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बाजार में लौटती रौनक, दिवाली से पहले सुधरते दिख रहे हालात

Fri, 13 Nov 2020 04:02 AM IST
मधुरेंद्र सिन्हा मधुरेन्द्र सिन्हा
मधुरेन्द्र सिन्हा Published by: मधुरेंद्र सिन्हा Updated Fri, 13 Nov 2020 04:02 AM IST
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Markets back to normal before Diwali amid covid 19 pandemaic
Diwali market - फोटो : amarujala

साल का बड़ा हिस्सा कोविड-19 से प्रभावित रहा है, जिससे खासतौर से मध्य और निम्न तबके को मुश्किलों से गुजरना पड़ा है। मगर दिवाली से ऐन पहले हालात सुधरते दिख रहे हैं। मसलन अक्तूबर के महीने में कारों और दुपहिया वाहनों की बिक्री में तेजी आई है। बाजार के जानकार कह रहे हैं कि बाजारों में धनतेरस-दिवाली में उम्मीद से अधिक बिक्री हो सकती है। महासंकट के इस काल में देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ी सबसे अच्छी खबर यह है कि आठ महीनों के बाद अक्तूबर महीने में जीएसटी की वसूली एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की हुई। 


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देश में लॉकडाउन लगने के बाद जीएसटी वसूली एक लाख करोड़ रुपये के मनोवैज्ञानिक स्तर से गिरकर नीचे चली गई थी, जिससे वित्त मंत्रालय के स्रोतों पर भारी दबाव पड़ गया। हालत इतनी बिगड़ गई थी कि केंद्र ने राज्यों का हिस्सा भी देने से इन्कार कर दिया। लेकिन पिछले महीने इस मद में 1,05,155 करोड़ रुपये आए, जो सितंबर से 10 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा है। इतना ही नहीं, पिछले साल के इसी महीने की तुलना में भी यह 10 प्रतिशत ज्यादा है। यह तपते हुए रेगिस्तान में पानी की बूंदों की तरह है।

इसका मतलब साफ है कि सामानों की खरीद-बिक्री में अच्छी बढ़ोतरी हुई है, जो अर्थव्यवस्था में आई तेजी का एक लक्षण है। इस बढ़ी हुई वसूली ने वित्त मंत्रालय के मुर्झाए हुए चेहरे पर एक मुस्कान ला दी है। उसे अर्थव्यवस्था में सुधार के चिह्न साफ दिख रहे हैं और इसके पीछे उसका मानना है कि जीएसटी वसूली में क्रमशः सुधार हुआ है। आने वाले महीनों में भी अगर यह रफ्तार बनी रहेगी, तो आर्थिक संकट के बोझ से दबे वित्त मंत्रालय के लिए राहत की बात होगी। फिलहाल यह माना जा रहा है कि वसूली में बढ़ोतरी का कारण त्योहार और सितंबर में बकाया इनपुट टैक्स की प्राप्ति है। एक बड़ा कारण यह भी है कि सितंबर महीने में लगभग सभी तरह के उपक्रम और कारोबार को काम करने के लिए हरी झंडी दिखा दी गई थी। अर्थव्यवस्था का लगभग हर क्षेत्र फिर से काम कर रहा है। 

नवंबर में दिवाली तथा अन्य त्योहारों के कारण अर्थव्यवस्था की रफ्तार बनी रहेगी। जीएसटी के नियमों में लगातार नरमी और बदलाव भी कारोबारियों को उत्साहित करने में कारगर रहा है। शुरुआती दौर में इसमें काफी बाधाएं आईं और कई तरह की व्यावहारिक कठिनाइयां भी आईं, जिससे वसूली में कमी आई, लेकिन अब यह अपनी रफ्तार से चलने लगा है। लॉकडाउन की बाधा भी अब दूर हो गई है, हालांकि कोविड-19 महामारी अभी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है, लेकिन अगले साल के पूर्वार्ध तक इसका टीका ईजाद होने की संभावना है। उसके बाद अर्थव्यवस्था की गति कैसी रहेगी, यह देखने वाली बात होगी।

जीएसटी वसूली के विस्तृत विश्लेषण से यह बात पता चलता है कि राज्यों के प्रदर्शन में बेहतरी देखी गई है, जबकि केंद्र शासित राज्यों में कमी ही आई है। हालांकि पांच राज्यों ने कुल प्राप्ति का 50 प्रतिशत योगदान किया है, लेकिन दो गैर-भाजपा शासित राज्यों छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश ने अच्छी छलांग लगाई है। दोनों राज्यों ने अक्तूबर महीने में 26 प्रतिशत ज्यादा वसूली करके हैरान कर दिया है, जबकि उद्योगों से भरपूर राज्य गुजरात में महज 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और देश की आर्थिक राजधानी कहलाने वाले मुंबई के राज्य महाराष्ट्र का प्रदर्शन तो निराशाजनक (पांच प्रतिशत) रहा। छत्तीसगढ़ में अक्तूबर में पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 404 करोड़ रुपये ज्यादा की वसूली हुई। एक आदिवासी बहुल राज्य के लिए यह बड़ी उपलब्धि है।

किसानों के खाते में नकदी दिए जाने और अन्य सुधारों के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हुई, जिससे खपत में बढ़ोतरी हुई, जिससे जीएसटी वसूली बढ़ी। सच तो है कि सभी राज्यों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत करने के लिए प्रयास करना चाहिए, ताकि देश में कुल खपत बढ़े। खपत बढ़ाने के लिए जरूरी है कि राज्य सरकारें भी प्रयास करें और केंद्र पर निर्भर नहीं रहें। इस समय राज्यों की स्थिति ऐसी है कि राजस्व के मामले में वे केंद्र की ओर देखते रहते हैं और अपने यहां ऐसे कदमों को बढ़ावा नहीं देते हैं, जिससे जीएसटी वसूली में तेजी नहीं आती है। 

इसके अलावा कई राज्य ऐसे भी हैं, जो टैक्स चोरी के प्रति उदासीन हैं। ऐसा नहीं है कि जीएसटी में कर वंचना नहीं हो रही है, कुछ राज्यों में यह बकायदा हो रही है। इसे रोकने के प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि राज्यों का राजस्व बढ़े। इसके अलावा कई राज्य ज्यादा उत्साहित होकर कारोबारियों को नोटिस दे रहे हैं, जिसमें वे उनसे ऐसी सूचनाएं मांग रहे हैं, जिनकी कोई जरूरत नहीं है। जाहिर है कि उन राज्यों में नौकरशाही अपना दबदबा खोना नहीं चाहता है। राज्यों का यह फर्ज है कि वे टैक्स में कटौती का फायदा ग्राहकों तक पहुंचने दें। शुरू से यह देखा जा रहा है कि कारोबारी और कई मामलों में उत्पादनकर्ता ही टैक्स में कटौती का फायदा ग्राहकों को देने के बजाय खुद हड़प लेते हैं। ऐसे में राज्य सरकारों को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है, क्योंकि नौकरशाही ग्राहकों के साथ अमूमन नहीं होती। 

महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों को अपने टैक्स वसूली में बढ़ोतरी करनी ही होगी, क्योंकि केंद्र सरकार जिस 'सिन टैक्स' से अतिरिक्त कमाई करना चाह रही थी, वह पूरा होता नहीं दिख रहा है। महामारी के कारण लग्जरी सामानों, सिगरेट, एसयूवी वगैरह से प्राप्त अतिरिक्त टैक्स के हिस्से में से राज्यों को हर साल गारंटीड 14 प्रतिशत मुआवजा बढ़ाकर देने की केंद्र की घोषणा धरी की धरी रह गई। इसलिए राज्यों को अपनी और से भी टैक्स वसूली बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।

देश में जीएसटी लागू हुए तीन साल हो चुके हैं और इसे इस सदी का सबसे बड़ा सुधार माना जाता है। इसने उत्पादित सामानों को देश के कोने-कोने में समय पर पहुंचाने में बहुत मदद की है। जीएसटी के कारण टैक्स नाकों पर ट्रकों की लंबी-लंबी कतारें अब नहीं दिखतीं और न ही सेल्स टैक्स विभाग में मोटी कमाई की बातें सुनाई देती हैं। यह सही है कि अब भी कुछ जटिलताएं शेष हैं और कुछ चीजें अब भी उतनी स्पष्ट नहीं है। लेकिन समय के साथ वे ठीक हो रही हैं और हो भी जाएंगी। जीएसटी में बढ़ोतरी सभी के हक में है और केंद्र-राज्य सभी को मिलकर इसका प्रयास करना होगा।

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