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मर्द, औरत और रिवॉल्वर
मनीषा सिंह
Updated Wed, 07 Jun 2017 07:04 PM IST
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मनीषा सिंह
कहा जाता है कि बंदूक या रिवॉल्वर आपको ताकतवर होने का एहसास कराती है। यह एक तरह की आजादी जैसा है, जैसे कि कार चलाना सीखना, कुछ मायनों में कंप्यूटर चलाना और इंटरनेट का इस्तेमाल करना। जब बात ताकत और आजादी की हो तो महिलाओं को ये दोनों चीजें स्वाभाविक रूप से हासिल नहीं हैं। इन्हें पुरुषों के दायरे की चीज माना जाता है। अगर महिलाओं को इनके करीब लाने की कोशिश हो, तो खुद महिलाओं में ही इन्हें लेकर हिचक कायम रहती है। बात अगर सिर्फ बंदूक या रिवॉल्वर की करें, तो इनसे जुड़े कुछ विरोधाभासी तथ्य या घटनाएं इधर देखने को मिलीं।
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बुंदेलखंड इलाके के मौदहा के भवानी गांव में एक दूल्हे अशोक यादव को ऐन शादी के दिन भरे मंडप से वर्षा साहू नामक लड़की ने 'अगवा' कर लिया। वर्षा और अशोक यादव का प्रेम प्रसंग चल रहा था, लेकिन बीच में दोनों में किसी बात को लेकर बातचीत बंद हो गई। एक दिन पता चला कि अशोक हमीरपुर में शादी कर रहा है, तो वर्षा रिवॉल्वर लेकर पहुंच गई और मंडप से अशोक को उठा लाई।इसी तरह की एक अन्य घटना उत्तर प्रदेश के औरेया में संपत्ति विवाद को लेकर एक महिला ने असलहों के बल पर अपने ही पति का अपहरण कर लिया। इन घटनाओं की हाल में काफी चर्चा रही है और महिलाओं को 'रिवॉल्वर रानी' कुछ इस तरह कहा जा रहा था, मानो वे कोई दस्यु सुंदरी हों। हिम्मत से ज्यादा चर्चे उनके दुस्साहस के थे। सवाल उठा कि उनमें इतनी हिम्मत कहां से आ गई। क्या बंदूक या रिवॉल्वर ने उन्हें मर्द जाति से भिड़ने का हौसला दिया? क्या असलहों के बल पर वे समस्त पुरुष समुदाय से टकराने का जज्बा अपने भीतर ले आईं?
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सवाल कई हैं और इन सवालों की रोशनी में जब वर्ष 2012 में दिल्ली में घटित निर्भया हादसे को याद करते हैं, तो तमाम पैरोकारों की दलील थी कि महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए रिवॉल्वर थमा देना चाहिए। निर्भया हादसे के करीब दो साल बाद 2014 में ‘निर्भीक’ नामक 0.32 कैलिबर का रिवॉल्वर लॉन्च किया, जिसे देश का पहला ‘महिलाओं से जुड़ा हथियार’ कहा-बताया गया। वजन में बेहद हल्के, लगभग 500 ग्राम के ‘निर्भीक’ की खासियत बताई गई कि इसे महिलाएं अपने हैंडबैग में रख सकती हैं और लफंगों-बुरे इरादे वाले मर्दों से जब चाहे, लोहा ले सकती हैं। इंडियन ऑर्डनेंस फैक्टरी (आईओेएफ) की देन इस रिवॉल्वर की महिला खरीदारों की संख्या लाखों न सही, हजारों में तो होनी चाहिए थी। आईओएफ ने अब तक जो तीन हजार निर्भीक रिवॉल्वर बेचे हैं, उनमें से ज्यादातर के खरीदार पुरुष हैं। इन्हें गिनती की ऐसी महिलाओं ने खरीदा है जो गन-लाइसेंसधारक हैं।
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असल में, समस्या कानूनी पहरेदारी, महिलाओं के दबंग होने या खुद की सुरक्षा के प्रति और सजग-सतर्क होने की नहीं, बल्कि सामाजिक बेचारगी की है। एक तरफ सरकार और कानून महिलाओं को सुरक्षित माहौल देने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ वही मर्दवादी, अहंकारी और पितृसत्तात्मक समाज है, जो स्त्री को अपनी औकात में रहने को मजबूर करता है। ऐसी स्थितियों में साफ है कि अगर कोई महिला रिवॉल्वर रखने में सफल हो जाती है, पैनिक बटन वाला मोबाइल अपने पास रखती है या मोबाइल में तमाम एप्लिकेशन डाउनलोड कर लेती है, तो भी उसकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। सवाल यह है कि क्या यह जिम्मेदारी सिर्फ एक महिला की है कि वह खुद को बदनीयत से भरे लोगों से बचने का प्रबंध करे, क्या हमारे समाज को इससे कोई सरोकार नहीं है?