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माओवादी क्रांति नहीं, विघटन चाहते हैं

Wed, 14 Apr 2021 04:48 AM IST
प्रदीप कुमार माप्रदीप कुमार
माप्रदीप कुमार Published by: प्रदीप कुमार Updated Wed, 14 Apr 2021 04:48 AM IST
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Maoists want dissolution, not revolution
माओवादी

छत्तीसगढ़ में घात लगाकर किए गए माओवादी हमले में 22 से अधिक सुरक्षाकर्मियों की शहादत के संदर्भ में सोचना जरूरी हो जाता है कि आखिर माओवादियों के राजनीतिक उद्देश्य क्या हैं? यह भी कि अतीत के उग्र वामपंथी आंदोलनों से यह कितना भिन्न है? 1946-47 के दौरान पूर्वी बंगाल और तेलंगाना क्षेत्र में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में आंदोलन चले। बंगाल के तिभागा और तेलंगाना, दोनों आंदोलनों का मकसद भूमिहीनों, खेत मजदूरों और सीमांत किसानों को इंसाफ दिलाना था। भारत की नवोदित राज्य सत्ता का रास्ता अलग था। दमन स्वाभाविक था। 1967-69 के  दौरान पश्चिम बंगाल में शुरू हुआ नक्सलबाड़ी आंदोलन मुख्य रूप से शहरी हिंसा पर आधारित था। नक्सलियों को चुन-चुनकर साफ करने में सिद्धार्थ शंकर राय की कांग्रेसी सरकार को ज्यादा वक्त नहीं लगा। 


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महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के दुर्गम इलाकों में फैले माओवादियों की अब तक की क्या उपलब्धियां हैं? उन्होंने तिभागा-तेलंगाना की तरह कितने एकड़ भूमि जमीदारों से मुक्त कराई? तेलंगाना की सफल कम्युनिस्ट गाथा का अनुमान पी. सुंदरैया के इस कथन से लगाया जा सकता है, 'हैदराबाद में भारतीय सेना के प्रवेश के बाद क्या राज्य सत्ता का चरित्र बदल गया था? जमींदारों से मुक्त कराई गई हजारों एकड़ जमीन किसानों से वापस लेकर हम उन्हें सौंप देते?' आज पहाड़ी-आदिवासी क्षेत्रों में माओवादियों के एजेंडे पर किसान नहीं हैं। वहां खेती का भौगोलिक और आर्थिक स्वरूप भी सर्वथा भिन्न है। माओ ने जनता को पानी और कम्युनिस्ट गुरिल्ला को उसमें तैर रही मछली बताया था। छत्तीसगढ़ के माओवादियों को अग्निदीक्षित कम्युनिस्ट गुरिल्ला मान भी लें, तो जनता रूपी पानी कहां है? 

माओवादी आदिवासी इलाकों में सड़कें नहीं बनने देते। शिक्षा का प्रसार नहीं होने देते। आधुनिक सभ्यता का विस्तार रोकने के लिए जो भी संभव है, वे सभी काम करते हैं। उनका वर्ग शत्रु खाकी पहने किसान-मजदूर का बेटा है। यह सही है कि बाहर के लोगों ने आदिवासियों का लगातार शोषण किया है। आदिवासियों को उनकी प्राकृतिक संपदा से वंचित किया जाता रहा है। लेकिन इन्हीं इलाकों में तेंदू पत्ता कारोबार बेरोक-टोक चलता रहा। माओवादियों को ठेकेदारों और व्यवसायियों से पैसा मिलने के आरोप लगातार लगते रहे हैं। माओवादी हमदर्दों की यह बात तर्क की खातिर मान लेते हैं कि थैलीशाहों से साठगांठ का आरोप गलत है। तो फिर राज्य सत्ता को सफल चुनौती देने वाले सुप्रशिक्षित हथियारबंद दस्ते खड़े करने के लिए जरूरी वित्तीय स्रोत क्या हैं? गरीब आदिवासियों के पास तो पूरे साल दो जून की रोटी या पसिया का भी इंतजाम नहीं होता। 

भारत की राज्य सत्ता वर्ग हितों की साधक है और साम्राज्यवादी दुमछल्ला भी-इसके आगे भारतीय राष्ट्र-राज्य के बारे में माओवादियों की सोच गौरतलब है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पोलित ब्यूरो और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के सदस्य किशन जी ने पश्चिमी बंगाल में पुलिस से मुठभेड़ में मारे जाने से पहले द वीक को दिए गए इंटरव्यू में कहा था, 'पूर्वोत्तर और कश्मीर की जनता को आत्मनिर्णय का अधिकार है। उन्हें तय करने दें कि वे भारत में रहना चाहते हैं या नहीं। भारतीय फासिस्ट राज्य ने छह लाख से अधिक सैनिक और अर्द्ध सैनिक बल कश्मीरी जनता की आकांक्षाओं के दमन के लिए लगा रखा है।' 

पार्टी की नौवीं कांग्रेस के राजनीतिक प्रस्ताव में कहा गया, 'भारत अनेक राष्ट्रीयताओं का देश है, जो विकास के विभिन्न चरणों से गुजर रहा हैं; वे भारत के शासक वर्ग की दमनकारी और विस्तारवादी नीतियों से संघर्षरत हैं।' बाद में किशन जी ने हिंसा के मुद्दे पर कहा, 'हम न्यायोचित युद्ध में लगे हैं।' लेनिन, स्तालिन और माओत्से तुंग के सिद्धांतों और व्यवहार की कसौटी पर परखें, तो भारत के विखंडन की थिअरी पेश करने वाले ये माओवादी किसी भी दृष्टि से कम्युनिस्ट क्रांतिकारी नहीं माने जा सकते। 1949 में सत्ता में आने के बाद माओ ने पूर्वी तुर्किस्तान और तिब्बत सहित अन्य राष्ट्रीयताओं को मुक्त नहीं होने दिया। बल्कि सिंकियांग में मुसलमानों और तिब्बत में बौद्धों को निर्जीव करने के इरादे से लाखों की संख्या में हान चीनियों को बसाया जाने लगा। यह अपने ढंग की नस्लकुशी है। अक्तूूबर क्रांति के बाद सोवियत राज्य सत्ता ने मध्य एशियाई जनतंत्रों पर शिकंजा और कस दिया। सोवियत सत्ता के विघटन के बाद इन जनतंत्रों को स्वतंत्रता मिल पाई।

नगालैंड, मिजोरम, असम, मणिपुर और कश्मीर में उग्रवादी-अलगाववादियों के साथ बातचीत का लंबा सिलसिला रहा है। उनका राजनीतिक एजेंडा था। सच्चे लोकतंत्र में यह गुंजाइश होनी भी चाहिए। नेपाल के जिन माओवादियों से भारत के माओवादियों के घनिष्ठ संपर्क हैं (वरिष्ठ नेपाली माओवादी नेता सीपी गजुरेल इसकी पुष्टि कर चुके हैं), उन्होंने नई दिल्ली में ही 12 सूत्री समझौते पर दस्तखत किए थे और उसी के तहत आज नेपाल में उनकी सरकार चल रही है। इसी भारत की 'बुर्जुआ' सरकार की मध्यस्थता से यह संभव हो पाया था। माओवादियों का कोई स्पष्ट एजेंडा होता, तो अब तक सार्थक बातचीत हो चुकी होती और उसके नतीजे सामने होते। यह तय है कि अनिश्चित काल तक भारत उनके खिलाफ सैनिक कार्रवाई जारी रख सकता है, पर वे नहीं। 

लेकिन कड़वा सच यह है कि अभी तक कारगर रणनीति नहीं बन पाई है। मसलन, यह मामूली-सी बात दिमाग में नहीं आई कि पंजाब के मैदानों में खालिस्तानी आतंकवाद का उन्मूलन करने वाले केपीएस गिल (अब दिवंगत) और पंजाब पुलिस के उनके दक्ष कमांडो छत्तीसगढ़ की पहाड़ियों और जंगलों में कैसे सफल होते। टेकुलगुडम की पहाड़ी पर माओवादियों की जिस सड़ासीनुमा व्यूहरचना में सुरक्षाबलों को भारी नुकसान पहुंचा, वह तो ढाई हजार साल से चल रही है। जिस कांकेर के पास से माओवादी इलाका शुरू होता है, उसी के जंगल वारफेयर स्कूल में इसे पढ़ाया जाता है। पहाड़ियों और जंगलों में ह्यूमन इंटेलिजेंस की सीमाएं हैं। टेक्निकल इंटेलिजेंस के उन्नत उपायों और अतीत की विफलताओं के संदर्भ में नई कारगर रणनीति पर अमल से कामयाबी हासिल की जा सकती है।

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