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आसान नहीं होगी लूला की राह: ब्राजील में धुर दक्षिणपंथ को झटका, राष्ट्रपति के सामने बड़ी चुनौती

Wed, 28 Oct 2026 06:42 AM IST
नितिन गौतम गिल्हर्मे कासारोएस, प्रोफेसर, फ्लोरिडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी
गिल्हर्मे कासारोएस, प्रोफेसर, फ्लोरिडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी Published by: नितिन गौतम Updated Wed, 28 Oct 2026 06:42 AM IST
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सार
लूला दा सिल्वा ने 80 वर्ष की उम्र में ब्राजील के राष्ट्रपति के रूप में अपना चौथा कार्यकाल हासिल कर लिया है। पर, वर्तमान चुनौतियों के मद्देनजर देखने वाली बात होगी कि वह और उनकी पार्टी इस अस्थायी राहत का इस्तेमाल देश की राजनीति को नया स्वरूप देने के लिए किस तरह करेगी।
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Lula path will not be easy Shock to the far right in Brazil big challenge
ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा - फोटो : ANI

विस्तार

तीन हफ्ते पहले तक ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा के राजनीतिक भविष्य पर विराम लग चुका था। उनके राजनीतिक जीवन के अंत की घोषणाएं की जा चुकी थीं। राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार दक्षिणपंथी फ्लेवियो बोल्सोनारो, जो जेल में बंद पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे हैं, पहले दौर के चुनाव में ऐसी बढ़त हासिल कर चुके थे, जिसे पाट पाना लगभग असंभव माना जा रहा था। 80 वर्ष की उम्र में लूला ब्राजील की राजनीति के केंद्र में चार दशक बिताने के बाद चुपचाप विदाई लेने की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे थे। लेकिन, रविवार को लूला ने सभी को गलत साबित कर दिया।


उन्होंने दूसरे दौर का चुनाव जीतकर ब्राजील के राष्ट्रपति के रूप में अपना चौथा कार्यकाल हासिल कर लिया। यह ऐतिहासिक इसलिए है, क्योंकि ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव में अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ था कि कोई उम्मीदवार पहले दौर में जीत हासिल करने के बाद दूसरे दौर में हार गया हो। लूला ने तीन सप्ताह के भीतर पहले दौर में लगभग 22 लाख मतों से मिली हार को निर्णायक जीत में बदलकर इस परंपरा को तोड़ दिया। यही नहीं, अपना नया कार्यकाल समाप्त होने तक लूला कुल 16 वर्ष (गैर-लगातार) देश का शासन संभाल चुके होंगे। यह ब्राजील के इतिहास में लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित किसी भी नेता का सबसे लंबा कार्यकाल होगा।


लूला की जीत का महत्व ब्राजील की सीमाओं से कहीं आगे तक जाता है। इसके भी कुछ प्रमुख पहलू हैं। वैश्विक स्तर पर ब्राजील अब भी धुर दक्षिणपंथ के उभार के खिलाफ एक मजबूत अवरोध बना हुआ है। लैटिन अमेरिका और यूरोप में हाल के चुनावों के दौरान लगभग हर जगह धुर दक्षिणपंथी दलों और नेताओं ने प्रगति की है। लेकिन, दुनिया के चौथे सबसे बड़े लोकतंत्र ब्राजील ने इस प्रवृत्ति को उलट दिया है। ब्राजील की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में थी, लेकिन आर्थिक प्रगति सीमित थी और उसका लाभ सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंचा था। तमाम संकेत लूला की हार की ओर इशारा कर रहे थे, फिर भी उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों को मात दे दी।

उनकी जीत उस नीति पर भी अंकुश लगाती है, जिसे आलोचक ‘डोनरो सिद्धांत’ कहते हैं। इसका आशय ट्रंप प्रशासन की उस कोशिश से है, जिसके तहत शुल्क, धमकियों और राजनीतिक संरक्षण के जरिये पश्चिमी गोलार्ध को अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र में अधिक मजबूती से लाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, लूला को अपनी राजनीतिक वापसी को अपनी नीतियों की पूर्ण स्वीकृति नहीं समझना चाहिए। यह सही है कि उन्होंने अपनी रणनीति में सुधार किया। तीन सप्ताह के भीतर उन्होंने सत्ता में अपने चार वर्षों के दौरान की गई गलतियों को स्वीकार किया, विशेष रूप से पहले दौर के कमजोर चुनाव अभियान के दौरान हुई चूकों को। उन्होंने अपना संदेश अधिक स्पष्ट किया, गठबंधन का दायरा बढ़ाया और उन मतदाताओं से सीधे संवाद किया, जिनका समर्थन वह खो चुके थे। लेकिन, अब उन्हें ऐसे देश का शासन चलाना है, जो पहले से कहीं अधिक ध्रुवीकृत हो चुका है। सड़कों पर राजनीतिक हिंसा बढ़ी है और इंटरनेट पर घृणास्पद भाषणों का प्रसार बेरोकटोक हो रहा है। धुर दक्षिणपंथ की प्रमुख हस्तियों, जिनमें निकोलस फरेरा और लुकास पावानातो शामिल हैं, ने पहले ही कह दिया है कि वे चुनाव परिणाम स्वीकार नहीं करेंगे। रविवार देर रात बोल्सोनारो ने भी कहा कि वह हार नहीं मानेंगे और मतदान को रद्द कराने की कोशिश करेंगे।

इसके बाद अमेरिका का सवाल है। व्हाइट हाउस के बोल्सोनारो परिवार के साथ घनिष्ठ संबंधों को देखते हुए इस बात का वास्तविक खतरा है कि ट्रंप प्रशासन चुनाव परिणाम पर सवाल उठाए या उसे मान्यता देने से ही इन्कार कर दे।
जब लूला पांच जनवरी को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे, तो तीन सवाल उनके चौथे कार्यकाल की दिशा तय करेंगे। पहला सवाल यह है कि वह गहरे विभाजन से जूझ रहे देश का शासन कैसे चलाएंगे, जहां संसद में रूढ़िवादी दलों का बहुमत है और एक दर्जन से अधिक राज्यों में दक्षिणपंथी गवर्नर हैं। पिछले चार वर्षों के दौरान जिस विधायिका ने लूला को अपने दबाव में रखा, वह अब उनके प्रति और अधिक शत्रुतापूर्ण हो गई है। प्रत्येक बजट, हर सुधार और प्रत्येक नियुक्ति के लिए कठिन बातचीत करनी होगी। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान लूला पर महाभियोग का खतरा भी मंडराता रहेगा।

दूसरा सवाल देश की व्यवस्था को दुरुस्त करने का है। वह उन समस्याओं से कैसे निपटेंगे, जो दलीय विवादों से कहीं अधिक व्यापक हैं? इनमें सरकारी खर्च बढ़ने से पैदा हो रहा राजकोषीय दबाव, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे में लगातार गिरावट और ऐसी संस्थागत व्यवस्था शामिल है, जो अब अपनी निर्धारित भूमिका के अनुरूप काम नहीं कर रही है।

तीसरा सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। क्या लूला, उनकी वर्कर्स पार्टी (पीटी) और ब्राजील की व्यापक लोकतांत्रिक शक्तियां इस अस्थायी राहत का इस्तेमाल देश की राजनीति को नया स्वरूप देने के लिए करेंगी? इसका अर्थ होगा-ऐसे नए राजनीतिक नेतृत्व के विकल्प तैयार करना, जो उन बुजुर्ग होते नेताओं से आगे हों, जिन्होंने पिछले 40 वर्षों से वामपंथी राजनीति पर अपना प्रभुत्व बनाए रखा है। जनभागीदारी के ऐसे नए तरीके विकसित करना, जो किसी एक करिश्माई नेता पर निर्भर न हों। ऐसा नया राजनीतिक विमर्श तैयार करना, जो अस्थिर रोजगार वाले श्रमिकों, धार्मिक परिवारों और उन नाराज मतदाताओं तक पहुंचे, जो धीरे-धीरे धुर दक्षिणपंथ की ओर आकर्षित हुए हैं। राजनीतिक ध्रुवीकरण का यही एक वास्तविक विकल्प है। यह बदलाव न तो किसी एक चुनाव से आएगा और न ही किसी एक नेता के प्रयास से।

लूला दा सिल्वा की राजनीतिक वापसी ने ब्राजील को समय दिया है। लेकिन, क्या यह समय देश को कुछ और भी दे पाएगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि लूला और उनके सहयोगी अगले चार वर्षों में क्या करते हैं और किस तरह एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं। लूला ने एक बार फिर चमत्कार कर दिखाया है। अब उनकी अंतिम चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि ब्राजील को भविष्य में किसी और चमत्कार की जरूरत न पड़े।
 
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