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खत्म होता खिलौनों का अद्भुत संसार

Wed, 01 Nov 2017 05:53 PM IST
सुभाष कुशवाहा
सुभाष कुशवाहा Updated Wed, 01 Nov 2017 05:53 PM IST
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Losing Wonderful World of Toys
सुभाष कुशवाहा

हमारे शिशुओं और बच्चों का खिलौना संसार परंपरागत से हट कर आभासी हो चुका है। अब वे लकड़ी, मिट्टी, पत्थर या कपड़ों के खिलौनों से नहीं खेलते। अब बच्चे लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा गाना नहीं गाते। अब वे स्मार्टफोन पर अपनी उंगुलियां नचाते हैं। वीडियो गेम और आभासी खिलौनों से खेलते हुए अवसाद में डूबने को बाध्य होते हैं। ये ऐसे खिलौने हैं, जो उनका विकास करने के बजाय, विनाश करते हैं। आज ऐसे चीनी खिलौनों का एक बड़ा बाजार उनके सामने है, तो दूसरी ओर ‘ब्लू ह्वेल’ जैसा जानलेवा आभासी खेल बचपन को निगल रहा है।


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पहले खिलौनों का स्वदेशी कारोबार समृद्ध था। गांव के हाट या मेलों में खिलौने की जिद करते बच्चे दिख जाते थे। एक तो मेलों का संसार सिमटता गया, दूसरा हमारी जीवन शैली ही एकाकी होती गई। पहले गुब्बारे, बांसुरी या सीटी बेचने वाले गांवों में आ जाते थे। गुब्बारे तो अब भी हैं, मगर अब खेलने के बजाय सजाने के काम आते है। हमारे यहां परंपरागत खिलौनों की ऐसी संस्कृति थी, जो श्रमशील समाज को रोजगार उपलब्ध कराती थी। वहीं बच्चों को ऐसे खिलौने उपलब्ध कराती थी, जो उन्हें उनके परिवेश से जोड़ते थे। सिंधु घाटी की सभ्यता में मिट्टी के पके खिलौनों में जानवरों की आकृतियां हैं, तो घर में प्रयोग होने वाले बर्तन हैं। कुछ झुनझुने और सीटियां हैं। ऋग्वेद में पुतलियों का जिक्र है, तो पटना, मथुरा, कौशांबी और राजघाट की खुदाई में मौर्य और गुप्तकालीन मिट्टी के खिलौने मिलें हैं, जो विभिन्न संग्रहालयों में देखे जा सकते हैं। शुंग काल में सांचे के खिलौने मिलते हैं। सांचे की बनी भेड़, मकर अत्यंत सुंदर हैं। कुल मिलाकर बच्चों के खिलौनों में बैल गाड़ियों के अलावा जानवरों की आकृतियां, बच्चों को प्रकृति और परिवेश से जोड़ती थीं। टेराकोटा के खिलौने सिंधु घाटी सभ्यता की देन हैं।

हमारे परंपरागत खिलौनों में मिट्टी के खिलौने कुम्हार, लकड़ी के खिलौने बढ़ई और लोहे के खिलौने लोहार बना देते थे। काष्ठ कला में कभी वाराणसी और अयोध्या आगे थे, तो राजस्थान की कठपुतलियों का जवाब न था। धातु के खिलौने बनाने में बस्तर आगे था। पुराने कपड़ों से खिलौने बनाने में हिमाचल और पंजाब आगे रहे। केरल में लकड़ी की नृत्य करती गुड़िया, आंध्र में नव विवाहित जोड़ों की मूर्तियां, बंगाल के देवी-देवता लकड़ी के बनाए जाते रहे। जापान ने हानिकारक प्लास्टिक के बजाय, कागज के खिलौने विकसित किए। कुल मिलाकर हम स्थान-स्थान की कलाएं, उनकी विशेषताएं, इन खिलौनों में देख-समझ सकते थे। बच्चे भी खिलौनों के प्रति रचनात्मक थे। कभी-कभी वे देहाती खिलौने स्वयं बना लेते थे।

ऐसे अद्भुत खिलौनों के संसार को कई देशों ने अपने संग्रहालयों में सजाया, दिखाया है। फिलीपींस की राजधानी मनीला के संग्रहालय में सात हजार किस्म के खिलौने देखे जा सकते हैं। दिल्ली में भी एक संग्रहालय है, जिसमें कई देशों के खिलौने हैं। भूटान के एक संग्रहालय में भी खिलौनों को स्थान मिला हुआ है।

देश विशेष की सांस्कृतिक और सामाजिक परंपरा से जोड़ने वाले देशी खिलौनों का बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास को बढ़ाने में अद्भुत योगदान रहा है। कुल मिलाकर परंपरागत खिलौनों को उजाड़ कर और ब्लू ह्वेल जैसे खेल को सौंप कर हम बच्चों का बचपना, उनकी संवेदना और समझ को अमानवीय बना रहे हैं। ऐसे समय में, जब स्थानीय कुटीर उद्योगों को तबाह कर, बाजार को अपनी गिरफ्त में रखने की कुसंस्कृति अपनाई जा रही हो, तब हमारे बच्चों का संसार कैसे बचेगा?

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