हो गए, यह बात इस कानून से पता चलती है। मतलब हमें यह भी नहीं पता कि इन लोगों ने कितने हजार वर्षों से हमारी स्मृतियों को गढ़ा । हमारी संस्कृति को जीवंत बनाया है। उस धरोहर के बोझ को आज तक ढोया है।
हमारे यहां अकादमिक जगत में उदासीनता इस कदर पसर गई है कि पहले से चले आ रहे सिद्धांतों की वैधता पर भी सवाल नहीं कर पा रहे। ये लोग अपनी इन अलग-अलग अभिव्यक्तियों के जरिये समाज में जिस मूल्य व्यवस्था को गढ़ते हैं, जीवन जीने के जो तौर-तरीके हमें सिखाते हैं, क्या वे सब व्यर्थ हैं? क्या अब हमें इन अभिव्यक्तियों के सम्मान के लिए भी डिग्री की आवश्यकता पड़ेगी? जो व्यक्ति परीक्षा पास करके आया हुआ होगा वह कलाकार होगा, और बाकी सब?
अब भी समय है, हम अपनी भूल को ठीक करें। रंगमंच के असल किरदारों को भी सम्मान देना सीखें, यदि उनको महत्व नहीं दे सकते, तो कम से कम उनको बेइज्जत ना करें, अन्यथा न मुखौटा बचेगा और न ही किरदार।
-अश्विनी शर्मा, स्कॉलर एवं एक्टिविस्ट यूनिवर्सिटी ऑफ हैडलबर्ग, जर्मनी