{"_id":"5f334cd05c9cb93f8461c1a0","slug":"lord-krishna-means-most-bliss","type":"story","status":"publish","title_hn":"कृष्ण का अर्थ है सर्वाधिक आनंद","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
कृष्ण का अर्थ है सर्वाधिक आनंद
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
श्रीकृष्ण
- फोटो : अमर उजाला
कृष्ण शब्द की ध्वनि पारलौकिक है। कृष्ण का अर्थ है सर्वाधिक आनंद। हर व्यक्ति आनंद चाहता है। पर हममें से कोई नहीं जानता कि इस आनंद को पूरी तरह कैसे प्राप्त किया जाए। जीवन की भौतिकवादी अवधारणा के साथ हम सुख प्राप्त करने की कोशिश में हर कदम पर हताश हैं, क्योंकि हमारे पास जीवन का वास्तविक आनंद प्राप्त करने के लिए जरूरी ज्ञान ही नहीं है। हम सब एक मित्र की खोज में हैं, जो हमें सच्ची शांति प्रदान करे। श्रीकृष्ण वह सच्ची शांति हैं।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
कृष्ण हमारे साथ हमेशा हो सकते हैं, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान हैं। इसीलिए वह अपने नाम से ही हमारे साथ हो सकते हैं। उनका नाम और वह अलग नहीं हैं। कृष्ण के सर्वशक्तिमान होने का अर्थ है कि उनसे संबंधित प्रत्येक वस्तु में समान शक्ति है। उदाहरण के लिए, अगर हम प्यासे हैं और पानी चाहते हैं, तो सिर्फ 'पानी-पानी' दोहराने से हमारी प्यास नहीं बुझेगी, क्योंकि पानी शब्द में पानी पीने के समान शक्ति नहीं है। हमें पदार्थ रूप में पानी की आवश्यकता है, तभी हमारी प्यास तृप्त होगी। पर पारलौकिक, निरपेक्ष दुनिया में, ऐसा कोई अंतर नहीं है। कृष्ण का नाम, कृष्ण का गुण, कृष्ण का वचन-सब कुछ कृष्ण है और वही संतुष्टि प्रदान करता है।
कई लोग तर्क देते हैं कि अर्जुन से कृष्ण इसलिए बात कर रहे थे, क्योंकि वह अर्जुन के समक्ष खड़े थे, जबकि हमारे सामने तो कृष्ण मौजूद नहीं हैं, फिर हम कृष्ण से निर्देश कैसे प्राप्त कर सकते है? लेकिन यह कोई तथ्य नहीं है। कृष्ण अपने शब्दों यानी भगवद्गीता के जरिये हमारे बीच उपस्थित हैं। जब हम भगवद्गीता या भागवत पर बोलते हैं, तो हम नियमित रूप से फूलों के साथ उनकी पूजा करते हैं।
दूसरे धर्मों में भी पूज्य ग्रंथों को इसी तरह फूलों से सजाया जाता है। यानी जब हम भगवद्गीता को ईश्वर कहते हैं, तो गलत नहीं कहते। सर्वव्यापी का मतलब है कि वह उनके नाम से, उनकी गुणवत्ता से, उनके अतीत से, उनके निर्देश से अलग नहीं है। इसीलिए भगवद्गीता की चर्चा भगवान कृष्ण की चर्चा की तरह ही है।
कृष्ण आपके हृदय में भी विराजमान हैं और मेरे हृदय में भी। ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति। ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्थित हैं। वह हमसे दूर नहीं हैं। वह इतने मिलनसार हैं कि हमारे हर जीवन चक्र में हमारे साथ हैं। वह तो इस प्रतीक्षा में हैं कि हम उनकी तरफ कब रुख करेंगे। वह इतने दयालु हैं कि भले ही हम उन्हें भूल जाएं, वह हमें कभी नहीं भूलते।
एक बेटा अपने पिता को भूल सकता है, लेकिन एक पिता अपने बेटे को कभी नहीं भूल सकता। इसी तरह, सब कुछ, सभी जीवित संस्थाओं के मूल पिता, ईश्वर हमें कभी नहीं भूलेंगे। हमारे शरीर अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इसका हमारी वास्तविक पहचान से कोई लेना-देना नहीं है। हमारी पहचान शुद्ध आत्मा है और यह शुद्ध आत्मा उस परमात्मा का अंश है। भगवान कृष्ण का कहना है कि दुनिया की सभी प्रजातियां वास्तव में उनके बेटे हैं। कृष्ण सबके पिता हैं और सब की रक्षा करते हैं।
चूंकि भगवद्गीता का संबंध कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान से है, ऐसे में, कुछ लोगों ने पूछा है कि हमें युद्ध के मैदान में क्या करना है? हमें किसी युद्ध के मैदान से कुछ लेना-देना नहीं है। हम तो आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में हैं। फिर हम इस युद्धक्षेत्र के बारे में क्यों सोचें? लेकिन चूंकि श्रीकृष्ण इस युद्धभूमि में उपस्थित हैं, इसीलिए पूरा युद्धक्षेत्र कृष्णमय हो गया है।
जिस प्रकार इलेक्ट्रिक करंट को किसी धातु से जोड़े जाने पर वह पूरी तरह चार्ज हो जाती है, ठीक उसी प्रकार जब कृष्ण किसी स्थान पर उपस्थित रहते हैं, तो वह पूरी जगह कृष्णमय हो जाती है। नहीं तो, कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल की बात करने की आवश्यकता ही नहीं थी। यही कृष्ण की सर्वशक्तिमानता है।
इस सर्वशक्तिमानता का वर्णन श्रीमद्भागवत में भी है। कई कृष्ण कथाएं हैं। वैदिक साहित्य उनसे भरा हुआ है। वेदों का अर्थ कृष्ण के लिए ही है। वेदों सहित शास्त्र अलग-अलग प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन वे सभी कृष्ण के लिए हैं। अगर हम सिर्फ इन कृष्ण कथाओं को सुनेंगे, तो क्या परिणाम होगा? एक शुद्ध पारलौकिक कंपन होगा, जो हम सबको आध्यात्मिक चेतना की ओर ले जाएगा। (इस्कॉन संस्थापक)