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चिंतन: पर्यावरणविद गांधी की विरासत, संकट के हल में मदद करेगी सोच

Sun, 04 Jun 2023 07:33 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 04 Jun 2023 07:33 AM IST
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सार
राजनीतिक विवादों को निपटाने में अहिंसा की उनकी खोज के लिए, अंतर-विश्वास सद्भाव के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और अस्पृश्यता को खत्म करने के उनके संघर्ष के लिए बेहतर रूप से जाने जाने वाले गांधी की विरासत पर्यावरणीय संकट से उबरने में भी सहायक है।
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Mahatma Gandhi legacy as Environmentalist Chipko Movement and Narmada Movement industrialisation
Mahatma Gandhi - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

करीब तीस साल पहले औद्योगीकरण और विनाश शीर्षक से प्रकाशित गांधी के आलेखों के एक संग्रह को पढ़ते हुए मेरा ध्यान एक असाधारण टिप्पणी पर गया, जोकि सबसे पहले यंग इंडिया के 20 दिसंबर, 1928 के अंक में प्रकाशित हुई थीः 'ईश्वर न करे कि भारत कभी पश्चिम की तरह औद्योगीकरण का रास्ता अपनाए। एक छोटे से द्वीपीय राष्ट्र (इंग्लैंड) के आर्थिक साम्राज्यवाद ने आज सारी दुनिया को जंजीरों से जकड़ रखा है। यदि 30 करोड़ की आबादी वाला पूरा देश इसी तरह का आर्थिक शोषण करता है, तो यह दुनिया को टिड्डियों की तरह नंगा कर देगा।' गहन-संसाधन, गहन- ऊर्जा केंद्रित औद्योगिक विकास के अतिरेक के खिलाफ चेतावनी के रूप में इन शब्दों को पर्यावरणीय दृष्टि से पढ़ना आकर्षक लगता है। यकीनन, (पश्चिम प्रेरित) आर्थिक शोषण के इन तरीकों को अपना कर भारत और चीन आज सचमुच दुनिया को टिड्डियों की तरह नंगा करने की धमकी दे रहे हैं।



मानवीय लालच के आलोचक के रूप में, विकेंद्रीकृत, ग्राम-केंद्रित (और इसलिए कम लालची) अर्थव्यवस्था के पैरोकार के रूप में, हानिकारक या विनाशकारी राज्य नीतियों के खिलाफ अहिंसक विरोध के अग्रणी के रूप में, लंबे समय से पर्यावरण आंदोलन गांधी को अपना पूर्वज मानता आया है।


चिपको और नर्मदा बचाओ आंदोलन जैसी महत्वपूर्ण भारतीय पर्यावरणीय पहलों को ऐसे व्यक्तियों ने नेतृत्व दिया, जिन्होंने विचार और कर्म से गांधी का अनुसरण करने का दावा किया। दिवंगत अर्थशास्त्री (स्माॅल इज ब्यूटीफूल के लेखक) ईएफ शूमाकर और प्रभावशाली जर्मन ग्रीन पार्टी के विचारकों ने भी गांधी का जिक्र मिसाल के तौर पर किया है।

मैं इस आलेख में उनके विचारों के कुछ अन्य पहलुओं के बारे में बात करके मजबूती के साथ गांधी का पर्यावरणीय पक्ष रखना चाहता हूं, जिनसे हमारी आज की चिंता का अनुमान लगता है। मैं विशेष रूप से वृक्षों और वृक्ष आच्छादन के महत्व को लेकर की गई उनकी कुछ कम ज्ञात टिप्पणियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हूं।

नवंबर, 1925 में गांधी पश्चिम भारत में कच्छ के रेगिस्तानी क्षेत्र में गए थे, जहां कम बारिश और किसी बारहमासी नदी के अभाव में वनस्पतियों की कमी हो गई थी। उनके मेजबान एक सामाजिक कार्यकर्ता जयकृष्ण इंद्राजी थे, जिन्हें गांधी 'गुजरात का रत्न' कहते थे और एक ऑनलाइन स्रोत उन्हें एक एथनोबॉटनिस्ट (लोकवानस्पतिकी विज्ञानी) के रूप में उद्धृत करता है। गांधी से बीस साल पहले 1949 में पैदा हुए जयकृष्ण स्वध्याय से वनस्पति विज्ञानी बने थे और जिन्होंने बाद में पोरबंदर स्टेट (जिनके शासकों की कभी गांधी के पूर्वजों ने भी सेवा की थी) के अधीन काम किया। पौधों और वृक्षों में भारतीयों की कम दिलचस्पी से निराश होकर लोकवानस्पतिकी विज्ञानी ने टिप्पणी की, 'यूरोपीय अपने देशों को इस देश के पौधों के बारे में बताते हैं और लिखते हैं और मेरे अपने देशवासी अपने आंगन में लगे पौधों और उनके अपने पैरों तले कुचले जाने वाले पौधों के बारे में नहीं जानते।'

इस अज्ञानता का मुकाबला करने के लिए जयकृष्ण ने पोरबंदर की बर्दा पहाड़ियों की वनस्पतियों के बारे में ऐतिहासिक लेखन किया, जिसने कच्छ के महाराव का ध्यान खींचा और उन्होंने उन्हें अपने क्षेत्र में आमंत्रित किया, जहां इस लोकवानस्पतिकी विज्ञानी ने रेगिस्तान में वनीकरण को बढ़ावा देते हुए स्टेट के पौधों पर शोध करते हुए एक किताब लिख डाली।

जयकृष्ण से मुलाकात के बाद गांधी ने लिखा, 'वह बर्दा के हरेक पेड़ और हरेक पत्ते के बारे में जानते हैं। पौधारोपण में उनकी इतनी गहरी आस्था है कि वह इसे सबसे महत्वपूर्ण स्थान देते हैं। और उनका मानना है कि इन माध्यमों से बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है। इस मामले में उनका उत्साह और उनका विश्वास संक्रामक है। मैं बहुत पहले इनसे संक्रमित हो चुका हूं। शासक और प्रजा दोनों ही चाहें, तो अपने बीच ऐसे बुद्धिमान व्यक्ति की उपस्थिति का पूरा लाभ उठा सकते हैं और एक सुंदर जंगल बना सकते हैं।'

जयकृष्ण ने गांधी से 'इस सुंदर खुली जगह' में एक पौधा रोपित करवाया, जिसके बारे में इस प्रसिद्ध मेहमान ने लिखा, 'यह कच्छ में मेरे द्वारा किया गया सबसे सुखद कार्य था।' उसी दिन पेड़ों की सुरक्षा के लिए एक सोसाइटी की स्थापना की गई।

वनस्पति विज्ञानी जयकृष्ण के कच्छ में किए गए प्रयासों ने गांधी को दक्षिण अफ्रीका के कभी शुष्क और उजाड़ शहर में उनके द्वारा देखे गए परिवर्तन की याद दिला दी, जहां उन्होंने एक वकील और एक्टिविस्ट के रूप में काम किया था। गांधी ने लिखाः 'जोहान्सबर्ग भी ऐसा ही क्षेत्र था। एक समय वहां सिर्फ घास उगती थी। वहां एक भी भवन नहीं था। चालीस वर्षों के भीतर यह जगह एक सुनहरे शहर में बदल गई। एक समय था, जब लोगों को एक बाल्टी पानी के लिए बारह आने देने पड़ते थे और कभी-कभी सोडा वाटर से काम चलाना पड़ता था। कभी-कभी तो इससे उन्हें अपने हाथ-मुंह तक धोने पड़ते थे! आज वहां पानी है और पेड़ भी। बहुत शुरुआत में सोने की खदानों के मालिकों ने इस क्षेत्र को अपेक्षाकृत हरित पट्टी में बदल दिया और उत्साहपूर्वक दूर-दराज से पौधे लाकर उनका रोपण कर वर्षा की मात्रा में वृद्धि की। ऐसे अन्य उदाहरण भी हैं, जहां वनों की कटाई से वर्षा की मात्रा कम हो गई है और जहां वनीकरण द्वारा वर्षा की मात्रा में वृद्धि हुई है।'

कुछ बरस बाद साबरमती आश्रम में एक शाम गांधी बिस्तर पर जाने से पहले कपास कातना चाहते थे और कुछ पूनी बनाना चाहते थे। उनकी समर्पित अनुयायी मीरा ने एक युवा आश्रमवासी से बाग से बबूल के पेड़ से कुछ पत्ते लाने के लिए कहा, ताकि कमानी में उसे लगाया जा सके। लड़का बड़ा सा गुच्छा ले आया जिसमें सारे पत्ते कसकर बंधे हुए थे। यह वाकया सुनाते हुए मीरा ने याद किया था कि उन्होंने गांधी से कहा था,'छोटे-छोटे पत्ते सो गए हैं', और गांधी ने क्षोभ और दया के साथ कहा, 'पेड़ हमारी तरह ही जीवित प्राणी हैं। वे जीते हैं और सांस लेते हैं, वे हमारी तरह ही खाते-पीते हैं और हमारी तरह उन्हें भी नींद की जरूरत होती है। रात के समय जब कोई पेड़ आराम कर रहा होता है, तो जाकर उसके पत्ते तोड़ना बहुत ही अभागा होता है!'

गांधी, जैसा कि मीरा ने कहा, इस बात से परेशान थे कि लड़का इतना बड़ा गुच्छा ले आया। इसी तरह वह हाल ही में एक सार्वजनिक बैठक में तब परेशान हो गए थे, जब वहां उनका स्वागत बड़ी-बड़ी मालाओं से किया गया था।

जैसा कि हम जानते हैं और जैसा कि द गार्जियन में पिछले साल छपे एक लेख में कहा गया कि कार्बन खींचने की अपनी प्राकृतिक क्षमता के साथ पेड़ जलवायु आपात स्थिति से निपटने का एक सरल, आसानी से समझ में आने वाला तरीका हैं। ग्लोबल वार्मिंग और मानव गतिविधि से प्रेरित जलवायु परिवर्तन के साक्ष्य ज्ञात होने से दशकों पहले खुद गांधी इनके बारे में लिख रहे थे।

यह आलेख विश्व पर्यावरण दिवस पांच जून से एक दिन पहले प्रकाशित हो रहा है। हम उस दिन गांधी के शब्दों और चेतावनियों को याद कर सकते हैं, लेकिन हमें साल के बाकी दिनों में भी इन्हें याद रखना चाहिए।

राजनीतिक विवादों को निपटाने में अहिंसा की उनकी खोज के लिए, अंतर-विश्वास सद्भाव के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और अस्पृश्यता को खत्म करने के उनके संघर्ष के लिए बेहतर रूप से जाने जाने वाले गांधी की विरासत आज प्रासंगिक है, यदि हम हमारे सामने अभी मौजूद गंभीर पर्यावरणीय संकट को हल करना चाहते हैं।

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