सिनेमा का जादू

मनोज लिमये Updated Mon, 03 Feb 2014 05:26 PM IST
magic of cinema
वर्तमान समय में फिल्मी सितारे 40-50 करोड़ रुपये मेहनताना ले रहे हैं और फिल्म निर्माता भी 200-300 करोड़ रुपयों का कारोबार करने का दावा कर रहे हैं। आधुनिकीकरण के इस दौर में सिनेमा और इससे जुड़े लोगों ने भले ही उत्तरोत्तर प्रगति की हो, परंतु दर्शक होने के नाते मुझे इस बात का इल्म है कि जो रस पूर्व में सिनेमा देखने में आता था, वह अब लगभग समाप्त हो चुका है।

गर्मी की छुट्टियों में कस्बाई संस्कृति में यदि किसी बात का जादू सिर चढ़कर बोलता था, तो वह सिर्फ और सिर्फ सिनेमा था। सिनेमा की रील वाली पेटी जब एल्यूमिनियम के बंद बक्से में सुबह की पहली बस से शहर से आती थी, तभी से कस्बे में उत्सवी किलकारियां गूंजने लगती थीं। हम जिस कस्बे में रहते थे, वहां दो सिनेमागृह थे, जो मंदिर की तरह पूज्य थे। समीप के गांवों से लोग ट्रेक्टर भर-भरकर सिनेमाई रसास्वादन के लिए उमड़ते थे तथा 12 बजे के शो में टिकट न मिल पाने का मलाल न करते हुए अंतिम शो तक टिकट पाने के लिए प्रयासरत रहते थे।

सिनेमा की पेटी के नगर प्रवेश के पश्चात शाम के समय तांगे में लाउडस्पीकरों से यह मुनादी की जाती थी कि फलां सिनेमा लगने वाला है। यकीन जानिए, जब गुलाबी-नीले पर्चे उड़ाता हुआ वह तांगा हमारी गली से गुजरता था, तो माहौल में नशा-सा छा जाता था। सिनेमा लगने की सूचना के साथ-साथ जब सिनेमा की विषयवस्तु के बारे में अल्प जानकारी दी जाती थी, वह देववाणी से कम नजर नहीं आती थी। हमारे बाल्यकाल में यदि सोमवार को यह कह दिया जाता था कि यदि उधम नहीं की, तो अगले रविवार को सिनेमा दिखाने ले चलेंगे, तो आप समझिए कि मंगलवार से शनिवार तक अनुशासन इसी आश्वासन की पीठ पर सवार रहता था।

लेकिन आज स्थितियां अलहदा हैं। तकनीकी रूप से कहानियों तथा विषयवस्तु के चयन में, दृश्यांकन के मामले में, ध्वनि गुणवत्ता के मामले में भले ही अब भारतीय सिनेमा ने बहुत प्रगति कर ली हो, परंतु सिनेमा को जो प्यार उस दौर में मिलता था, वह आज नहीं है। सिनेमाई करिश्मा आज सितारों के प्रचार-प्रसार के बावजूद जनता को प्रभावित नहीं कर रहा, जबकि उस वक्त सामान्य-सा व्यक्ति, दो लाउडस्पीकर और एक टक-टक तांगा पूरे कस्बे में सिनेमाई जादू बिखेर देता था। उस दौर का सिनेमा जादू था, और आज सिनेमा है, पर वह जादू नहीं है।

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