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विफलता के चार वर्ष
रशीद किदवई (24 अकबर रोड के लेखक)
Updated Tue, 21 May 2013 09:44 PM IST
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हरेक व्यवस्था के सामने दो तरह की चुनौतियां होती हैं। एक तो गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई जैसी पारंपरिक मुश्किलें, और दूसरी आतंकवादी हमले, आर्थिक मंदी, बढ़ते भ्रष्टाचार जैसी नई चुनौतियां। कोई भी व्यवस्था तभी सही ढंग से काम कर सकती है, जब वह इन चुनौतियों से निपटने के लिए नए-नए प्रयोग करे।
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इस लिहाज से अपने चार साल के इस कार्यकाल में यूपीए सरकार विफल रही है। यूपीए की पिछली सरकार ने घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय मसलों से निपटने के लिए कई नए प्रयोग किए थे।
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मसलन, एक तरफ जहां उसने मनरेगा जैसी योजना चलाई, वहीं दूसरी तरफ वाम दलों के विरोध के बावजूद उसने अमेरिका के साथ परमाणु समझौता किया। नए प्रयोग की वजह से ही यूपीए दोबारा सत्ता में आई।
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दूसरी पारी में यूपीए सरकार को नई चुनौतियों से जूझने के लिए नए प्रयोग का जोखिम उठाना चाहिए था, लेकिन वह अपनी विफलता का ठीकरा सहयोगी दलों पर ही फोड़ती रही।
दूसरी पारी में सहयोगी दलों के छिटकने के पीछे काफी हद तक राजनीतिक हालात जिम्मेदार रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यूपीए अध्यक्ष सहयोगियों को साथ लेकर चलना नहीं जानतीं। लेकिन पश्चिम बंगाल के राजनीतिक हालात ही कुछ ऐसे हो गए कि उन्हें अपनी पार्टी और दूसरे में भेद करना पड़ा।
फिर कांग्रेसी नेताओं में यह भावना घर कर गई है कि सरकार बचाए रखने या बनाने के लिए संख्याबल हासिल करना मुश्किल नहीं है। इसलिए कई राज्य इकाइयों के नेता अपने दम पर चुनाव लड़ने की बात करते हैं।
इसके अलावा, नरसिंह राव की सरकार ने अपनी सत्ता बचाने के लिए जैसे हथकंडे अपनाए, उसी तरह की रणनीति दूसरी पारी में यूपीए ने भी अपनाई। नतीजतन सरकार तो चल रही है, लेकिन इसका आम लोगों में बहुत गलत संदेश गया है।
यों तो सोनिया एवं राहुल गांधी की तरफ से सरकार के कामकाज में दखलंदाजी के सीधे सुबूत सामने नहीं आए हैं, लेकिन इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ सकते कि सरकार और कांग्रेस के बीच बहुत बड़ी वैचारिक दरार है।
एक तरफ मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहलूवालिया, पी चिदंबरम जैसे लोग हैं, जो आर्थिक सुधार की गाड़ी को आगे बढ़ाना चाहते हैं, दूसरी ओर, सोनिया गांधी की टीम लोक-कल्याणकारी कार्यकमों को आगे बढ़ाना चाहती हैं।
इस वैचारिक दरार को खत्म करने की जिम्मेदारी यूपीए एवं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की थी, लेकिन अपनी भूमिका के साथ वह न्याय नहीं कर पाईं। इसी वैचारिक दूरी की वजह से मौजूदा यूपीए सरकार नीतिगत अपंगता की शिकार हुई।
जहां तक कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की बात है, तो वह बिना कोई बदलाव किए बहुत बड़ा बदलाव लाना चाहते हैं! लेकिन कोई भी बड़ा परिवर्तन पार्टी या सरकार में उलटफेर के बगैर कैसे संभव है!
यह सही है कि एक के बाद एक घोटालों के बावजूद प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि साफ-सुथरी है, लेकिन उनका राजनीतिक प्रबंधन बहुत खराब रहा है।
पवन कुमार बंसल का उदाहरण ले लीजिए। होना तो यह चाहिए था कि रेल घूसकांड में उनके भानजे की संलिप्तता का मामला सामने आते ही उन्हें स्वयं नैतिकता के आधार पर पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था। जब उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो प्रधानमंत्री को चौबीस घंटे के भीतर उनसे इस्तीफा मांगना चाहिए था।
पर जब ऐसा कुछ नहीं हुआ, तब सोनिया गांधी को सक्रिय होना पड़ा। इसके बाद पवन बंसल ने इस्तीफा दिया। इससे सरकार और पार्टी, दोनों की छवि को नुकसान हुआ। दरअसल यूपीए सरकार में नैतिक साहस की कमी है।
प्रधानमंत्री ने जब भी किसी मसले पर जोर डाला है, उस चुनौती से सरकार सफलतापूर्वक निपटी है, लेकिन असली समस्या यही है कि प्रधानमंत्री खुद पहल करने से हिचकते हैं। उन्होंने परमाणु समझौते के समय जोर डाला, सीधे विदेशी निवेश के मुद्दे पर जोर डाला, तो वे दोनों मामले निपट गए।
सवाल यह है कि वह अन्य मसलों पर भी इसी तरह जोर क्यों नहीं डालते। दिग्विजय सिंह ने कहा था कि सत्ता के दो केंद्र नहीं होने चाहिए, लेकिन बहुत से कांग्रेसी नेताओं की सोच यही है। पार्टी का काम दिशा-निर्देश देना भी होता है, जिससे सरकार को सहयोग मिलता है, लेकिन पार्टी नेता ऐसा नहीं कर पा रहे।
जहां तक विदेश नीति की बात है, तो यूपीए सरकार इस मामले में देशवासियों को भरोसे में लेने में नाकाम रही है। चूंकि यह दौर आर्थिक राजनय का है, ऐसे में विदेश नीति आर्थिक हित-अहित को ध्यान में रखकर ही तैयार किए जाते हैं। दक्षिण एशिया का क्षेत्र बहुत ही संवेदनशील है।
पाकिस्तान या चीन के साथ रिश्ते में हम उग्र रवैया नहीं अपना सकते, यह बात देश को समझाने में सरकार विफल रही है।