नई जमीनें खोजता प्रेम
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अक्सर कहा जाता है कि आधे मन से किया गया गया कोई प्रयास कभी वह प्रभाव नहीं छोड़ता, जो पूरे मन से किया गया काम छोड़ता है। इधर जब आईआईटी, बॉम्बे से बीटेक पास राजस्थान के कनिष्क कटारिया ने सिविल सेवा परीक्षा-2018 में शीर्ष स्थान हासिल किया, तो एक सवाल के जवाब में उन्होंने इस सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, बहन और प्रेमिका की मदद व नैतिक समर्थन को दिया। अपने माता-पिता और स्वजनों का स्मरण तो हर कोई ऐसे मौके पर करता है, पर खास तौर से प्रेयसी (गर्लफ्रेंड) को इसका श्रेय देने का दुस्साहस और आगे बढ़कर मौका पड़े, तो उससे शादी करने का प्रयास विरले ही कर पाते हैं। लेकिन कनिष्क ने पूरे मन से दोनों काम किए, करियर में आगे बढ़ने की पहल और प्रेम व उसका उद्घोष। इसीलिए जब उन्होंने प्रेमिका को अपनी सफलता का श्रेय देने का प्रयास किया, तो इससे जहां कुछ सवाल पैदा हुए वहीं कुछ उम्मीदें भी उस प्रेम को लेकर जगीं, जिसकी जमीनें इधर दहेज जैसे बंधनों ने बंजर कर दी हैं और करियर में सहयोगी से प्रेम को मीटू जैसे अभियानों की बदौलत आशंकाओं की अमरबेल खाने लगी है।
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अगर यह कहें कि मजहब तक की दीवारें तोड़ करियर में सहयोगी के प्रेम को स्वीकारने और उसे निबाहने की इधर एक परंपरा कम से कम यूपीएससी की जमीन पर पैदा कुछ अंकुरों ने शुरू की है, तो शायद गलत नहीं होगी। एक किस्सा साल 2015 के यूपीएससी टॉपर टीना डाबी और दूसरे नंबर आए अतहर का है, जिन्होंने तीन साल चले प्रेम के बाद पिछले बरस पहलगाम में शादी रचाई थी।
वह दौर अपने देश में ज्यादा नहीं चला, जब कहा जाता था कि लड़कियों की अच्छी पढ़ाई-लिखाई और अच्छे करियर का मतलब यह है कि मां-बाप उनकी शादी को लेकर निश्चिंत हो सकते थे। कहा जाता था कि आईटी, बैंकिंग और प्रबंधन में अच्छी नौकरियां पाने वाली लड़कियों के विवाह में कोई दिक्कत नहीं आएगी और उन्हें दहेज जैसी समस्या का भी सामना नहीं करना पड़ेगा। माना गया कि पढ़ी-लिखी और अच्छे करियर में जाने वाली लड़कियों को या तो सहयोगियों के बीच से ही कोई योग्य जीवनसाथी मिल जाएगा या फिर जाति-समाज के बंधनों के बीच किए गए रिश्तों में उनकी शादी दहेज आदि झंझटों से मुक्त हो जाएगी। पर उम्मीदें जगाती इन धारणाओं के उस वक्त पुर्जे-पुर्जे हो गए, जब दहेज नई शक्लों में लौट आया। जैसे, सीधे-सीधे कैश या कार और महंगे तोहफों की मांग करने के बजाय लड़की के परिजनों से कहा जाने लगा कि शादी अगर किसी फाइव स्टार होटल में हो और डेस्टिनेशन वेडिंग जैसी भव्य साज-सज्जा वाली हो, तो बेहतर होगा। कुछ वर्ष पहले शादी कराने वाली एक मेट्रीमोनियल वेबसाइट (शादीडॉटकॉम) ने देश के 18 राज्यों में 30 हजार युवाओं में एक सर्वे कराया था, जिसमें दो-तिहाई (74 फीसदी) ने कहा था कि गर्लफ्रेंड-ब्वॉयफ्रेंड के इस जमाने में भी वे शादी अपने मां-बाप की मर्जी से यानी अरेंज्ड मैरिज करेंगे।
अरेंज्ड मैरिज क्यों? इस सवाल की तह में जाने से पता चला कि इसमें दान-दहेज की गुंजाइश बनती है। यह एक विडंबना ही है कि आज का जो युवा अपनी पढ़ाई-नौकरी से लेकर अपनी लाइफ स्टाइल तक में मां-बाप और समाज का दखल नहीं चाहता, वह शादी का मामला उठते ही अचानक रूढ़िवादी होने लगता है।
बेशक, ऐसी सारी मुश्किलों के बीच टीना डाबी के बाद कनिष्क कटारिया जैसे पढ़े-लिखे और कामयाबी का शीर्ष छूने वाले युवाओं ने जो नजीरें पेश की हैं, उन्हें देखते हुए यह आस जगती है कि सहपाठियों-सहकर्मियों के बीच इधर लगभग मर चुके प्रेम को नए प्राण मिलेंगे और ये अंकुर पल-बढ़कर तमाम आशंकाएं खारिज करते हुए खास तौर से लड़कियों की मुश्किल होती जिंदगी को नई उम्मीदें बंधाएंगे।