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स्थिरता के पक्ष में पूर्वोत्तर का जनादेश
विनोद रिंगानिया
Updated Fri, 01 Mar 2013 10:20 PM IST
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सुदूर पूर्वोत्तर के तीनों राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के विधानसभा चुनावों में जनता ने परिवर्तन के बजाय यथास्थिति के पक्ष में मतदान किया है। बांग्लादेश से सटे त्रिपुरा में कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे में टक्कर होती रही है। लेकिन लगातार पांचवीं बार वाम मोर्चे का दो-तिहाई बहुमत लेकर शासन में आना वहां कांग्रेस की राजनीतिक जमीन को खत्म करता जा रहा है।
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देश भर में वामपंथ का खात्मा होने के बाद भी देश के एक कोने में माकपा यदि शासन कर रही है, तो इसमें देखने वाली बात यह है कि इसका श्रेय वामपंथी विचारधारा को कहां तक जाता है और कहां तक त्रिपुरा में वामपंथी नेताओं की साफ-सुथरी छवि, सादा जीवन और भ्रष्टाचार से परहेज को।
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मेघालय राज्य अपने गठन के थोड़े दिनों बाद ही अस्थिरता का पर्याय बन गया था। वहां भी इस बार कांग्रेस को इतनी अधिक सीटें मिल गई हैं कि वह चाहे, तो अपने साझेदार यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी के सहयोग के बिना ही अपनी सरकार बना सकती है। उसे सरकार बनाने के लिए बाहर से सिर्फ दो सदस्यों के समर्थन की जरूरत है, जिसे जुटाना बहुत मुश्किल नहीं है। मेघालय राज्य की उम्र 41 वर्ष है और इस दौरान वहां 23 मुख्यमंत्री बन चुके हैं।
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प्रथम मुख्यमंत्री कांग्रेस के विलियमसन संगमा ने अकेले अपने दम पर सरकार बनाई थी। पर उसके बाद से मेघालय का इतिहास रोज-रोज के तख्तापलट और नाजुक गठबंधनों का रहा है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पूर्णो संगमा की हाल ही में बनी नेशनलिस्ट पीपुल्स पार्टी का जहां तक सवाल है, तो यह चुनाव में कोई खास कामयाबी हासिल नहीं कर पाई। लोकसभा अध्यक्ष के पद पर रहने के दौरान संगमा का जो आभामंडल था, कांग्रेस छोड़ने के बाद से ही उसमें दिन पर दिन कमी आई है। ताजा चुनावी नतीजे उनके लिए निराश करने वाले होंगे।
नगालैंड में भी सत्तासीन डेमोक्रेटिक अलाएंस ऑफ नगालैंड ने फिर से सत्ता पर कब्जा कर लिया है। इस मोर्चे की अगुवाई नगा पीपुल्स फ्रंट कर रहा है। वैसे नगा पीपुल्स फ्रंट की अगुवाई वाले इस मोर्चे का फिर से सत्ता में आना तय जैसा था। चुनाव से पहले यह जितने आत्मविश्वास के साथ बातें कर रहा था, उससे इसका आभास मिलता था।
नगा समस्या के समाधान के संदर्भ में कुछ महीने पहले इसके विधायकों का एक बड़ा दल राजधानी में जाकर गृह मंत्री तथा अन्य नेताओं से मिला था और उनसे यह पेशकश की थी कि विधानसभा की सदस्यता से उनके इस्तीफा देने से यदि नगालैंड की विद्रोही समस्या का समाधान होता है, तो वे इसके लिए तैयार हैं। इन लोगों का कहना था कि विधानसभा चुनाव से पहले ही नगा विद्रोहियों के साथ कोई समझौता कर लिया जाए और एक अंतरिम सरकार बनाकर विद्रोहियों को भी शासन में भागीदारी दी जाए।
नगालैंड के संदर्भ में यह बात कचोटती है कि वहां अब तक एक भी महिला विधानसभा में नहीं पहुंच पाई। इस बार भी सिर्फ दो महिला उम्मीदवार मैदान में थीं, लेकिन उनमें से कोई भी जीत दर्ज नहीं करा पाई। जिस राज्य में महिलाएं शिक्षा सहित हर सामाजिक क्षेत्र में काफी आगे रही हैं, वहां महिलाओं का राजनीति से दूर-दूर रहना विचित्र-सा लगता है। हालांकि इससे नगा जनजाति के व्यक्तित्व के एक विशिष्ट पहलू के बारे में जानकारी मिलती है।
इसी तरह मेघालय में हम देखते हैं कि वहां संपत्ति का अधिकार परिवार की सबसे छोटी बेटी को ही है और वंश परंपरा भी बेटियों के नाम से ही चलती है। लेकिन वहां परंपरागत रूप से महिलाएं राजनीति से दूर रही हैं। पुरानी परंपरागत शासन प्रणाली में भी महिलाओं को किसी प्रकार का अधिकार या भागीदारी नहीं दी गई थी। ऐसा शायद इसलिए हो सकता है कि मेघालय और नगालैंड, दोनों ही राज्यों में परंपरागत रूप से राजकाज का मतलब युद्ध और कबीलों की आपसी लड़ाई रहा है और पूर्वोत्तर के इन दोनों जनजातीय समाज में महिलाओं के युद्ध में शामिल होने का कोई इतिहास नहीं मिलता। फिर भी आधुनिक संदर्भ में महिलाओं का राजनीति से दूर रहना अखरता तो है ही।