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जीवन में सुख-समृद्धि का मंत्र

Mon, 11 Mar 2013 11:05 PM IST
Updated Mon, 11 Mar 2013 11:05 PM IST
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mantra of pleasures and prosperity in life

महर्षि गौतम ने एक दिन अपने पुत्र चिरकारी को उपदेश देते हुए बताया, मन में किसी की सेवा सहायता का विचार आए, तो उसे तुरंत पूरा कर लेना चाहिए, अन्यथा विलंब करने पर मन बदल सकता है। ठीक इसी तरह, अगर प्रतिशोध या हिंसा का विचार आए, तो सोच-विचार के लिए उन्हें कम-से-कम बारह घंटे तक रोके रखना चाहिए। ऐसा करने से जीवन में सुख-समृद्धि और शांति आती है।

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महर्षि गौतम एक बार अपनी पत्नी से किसी बात पर बहुत नाराज हो उठे। उन्होंने चिरकारी को तलवार देते हुए आदेश दिया, अपनी दुष्टा माता की हत्या कर दो। और आदेश देकर वह वन की ओर चले गए। चिरकारी को अपने पिता के वाक्य याद आ गए कि हिंसा के किसी मामले में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। उन्होंने तलवार एक ओर रख दी और भगवान का भजन करने लगे।
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महर्षि गौतम का क्रोध शांत हुआ, तो उन्हें आभास हुआ कि उन्होंने पत्नी की हत्या का आदेश देकर गलती की है। वह भागे-भागे आश्रम में पहुंचे। चिरकारी से पूछा, क्या माता की हत्या कर दी है? चिरकारी ने उत्तर दिया, आपने ही तो कहा था कि बुरे काम करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। इसलिए हत्या नहीं की, अब किए देता हूं।
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महर्षि ने तलवार लेकर नदी में फेंक दी। उन्हें संतोष था कि वर्षों पहले दिए उनके उपदेश ने चिरकारी को मातृ-हत्या के पाप से बचा लिया।

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