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महाकुंभ : समाज अपने अनुभवों में जीता है ...यही हैं उसके 'तर्क' और 'विज्ञान'

Wed, 05 Mar 2025 07:35 AM IST
sudheesh pachauri सुधीश पचौरी
Updated Wed, 05 Mar 2025 07:35 AM IST
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सार
महाकुंभ बताता है कि आप कितने ही ‘तर्कवादी’ व ‘वैज्ञानिक’ हो जाइए, लेकिन जो समाज अपने अनुभवों में जीता है, उसके लिए उसके ‘अनुभव’ और ‘भावनाएं’ ही ‘तर्क’ और ‘विज्ञान’ होते हैं। लेकिन महाकुंभ के कथित ‘तर्कवादी’ हिंदी की भक्तिकालीन सांस्कृतिक कविता को जरा भी नहीं समझे।
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Maha Kumbh tells no matter how rational and scientific you may be, but society which lives by its experiences
महाकुंभ में श्रद्धालु - फोटो : पीटीआई

विस्तार

आज के मीडियामय समय में माना जाता है कि ‘जहां भीड़ तहां एक्शन’ और ‘जहां एक्शन वहां मीडिया’...। इस तर्क से हर मीडिया ‘मेला पसंद’ होता है, ‘उत्सव’ या ‘कार्निवाल पसंद’ होता है और ऐसा हर मेला या कार्निवाल अपने साथ अपनी ‘जीवनशैली’ भी लेकर आता है। इस तरह वह जनता के ‘सामूहिक मनोविज्ञान’ की अभिव्यक्ति होता है। वह उसकी ताकत का प्रदर्शन भी होता है, जो आज के ‘मल्टीमीडिया’ में ‘24 गुना 7’ के हिसाब से उतना ही ‘विराट’ व ‘विहंगम प्रदर्शन’ या ‘शो’ बन जाता है। मीडिया में दिखती 144 बरस बाद आए ‘महाकुंभ’ की भीड़ ‘दोहरा’ अनुभव कराती है। वह एक ही साथ ‘डराती’ है और ‘रिझाती’ है। हम उसको लहराता देख डरते हैं कि कहीं कुछ अनहोनी न हो जाए, लेकिन खुश भी होते हैं, क्योंकि ऐसी भीड़ हमें ‘अभय’ और ‘एकजुटता’ का अनुभव कराती है।



पैंतालीस दिन लंबे महाकुंभ में हर रोज एक से डेढ़-दो करोड़ की संख्या में आती, संगम में सहज अनुशासित भाव से ‘आस्था की डुबकी’ लगाती और उतनी ही शांति से वापस जाती भीड़ ने अपने सद् व्यहार से दुनिया के मीडिया को आकर्षित और अभिभूत किया है। ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ ने भी कई नए और ‘अटूट’ रिकॉर्ड दर्ज किए हैं। महाकुंभ का ऐसा कुशल व सफल प्रबंधन बहुत से ‘मैनेजमेंट संस्थानों’ के लिए स्वतंत्र अध्ययन का विषय हो सकता है। मीलों लंबे जाम में कंधे पर अपने सामान का बोझ उठाकर, दस-बीस किलोमीटर पैदल चलते अनंत जनों का संगम में ‘आस्था की डुबकी’ लगाना, पुण्य कमाना और हजार तरह की परेशानियों को सह कर भी शिकायत न करना और एक नए पवित्रमय भाव से वापस चले जाना -ऐसी उदारता, सहजता, सहनशीलता, विनम्रता और शालीनता गहरा आदर भाव पैदा करती है।


फिर भी कुछ ‘विवादी तत्व’ महाकुंभ को भी विवाद में ले आते हैं। लगता है कि ऐसे लोग ‘महाकुंभ’ के पौराणिक व परंपरागत अर्थ और माहात्म्य को नहीं जानते या जानकर भी नहीं मानते। ऐसे लोग महाकुंभ जैसे सांस्कृतिक-धार्मिक आयोजन को भी सत्तात्मक राजनीति से जोड़कर देखते हैं और इन आती भीड़ों को ‘हिंदुत्ववादी भाव’ की भीड़ मानते हैं और कई इसे यूपी में कुछ समय बाद होने वाले चुनावों से जोड़कर देखते हैं। इनके बरक्स अधिसंख्य जन, जो महाकुंभ को अपनी ‘सनातन संस्कृति’ का हिस्सा मानते हैं, वे इसे देश की ‘स्वभावगत एकता की भावना’ का प्रतीक मानते हैं। इतने बड़े समाज को शांति से एक-दूसरे के साथ आता-जाता देख, एक-दूसरे की मदद करता देख और कष्ट पाकर भी शिकायत न करता देख, लगता है कि जब लोग अपने धार्मिक अनुभव में जीते हैं, तब वे बेहद ‘सहनशील’ और ‘अनुशासित’ होते हैं। वीवीआईपीज, विविध अखाड़ों के साधुओं और संतों के ‘विशेष स्नानों’ की चर्चा छोड़ दें और सिर्फ आम हिंदू समाज की चर्चा करें, तो कहना होगा कि महाकुंभ में रोज आती, डुबकी लगाती और जाती इस ‘विराट भीड़’ का दैनिक आचरण आपसी मित्रता व सहयोग का अतुलनीय उदाहरण है!

सोचा गया था कि 144 बरस बाद आए इस महाकुंभ के पैंतालीस दिन में लगभग पैंतालीस करोड़ लोग आएंगे, लेकिन आए छियासठ करोड़ से भी अधिक...इतनी लंबी अवधि के दौरान अचानक हुई एक-दो दुर्घटनाओं ने आयोजकों को अवश्य दुखी किया और मीडिया में क्षणिक राजनीति भी हुई, लेकिन ऐसी घटनाओं से हतोत्साहित न होकर श्रद्धालु और बड़ी संख्याओं में आते रहे तथा ‘आस्था की डुबकी’ लगाकर लौटते रहे। विपक्ष के कई नेताओं ने ऐसे ‘श्रद्धालुओं’ को यह कहकर हतोत्साहित भी करने की कोशिश की कि गंगा और संगम का पानी ‘प्रदूषित’ और ‘हानिकारक’ है, लेकिन आम श्रद्धालुओं ने उनकी एक न सुनी। ऐसे ‘आधे अधूरे तर्कवादी’ व ‘कथित सेक्यूलरवादी’ लगता है, आम ‘हिंदुओं’ की ‘सांस्कृतिक बनावट और बुनावट’ को नहीं जानते। अगर जानते होते, तो संत रविदास जी की उस प्रसिद्ध उक्ति के असली मर्म को भी समझ लेते और ‘गंगा का पानी नहाने योग्य नहीं’ प्रचारित कर, लोगों को ‘महाकुंभ’ में आने से रोकने की कोशिश न करते। संत रविदास जी की उक्ति है कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ यानी ‘अगर आपका मन मानता है, तो उस कठौती का पानी भी गंगाजल है, जिसमें चमड़ा भिगोया जाता है...वह भी उतना ही पवित्र है, जितना कि गंगाजल...। इसका मतलब यह है कि ‘पवित्रता’ या ‘अपवित्रता’ सब ‘मन के माने भाव’ हैं। ये किसी लेबोरेटरी में नहीं बनते-बिकते।

‘पवित्रता’ या ‘अपवित्रता’ आध्यात्मिक विचार हैं। अगर महाकुंभ के कथित ‘तर्कवादी’ हिंदी की भक्तिकालीन सांस्कृतिक कविता को जरा भी समझते, तो उनको ‘आम हिंदू’ की ‘मनोवृत्ति’ समझ में आ जाती। अगर वे सूरदास के पद की ये चार-पांच पंक्तियां पढ़ लेते, तो गंगा के ‘पवित्र भाव’ के बारे में अच्छी तरह समझ जाते। ये कहती हैं-एक लोहा पूजा में राखत, एक घर बधिक परो/यह दुविधा पारस नहिं, जानत कंचन करत खरो/ एक नदिया एक नारि कहावत दोनों ही मैल भरो/दोउ मिलि सब एक बरन भए सुरसरि नाम परो/एक जीव एक ब्रह्म कहावत सूर स्याम झगरो।

महाकुंभ बताता है कि आप कितने ही ‘तर्कवादी’ व ‘वैज्ञानिक’ हो जाइए, लेकिन जो समाज अपने अनुभवों में जीता है, उसके लिए उनके ‘अनुभव’ और ‘भावनाएं’ ही ‘तर्क’ और ‘विज्ञान’ होते हैं। यही उनका ‘सांस्कृतिक व्यवहार’ होता है और यही उनका ‘सांस्कृतिक तर्क’ होता है। जो हिंदुओं की इस ‘भक्ति भावना’ की ‘सनातनता’ को नहीं जानते, जो ‘जीव और ब्रह्म’ के संबंध को नहीं जानते, जो ‘द्वैताद्वैत’ के जटिल संबंध को नहीं जानते, उनके लिए ‘गंगा’ और ‘संगम’ भी एक ‘वाटर बॉडी’ मात्र है, जिनको उन्हीं की ‘आधुनिक औद्योगिक शहरी संस्कृति’ ने ‘दूषित’ किया है और अब कह रहे हैं कि इस नदी का पानी गंदा है, इसमें नहाना मना है...। इसीलिए बहुत से ‘हिंदू’ आरोप लगाते हैं कि ऐसे लोग हिंदू संस्कृति के दुश्मन हैं। क्या पता कि ऐसे ही ‘निंदकों’ के ‘प्रतिकार’ में इस महाकुंभ में इतने रिकॉर्ड तोड़ श्रद्धालु आए, ताकि दुनिया जान ले कि ‘समस्त हिंदू समाज एक है’। यही नहीं, महाकुंभ ने एक ‘नया हिंदू विमर्श’ भी पैदा किया है कि हे पश्चिमी आधुनिकता! जिसे तूने दूषित किया, वह अब भी हमारे लिए ‘पवित्र’ है, क्योंकि यही अपनी ‘सुरसरि’ है, जो बहते-बहते हर एक को पवित्र करती रहती है और विज्ञान भी तो यही कहता है कि बहता हुआ जल अपने आप को पवित्र करता रहता है। 

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