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श्रद्धा और अनुशासन: त्रासदी पर समय रहते नियंत्रण से संतोष, लेकिन प्रयागराज के हादसे से सबक जरूर लेना चाहिए
Fri, 31 Jan 2025 05:45 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
अमर उजाला
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Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Fri, 31 Jan 2025 05:45 AM IST
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महाकुंभ में मौनी अमावस्या पर भगदड़ मचने के बाद का भयावह दृश्य। (फाइल)
- फोटो :
अमर उजाला।
विस्तार
करोड़ों लोगों के आने के बावजूद अब तक बेहद शांति व कुशलता के साथ प्रबंधित हो रहे महाकुंभ में मौनी अमावस्या के दिन मची भगदड़ के बाद के दृश्य वाकई परेशान करने वाले हैं और सवाल उठाते हैं कि देश में धार्मिक आयोजनों में ऐसे दृश्य बार-बार खुद को क्यों दोहराते हैं, जिनमें आस्था अव्यवस्था के आगे बेबस नजर आने लगती है। कुछ समय पहले हाथरस में एक सत्संग में बाबा की चरण-धूलि लेने के लिए मची भगदड़ में सौ से भी ज्यादा लोगों की जानें चली गई थीं। इसी तरह, कुछ दिनों पहले बागपत में जैन निर्वाण महोत्सव के दौरान लकड़ी की सीढ़ियां टूटने से हुए हादसे में भी कुछ ऐसा ही दिखा।
गनीमत है कि कुंभ के दौरान हुआ हादसा एक सीमित क्षेत्र में हुआ और समय रहते इस पर काबू पा लिया गया, जो एक बड़ी त्रासदी भी हो सकता था। फिर भी इसने कुछ चीजों की ओर तो ध्यान दिलाया ही है। धार्मिक आयोजनों में भीड़ तो होती ही है, जिनमें प्रशासन की तैयारियां अक्सर नाकाफी ही साबित होती हैं। पिछले कुंभ में भी कुछ ऐसे ही दृश्य दिखे थे और तब भी प्रशासन को खरी-खोटी सुनाकर सबने हाथ धो लिए थे। प्रशासन को तो हमेशा ही कह सकते हैं कि उसे ध्यान देना चाहिए, जो सही भी है। लेकिन जब भी धार्मिक आयोजन होते हैं, जिसमें ज्यादा संख्या में लोग आने हों, तो भक्तों का अति उत्साह अपने आप में भीड़ के स्व-नियंत्रण का मसला भी बन जाता है।
महाकुंभ जैसे इतने बड़े आयोजन पर सहज-स्वाभाविक है कि लोग स्नान करना चाहेंगे, क्योंकि यह उनके जीवन में एक अपूर्व अवसर की तरह होता है और यह बिल्कुल स्वाभाविक भी है। लेकिन यह भी समझना चाहिए कि अव्यवस्थित भीड़ और अफवाहें कई बार त्रासदी को जन्म देती हैं। अतिरिक्त उत्साह और व्यावहारिकताओं पर ध्यान दिया जाए, तो बहुत सारी चीजों को रोका जा सकता है। आस्था एक व्यक्तिगत विषय है, लेकिन जब यह सार्वजनिक रूप लेता है, तो इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना, जितना प्रशासन का दायित्व है, उतना ही समाज के अंग के तौर पर हमारा भी। यह समझने की बात है कि भक्ति का अर्थ केवल श्रद्धा प्रकट करना नहीं, बल्कि दूसरों की सुरक्षा व जीवन के प्रति संवदेनशील होना भी है।
सैलाब को उसकी सीमाओं के साथ भी देखना चाहिए। श्रद्धा व अनुशासन का संगम होना ही चाहिए। करोड़ों लोगों का प्रबंधन एक दुष्कर कार्य है और यह संतोष की बात है कि समय रहते इस पर नियंत्रण भी पा लिया गया, फिर भी इससे सबक जरूर लेना चाहिए, ताकि ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।