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गांधी का हिमालय चिंतन: 'हृदय रूपी गुफा में छिपकर शिव दर्शन करना ही सच्ची यात्रा है'

Sun, 13 Oct 2019 02:15 AM IST
चंद्रशेखर तिवारी चंद्रशेखर तिवारी
चंद्रशेखर तिवारी Published by: चंद्रशेखर तिवारी Updated Sun, 13 Oct 2019 02:15 AM IST
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Mahatma Gandhi Himalayan contemplation visit five times in the mountain Uttarakhand
Mahatma Gandhi - फोटो : फाइल फोटो

वर्ष 1915 से लेकर 1946 तक महात्मा गांधी का पांच बार पहाड़ यानी मौजूदा उत्तराखंड में आगमन हुआ। वह काफी समय तक यहां रहे भी। वर्ष 1915 के कुंभ मेले में वह पहली बार हरिद्वार आए। अगले साल वह फिर हरिद्वार आए, जहां उनकी स्वामी श्रद्धानंद से मुलाकात भी हुई। उसके बाद गांधी जी 1929 व 1931 में कुमाऊं व 1946 में देहरादून व मसूरी की भी यात्रा पर आए। ’सच्चा हिमालय तो हमारे हृदय में है। इस हृदय रूपी गुफा में छिपकर उसमें शिव दर्शन करना ही सच्ची यात्रा है, यही पुरुषार्थ है।' महात्मा गांधी के इसी विचार ने संभवतः उन्हें बार-बार हिमालय की पहाड़ियों में आने को प्रेरित किया।


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वर्ष 1915 से लेकर 1946 तक महात्मा गांधी का पांच बार पहाड़ यानी मौजूदा उत्तराखंड में आगमन हुआ। वह काफी समय तक यहां रहे भी। वर्ष 1915 के कुंभ मेले में वह पहली बार हरिद्वार आए। अगले साल वह फिर हरिद्वार आए, जहां उनकी स्वामी श्रद्धानंद से मुलाकात भी हुई। उसके बाद गांधी जी 1929 व 1931 में कुमाऊं व 1946 में देहरादून व मसूरी की भी यात्रा पर आए। ’सच्चा हिमालय तो हमारे हृदय में है। इस हृदय रूपी गुफा में छिपकर उसमें शिव दर्शन करना ही सच्ची यात्रा है, यही पुरुषार्थ है।' महात्मा गांधी के इसी विचार ने संभवतः उन्हें बार-बार हिमालय की पहाड़ियों में आने को प्रेरित किया।

जून, 1929 में जब उनका स्वास्थ्य कुछ शिथिल हो रहा था, तो पंडित नेहरू के आग्रह पर स्वास्थ्य लाभ के लिए वह अहमदाबाद से कुमाऊं की पहाड़ियों में यात्रा को निकल पड़े।  गांधी जी की उस यात्रा का उद्देश्य हालांकि हिमालय क्षेत्र की शांत प्रकृति और यहां की शीतल आबोहवा में कुछ दिन विश्राम कर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करना था। पर उस यात्रा का एक अन्य मकसद स्थानीय कार्यकर्ताओं से मिलना, चंदा एकत्र करना तथा पहाड़ की जनता में स्वावलंबन और खादी का प्रचार करना भी था।

गांधी जी बरेली से हल्द्वानी, नैनीताल, ताकुला, भवाली, ताड़ीखेत होते हुए जब 18 जून 1929 को अल्मोड़ा पहुंचे, तो यहां उन्हें असीम शांति का अनुभव हुआ। अल्मोड़ा में तीन दिन बिताने पर उन्हें हिमालय और उसके महत्व को बहुत करीब से समझने का अवसर मिला। अल्मोड़ा के बारे में वह लिखते हैं ’शिमला और दार्जिलिंग भी हिमालय के प्रदेश हैं, किंतु वहां मुझे हिमालय की महिमा का भान न हो सका। वहां मैं रहा भी थोड़े समय तक, फिर भी मुझे तो वह प्रदेश एक अंग्रेजी बस्ती जैसा लगा। अल्मोड़ा आकर अलबत्ता मैं इस बात की कल्पना कर सका कि हिमालय क्या है।’ 

हिमालय की पारिस्थितिकी पर दिए गए उनके वक्तव्यों से साफ जाहिर होता है कि आज से आठ दशक पूर्व गांधी जी हिमालय की संवेदनशीलता और उसकी उपादेयता से भली-भांति परिचित हो चुके थे। हिमालय के बारे में उनका यह कथन पर्यावरणीय दृष्टि से जरूर समझा जाना चाहिए कि ’यदि हिमालय न हो, तो गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और सिंधु भी न हो, तो भारत रेगिस्तान या सहारा की मरुभूमि बन जाए। इस बात को जानने वाले और सदैव हर बात के लिए ईश्वर का उपकार मानने वाले हमारे दीर्घदर्शी पूर्वजों ने हिमालय को यात्रा धाम बना दिया था।’

अल्मोड़ा के अलावा कौसानी भी गांधी जी की प्रिय जगह रही, जहां उन्होंने 12 दिनों तक प्रवास किया। कौसानी में रहकर उन्होंने गीता पर आधारित अनासक्ति योग की टीका भी लिखी। हिमालय की गोद में बसे कौसानी से गढ़वाल से लेकर नेपाल तक मीलों लंबी पर्वत शृंखलाओं का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। यहां की प्राकृतिक छटा और स्वास्थ्यवर्धक आबोहवा से गांधी जी अत्यंत अभिभूत रहे।

कौसानी को ’भारत के स्विट्जरलैंड' की संज्ञा देते हुए उन्होंने यंग-इंडिया के लिए एक लेख भी लिखा। उस लेख में उनका विचार यह था कि कुमाऊं के पर्वतों में तकरीबन तीन सप्ताह तक रहते हुए उन्हें यह अनुभव हुआ है कि देश में इतनी सुंदर जगहों के होते हुए भी देश के लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए यूरोप व अन्य देशों की यात्रा क्यों करते होंगे! उन्होंने लिखा, हिमालय की स्वास्थ्यवर्धक जलवायु, इसका मनोहर दृश्य, चारों तरफ फैली हुई सुहावनी हरियाली यहां आपकी किसी भी अभिलाषा को अपूर्ण नहीं रखती। मैं सोचता हूं कि इन पर्वतों के दृश्यों तथा जलवायु से बढ़कर होना तो दूर रहा, इनकी बराबरी भी संसार का कोई भी अन्य स्थान नहीं कर सकता।'

कौसानी प्रवास के दौरान चांदी के समान चमकते हिम शिखरों से गांधी जी का सम्मोहन बराबर बना रहा। बर्फ के ये पहाड़ गांधी जी के मन में तरह-तरह के दार्शनिक बिंब भी पैदा करते रहे। हिम शिखरों में जमी इस बर्फ को जब गांधी जी अबोध बालकों के नजर से देखते हैं, तो उनके लिए वह फेनी मिठाई बन जाती है। वहीं जब वह भावुक हिंदू मन के नजरिये से देखने का यत्न करते हैं, तो यह बर्फ उन्हें शिव की जटा के समान लगने लगती है। वही जटा, जिसने धरती को प्रलय से बचाने के निमित्त गंगा की विशाल धारा को रोक रखा है। इन सबसे परे जब वह खुद के नजरिये से हिमालय को देखते हैं, तो यह बर्फ उन्हें चरखे की रुई का ढेर लगने लगती है, जिसे अभी-अभी कपास से साफ करके निकाला गया हो।

अराजकता और हिंसा के दौर में जी रही दुनिया को भाईचारा और प्रेम का मार्ग दिखाने वाले गांधी तमाम जगहों पर एक सामयिक पर्यावरण के कुशल जानकार व चिंतक की भूमिका में भी नजर आते हैं। गांधी जी के तमाम विचारों में प्रकृति और मानव के सह संबंधों, उसके सीमित उपयोग और उसके बेलगाम दोहन के प्रति चिंताएं साफ तौर पर दिखाई देती हैं। प्रकृति में मौजूद संसाधनों के दोहन के संबंध में उनका विचार था कि हमें प्रकृति से उतना ही ग्रहण करना चाहिए, जितना कि हमें जरूरत है। मनुष्य द्वारा आवश्यकता से अधिक लेकर प्रकृति को नुकसान पहुंचाने को वह उचित नहीं समझते थे। गांधी जी स्वयं को प्रकृति के एक प्रेरक व अनमोल साधक के रूप में पाते हैं। इस संदर्भ में उनका यह दार्शनिक चिंतन अत्यंत महत्वपूर्ण लगता है, 'मुझे इस प्रकृति के अतिरिक्त किसी प्रेरणा की आवश्यकता नहीं है। उसने कभी भी मुझे विफल नहीं किया है। वह मुझे चकित करती है, भरमाती है, मुझे आनंद की ओर ले जाती है।'
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