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एक फैसले से जुड़ी जिंदगियां

Sun, 09 Apr 2017 06:56 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 09 Apr 2017 06:56 PM IST
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Many Life related to a decision
तवलीन सिंह

राजनीति के महापंडित बहुत पहले कह गए हैं कि लोकतंत्र चार खंभों पर निर्भर होता है। ये खंभे जितने मजबूत होते हैं, उतनी मजबूत देश की लोकतांत्रिक प्रणाली। ये चार खंभे हैं: संसद, प्रशासन, न्यायालय और मीडिया। संसद का काम है कानून बनाना, प्रशासन का शासन संभालना, न्यायालयों का कानून की रक्षा करना और हम पत्रकारों का काम है, बाकी खंभों के कार्यों की निगरानी रखना। विकसित लोकतांत्रिक देशों में इस पाठ को दोहराने की जरूरत नहीं होती है,क्योंकि लोकतंत्र के उसूल सब जानते हैं। खंभों के बीच लक्ष्मण रेखाएं पक्की होती हैं, इतनी कि एक दूसरे के काम में दखल नहीं करते हैं।

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हमारे भारत देश में लोकतंत्र अभी कमजोर है, सो लक्ष्मण रेखाओं का उल्लंघन करना आसान है। पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि न्यायाधीश नीतियां बनाने में लग गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कभी कोयले के खान बंद कराने की नीति बनाई, तो कभी सेलफोन कंपनियों के तमाम लाइसेंस रद्द कर दिए, बिना यह देखे कि इन फैसलों से कितने लोग बेरोजगार हुए और कितने विदेशी निवेशक भारत छोड़कर भाग गए। पिछले सप्ताह सर्वोच न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि जहां से हाइवे गुजरते हैं, उनके आसपास पांच सौ मीटर की दूरी तक शराब की बिक्री नहीं होगी। न्यायाधीशों के इरादे बेशक नेक थे, लेकिन क्या इस फैसले को सुनाने से पहले परिणाम के बारे में ध्यान से सोचा? विनम्रता से अर्ज करना चाहूंगी कि देश भर में इस नीति को लागू करने से पहले आदरणीय जजों ने न आर्थिक नुकसान पर ध्यान दिया और न ही इस पर कि जिस देश में हर वर्ष एक करोड़ से ज्यादा युवाओं के लिए नए रोजगार पैदा करने की जरूरत हो, वहां लाखों युवाओं को एक फैसले से बेरोजगार करना ठीक नहीं।
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फैसला आते ही हल्ला मच गया। सोशल मीडिया पर लोग सवाल पूछने लगे, क्या शराबी अपना इंतजाम अपनी गाड़ियों में नहीं करने लग जाएंगे? क्या 501 मीटर की दूरी पर शराब की दुकानें बन जाएं, तो जायज होगा? क्या राज्य सरकारें इन दुकानों के बंद होने से जो घाटा होगा, उसे बर्दाश्त कर पाएंगी?
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कोई तीन दशक पहले विकसित पश्चिमी देशों में भी यह समस्या हुआ करती थी। उन देशों में अब बहुत कम लोग हैं, जो शराब पीकर गाड़ी चलाने की गलती करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि तीन बार इस जुर्म में पकड़े गए, तो लाइसेंस हमेशा के लिए जब्त हो जाता है। अपने देश में समस्या यह है कि लोगों में कानून का का भय नहीं है और ऊपर से पुलिस में भ्रष्टाचार इतना है कि पकड़े भी गए, तो रिश्वत देकर काम चल जाता है। इस तरह की समस्याओं का समाधान ढूंढने के बदले सजा उन लोगों को दी जा रही है, जिनकी रोजी-रोटी हाइवे के किनारे छोटे-मोटे रेस्तरां से चलती है। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में, जहां वाइन उद्योग बड़े पैमाने पर है, नासिक के आसपास नुकसान बेहिसाब होगा, क्योंकि वहां ऐसी कई दुकानें हैं। इधर गुड़गांव में तो फैसला आते ही कई रेस्तरां बंद ही हो गए। अनुमान लगाना मुश्किल है कि कितने लाख लोगों की नौकरियां समाप्त हो गई हैं इस एक फैसले से।


सो जज साहब से अनुरोध है कि न्यायपालिका को मजबूत करने में ज्यादा ध्यान देना शुरू करें। भारत में न्याय प्रणाली की सुस्त रफ्तार से दुखी होकर कई लोग अदालतों के दरवाजे तक पहुंचने से कतराते हैं। मुंबई में मैं गरीब महिला या पुरुष के साथ अदालत जाना हुआ है, यदि उनके साथ कोई न हो तो उनके लिए वकील करना असंभव होता है। सो नीतियां बनाना उन पर छोड़िये जिन्हें यह काम मतदाताओं ने सौंपा है।

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