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दीदी को किससे खतरा है
हरिराम पाण्डेय
Updated Sun, 16 Feb 2014 06:09 PM IST
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कोलकाता में पिछले दिनों चार महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएं हुईं। पहली घटना बंगाल में राजनीतिक संस्थान समझे जाने वाले सौमेन मित्र का राज्य के सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस से अपने पुराने घर कांग्रेस में आना थी, दूसरी तृणमूल, तीसरी नरेंद्र मोदी और चौथी माकपा की रैली थी। ये तीनों रैलियां स्थानीय ब्रिगेड परेड मैदान में हुईं। यह ऐतिहासिक मैदान अपने आप में राजनीतिक दलों का जन-समर्थन प्रदर्शित करने का एक स्थान है।
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इन चारों घटनाओं में सबसे ज्यादा चर्चित सौमेन मित्र का पाला बदलना और मोदी की रैली है। हालांकि मोदी की रैली में जुटी भीड़ को लेकर मतभिन्नताएं हैं। भाजपा कहती है दो से ढाई लाख लोग थे, वरुण गांधी कहते हैं कि पचास हजार लोग थे और पुलिस के रिकॉर्ड में एक लाख से ज्यादा संख्या दर्ज है।
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इस भीड़ को लेकर राज्य पार्टी इकाई का प्रचार तंत्र बहुत उत्साह में है। उसका मानना है कि इस बार मोदी प्रभाव के कारण सीटें बढ़ेंगी। बंगाल से भाजपा के दो सांसद तपन सिकदार और सत्यब्रत मुखर्जी निकट अतीत में चुने जा चुके हैं। ये दोनों दमदम और कृष्णनगर से फिर अपना भाग्य आजमा सकते हैं। बप्पी लाहिड़ी भी बंगाल की किसी सीट से भाजपा के टिकट पर खड़े हो रहे हैं। राहुल सिन्हा ने तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद विक्रम सरकार समेत कई पूर्व अधिकारियों को पार्टी में शामिल कराकर माहौल बनाने का प्रयास भी किया है। उस प्रयास को गति देने के मकसद से ही ब्रिगेड में रैली आयोजित की गई थी। सर्वेक्षण दिखा रहे हैं कि राजग को बहुमत नहीं मिलेगा, जबकि तेदेपा, तृणमूल कांग्रेस और अन्नाद्रमुक को बेहतर सीटें मिल रही हैं। इसने भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में तृणमूल के साथ चुनाव बाद गठबंधन की संभावना बनाए रखी थी, पर तृणमूल ने भाजपा के साथ आने के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं की है।
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दरअसल सत्तारूढ़ तृणमूल के लिए सिर्फ 2014 का चुनाव ही मुद्दा नहीं है। दो साल बाद वहां विधानसभा चुनाव भी होने हैं। अगर लोकसभा चुनाव में भाजपा पश्चिम बंगाल में कुछ सीटें जीतने में कामयाब हो जाती है, तो बेहतर प्रशासन और विकास के वायदे के साथ 2016 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल के लिए वह एक बड़ी चुनौती बन जाएगी। वैसे भी ममता की सरकार बांग्लादेश से हो रही घुसपैठ नहीं रोक सकी, न ही राज्य में निवेश का माहौल बना सकी है। भाजपा का वोट प्रतिशत इस समय 18 फीसदी बताया जा रहा है, लेकिन मोदी प्रभाव के बाद इसमें बढ़ोतरी हो सकती है। मोदी अपनी योजनाओं के कारण देश के युवाओं को रिझाने में कामयाब रहे हैं। तृणमूल की कमजोरी से माकपा की राज्य में वापसी हो सकती है, जिसे भाजपा के साथ मिलकर ही ममता रोक सकती हैं। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि अगले एक दशक में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हालात क्या करवट लेते हैं?
आसन्न लोकसभा चुनाव की सभी सीटों पर लड़ने का ऐलान बंगाल भाजपा पहले ही कर चुकी है। उसकी चुनावी तैयारी को देखते हुए कुछ सीटों पर वह कड़ी टक्कर दे सकती है। लेकिन भाजपा किसके वोट बैंक में सेंधमारी करेगी? भाजपा उम्मीदवारों की उपस्थिति से कई सीटों पर चतुष्कोणीय मुकाबला हो सकता है। लेकिन बंगाल की राजनीतिक विचारधारा की नब्ज समझे जाने वाले मुहल्ले के अड्डों पर इस पर गंभीर विमर्श बहुत ज्यादा नहीं है। इसका सीधा अर्थ है कि मोदी प्रभाव बहुत कारगर नहीं है। वैसे भी राज्य में भाजपा बहुत सीमित क्षेत्रों में मौजूद है, और वह मौजूदगी भी वोट में बहुत कम बदलती है। इस बार भी राज्य में भाजपा को कोई सीट शायद ही मिले। अगर इक्का-दुक्का सीट मिलती भी है, तो वह पार्टी के बदौलत नहीं, उम्मीदवार के बल पर मिलेगी। वैसे भी मोदी की कोलकाता रैली को लेकर संघ बहुत क्षुब्ध है, क्योंकि उन्होंने अपने भाषण में बांग्लादेशी घुसपैठियों के बारे में कुछ नहीं कहा। इससे बंगाल में पार्टी समर्थकों और संघ में भारी निराशा हुई।
दूसरी तरफ सौमेन मित्र का कांग्रेस में लौटना एक बड़े राजनीतिक लाभ का संकेत दे रहा है। पश्चिम बंगाल में 90 के दशक से कांग्रेस की राजनीति में जिन चार नेताओं का वर्चस्व रहा, वे थे प्रियरंजन दासमुंशी, सुब्रत मुखर्जी, सौमेन मित्र और ममता बनर्जी। राज्य में मध्यवर्गीय समुदाय जनमानस तैयार करता है और मतदाता भी यही समुदाय है। बंगाल की भद्रलोक संस्कृति में जो थोड़े से उच्च मध्यवर्गीय लोग और सिलेब्रिटी हैं, वे मतदान में शायद ही भाग लेते हैं। एक दूसरा समुदाय है, जो पढ़े-लिखे और कुछ अर्जित करने वाले लोगों का है। यही समाज बंगाल के जन समुदाय के विचार की दिशा तय करता है। यह समुदाय पहले खुद को प्रगतिशील कहता था और कम्युनिस्ट पार्टी को वोट देता था। इसी के बल पर वाम पार्टी राज्य में 35 वर्षों तक टिकी रही। बाद में इन्होंने ममता बनर्जी के परिवर्तन के ऐलान में आवाज मिलाई। लेकिन कोई परिवर्तन न होने के कारण यह समुदाय आज मोहभंग की स्थिति में है। सौमेन इन्हीं लोगों के नेता हैं और उनका आना कांग्रेस को राजनीतिक लाभ दिलाएगा। किंतु राज्य में विरोधी दलों का छीजता संगठन बहुत उम्मीद नहीं जगाता।
तृणमूल चूंकि सत्ता में है, उनके मध्यम स्तरीय नेता लाभ की स्थिति में हैं और पार्टी में आंतरिक अनुशासन आतंक के बिंदु तक है, इसलिए लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें उसे ही मिलेंगी। अपनी सारी ऊर्जा के बावजूद सौमेन संगठन में शायद ही चमत्कार कर सकें। कांग्रेस को परंपरागत वोट ही मिलने की उम्मीद है। यानी मोदी या कांग्रेस चाहे कुछ भी दावा करें, बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में बहुत बदलाव के आसार तो नहीं दिखते।