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कहीं देखा है ऐसा राष्ट्र प्रेम
Updated Fri, 19 Apr 2013 09:05 PM IST
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हमारे देश भारत को धर्मभूमि माना जाता है। यह ऐसी भूमि है, जहां राम और कृष्ण जैसे भगवान अवतरित हुए और मानव-कल्याण के कार्यों को आगे बढ़ाया। इस भारत भूमि से विदेशी भी खूब प्यार करते रहे हैं।
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इसी से जुड़ा एक प्रसंग प्रसिद्ध भाषावेत्ता आचार्य रघुवीर का है। एक बार वह इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्ण के आमंत्रण पर 1951 में जकार्ता गए। वहां के राष्ट्रपति भवन में आचार्य जी के सम्मान में महाभारत का मंचन किया गया।
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राष्ट्रपति सुकर्ण ने आचार्य जी से कहा, हम मजहब से भले ही मुसलमान हैं, किंतु रामायण-महाभारत के पात्र हमारे देश की जनता के प्रेरणास्रोत रहे हैं।
मेरे पिता दानवीर कर्ण के चरित्र से प्रभावित थे। इसलिए उन्होंने मेरा नाम कर्ण रखा। बाद में उसमें 'सु' अर्थात अच्छा जोड़ दिया तथा मैं सुकर्ण हो गया। आचार्य रघुवीर एक मुस्लिम राष्ट्रपति की महाभारत तथा रामायण के पात्रों के प्रति अगाध श्रद्धा-भावना देखकर अभिभूत हो उठे।
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इंडोनेशिया के विभिन्न स्थानों पर स्थित शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु के मंदिरों की जानकारी देते हुए राष्ट्रपति सुकर्ण ने बताया, बाली, सुमात्रा आदि की यात्रा करते समय आपको लगेगा कि आप भारत में ही भ्रमण कर रहे हैं।
आचार्य रघुवीर ने वहां की मिट्टी को सिर से लगाया तथा बोले, वास्तव में मैं आपके देश में अपने महान भारत देश के ही दर्शन कर कृतकृत्य हो उठा हूं।