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आस्था का कुंभ: शाश्वत परंपराओं का संगम, जहां ज्ञान-विज्ञान के जरिए करनी है अमृत की खोज

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सार
कुंभ केवल मेला नहीं, बल्कि मानव कल्याण के लिए धर्म का उदात्त प्रयोग है, जिसमें ज्ञान-विज्ञान के माध्यम से अमृत की खोज करनी है। यह अमृत मानव को देवता बना सकता है। इसी अमृत की लालसा लिए असंख्य श्रद्धालु कुंभ में तीर्थस्नान कर स्वात्म-धन्यता का बोध करते हैं।
 
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Mahakumbh: confluence of eternal traditions, where nectar has to be discovered through knowledge and science
महाकुंभ 2025। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वैदिक सनातन धर्म के सर्वाधिक प्रतिष्ठित कुंभ पर्व का आरंभ प्रयाग में हो रहा है। जिस प्रकार सनातन धर्म के आरंभ को कोई नहीं जानता, वैसे ही कुंभ के उद्गम और उसके विकास को भी कोई नहीं जानता। यह एक पारंपरिक धार्मिक व सांस्कृतिक प्रक्रिया है, जो निश्चित कालावधि में संपन्न होती है। कुछ विद्वान इसकी उत्पत्ति वेदों से मानते हैं। धर्मशास्त्रकारों का कहना है कि यह सुर-असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से शुरू हुआ। वहीं, संत साहित्य के विद्वानों के अनुसार, शांकर संप्रदाय के संन्यासियों और रामानंद संप्रदाय के बैरागी साधुओं ने आध्यात्मिक ऊर्जा देकर इसके बृहत स्वरूप को विकसित किया। पर आम लोग इसे धार्मिक मेले से अधिक नहीं मानते। आचार्यों, साधु-संतों और विद्वानों को समझाना होगा कि कुंभ केवल मेला नहीं, बल्कि मानव कल्याण के लिए धर्म का उदात्त प्रयोग है, जिसमें ज्ञान-विज्ञान के माध्यम से अमृत की खोज करनी है।



यह अमृत समाज को अमरता दे सकता है। मानव को देवता बना सकता है। इसी अमृत की लालसा लिए असंख्य श्रद्धालु कुंभ में तीर्थस्नान कर स्वात्म-धन्यता का बोध करते हैं।


कुंभ शब्द पुराना है, जिसका अर्थ है कलश या घट। स्पष्ट है कि कुंभ का संबंध अमृत कलश से है, जिसे देवों व दानवों ने समुद्र को मथकर निकाला था। पुराणों में यही अमृत कलश लेकर भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे। इस कलश को पाने के लिए हुई छीना-झपटी में अमृत की कुछ बूंदें चार स्थानों पर छलक पड़ी थीं। उन स्थानों में से एक प्रयाग है। महाभारत में इसी अमृत कलश को कश्यपनंदन गरुड़ अपनी माता विनता को दासत्व से मुक्त करवाने के लिए स्वर्ग से लाए थे। तभी अमृत कुंभ से नि:सृत अमृत कण प्रयाग आदि स्थानों पर गिरे थे। यह अमृत गंगा और यमुना के उन जलकणों में है, जिन्हें पाने के लिए असंख्य लोग अपनी सुख-सुविधा छोड़कर संगम किनारे पहुंचते हैं। यह अलौकिक हो जाने का ऐसा शास्त्रीय भाव है, जिसमें आस्था और परंपरा के साथ जातिमुक्त सामाजिक संगम होता है।

कुंभ के आयोजन की पुण्यभूमि प्रयाग की महिमा अकथनीय है। गंगा-यमुना के संगम का पुरातनतम निर्देश ऋग्वेद (10/75) में है - सितासिते सरिते यत्र संगते पत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति। ये वै विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं भजन्ते।। - जो लोग श्वेत यानी गंगा और कृष्ण यानी यमुना, इन दो नदियों के मिलन-स्थल संगम पर स्नान करते हैं, वे अमृत (मोक्ष) प्राप्त कर लेते हैं। जगत्कर्ता ब्रह्मा ने यहां यज्ञ किया था, इसी से यह क्षेत्र 'प्रयाग' कहलाया। संगम का पुरातन वर्णन वाल्मीकि-रामायण में है। भगवान श्रीराम ने माता सीता और अनुज लक्ष्मण को प्रयाग की महिमा बताई थी। पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा प्रशंसित होने पर पुण्यभूमि प्रयाग को 'तीर्थराज' की उपाधि मिली। प्रयाग में गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदियों के मिलन से यह 'त्रिवेणी' हो गया। ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर प्रयाग में सदा विराजते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में लिखा है - को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ, यानी प्रयाग का प्रभाव (महत्ता) कौन कह सकता है!

कुंभ ज्ञान और उपासना का केंद्र है। इसमें केवल अगाध जलराशि का ही संगम नहीं होता, बल्कि बहुविध विचारों का संगम भी होता है। इसमें ज्ञान, वैराग्य व भक्ति के वाहक साधु-संतों की अद्भुत त्रिवेणी सृजित होती है। शैवों और वैष्णवों के साथ ही विभिन्न सगुणी और निर्गुणी संतों द्वारा किए जाने वाले स्नान और अनुष्ठान लोगों को सहज ही सम्मोहित और प्रभावित करते हैं।

भारत रत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे ने धर्मशास्त्र के इतिहास में लिखा है कि हिंदू समाज बहुत-सी जातियों में विभक्त होने से जाति-संकीर्णता में फंसा रहा है, पर तीर्थयात्राओं ने सभी को पवित्र नदियों व स्थलों में एक स्थान पर साथ-साथ बैठा दिया है। तीर्थों से संबंधित परंपराओं, तीर्थयात्रियों की संयमशीलता, पवित्र व दार्शनिक लोगों के समागम व तीर्थों के वातावरण ने तीर्थयात्रियों को उच्च आध्यात्मिक स्तर पर अवस्थित किया है। इससे उनके मन में ऐसी श्रद्धा-भक्ति की भावना भर उठती थी, जो तीर्थयात्रा से लौटने के उपरांत भी दीर्घकाल तक उन्हें अनुप्राणित किए रहती थी।

प्रयाग में तीन नदियों का प्राकृतिक संयोग है, जिससे इसे तीर्थों के राजा होने का शास्त्रीय गौरव प्राप्त है। ऋग्वेद (5/53/9) में जिन 20 नदियों के नाम हैं, उनमें सरस्वती, सरयू और सिंधु को माता के रूप में उल्लिखित किया गया है। ऋग्वेद काल में सरस्वती विशाल जलपूर्ण नदी थी और यह यमुना एवं शुतुद्रि के बीच बहती थी, पर ब्राह्मण-ग्रंथों के काल में ही यह रेतीले स्थलों में अंतर्हित हो गई थी। प्रयाग में यह आज भी अंतर्हित है।

भारत की धार्मिक और सामाजिक एकता में तीर्थ स्थानों ने अति महत्वपूर्ण योगदान किया है। रवींद्रनाथ ठाकुर ने 'साधना' में लिखा था - 'भारतवर्ष ने तीर्थयात्रा के स्थलों को वहां चुना, जहां प्रकृति में कुछ विशिष्ट रमणीयता और सुंदरता थी, जिससे व्यक्ति का मन संकीर्ण आवश्यकताओं से ऊपर उठकर अनंत ईश्वर में अपनी स्थिति का परिज्ञान कर सके।' भारतीयों का विश्वास रहा है कि तीर्थों में जाकर पवित्र नदियों में स्नान करने से मनुष्य के पाप कटते हैं। महाभारत और कूर्मपुराण ने माघ मास में गंगा-यमुना के संगम में स्नान की महत्ता का बखान किया है। नारायण भट्ट के त्रिस्थलीसेतु के अनुसार, प्रयाग में स्नान के विशिष्ट दिवस मकर-संक्रांति, रथसप्तमी और माघी अमावस्या हैं। कुंभ पर्व में इनके साथ पौष पूर्णिमा, वसंत पंचमी, माघी पूर्णिमा और महाशिवरात्रि भी जुड़ गए हैं।

काशी के महामहोपाध्याय पंडित हरप्रसाद शास्त्री ने 1939 ईस्वी में प्रकाशित कवींद्रचंद्रोदय में शाहजहां द्वारा दी गई प्रयाग की यात्रा के लिए कर की छूट का उल्लेख किया है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-'अबोध भारतीय, दरिद्र भारतीय, ब्राह्मण या किसी भी जाति का भारतीय, सभी आपस में भाई हैं।' कुंभ पर्व सबसे मिलकर बनता है। यह सभी का है। यह सर्वे भवन्तु सुखिन: का सनातन प्रयोग है, जो लोगों को बुलाकर अमृत बांटता है और उन्हें अमरता देता है। वास्तव में कुंभ पर्व आने-जाने वाला कालमात्र नहीं है, बल्कि यह तो हमारे जीवन और साहित्य में पूरी तरह से रचा-बसा है।

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