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इस शहर को उनकी नजर से देखें
तवलीन सिंह
Updated Sat, 10 Nov 2012 10:05 PM IST
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बीते सप्ताह मेरी मुलाकात भारतीय मूल के एक लेखक से हुई, जो बरसों बाद भारत आए हैं। मैंने जब उनसे पूछा कि उनको परिवर्तन के तौर पर क्या-क्या दिखा, तो कुछ क्षणों के लिए वह चुप हो गए और फिर धीमे स्वर में उन्होंने कहा, 'मुझे यह समझ में नहीं आता कि जो गंदगी हम बाहर वालों को एक दम दिख जाती है, वह आप लोगों को क्यों नहीं दिखती। मुंबई में एयरपोर्ट से बाहर निकलते वक्त ही इतनी गंदगी दिखती है चारों तरफ कि शहर में आने को मन नहीं करता।
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दिल्ली में थोड़ा-सा बेहतर हाल है, लेकिन आपके घर के रास्ते में मुझे दिखे कई सड़कों पर कूड़े के ढेर और वह गंदा नाला। ' दिल्ली के एक गांव में है मेरा घर। एक तरफ तो इतना बदल गया है, यह गांव कि जो लोग कभी छोटी-मोटी खेती-बाड़ी करके गुजारा करते थे, अब अमीर हो गए हैं इतने कि ऊंचे मकानों में रहते हैं और विदेशी गाड़ियों में घूमते हैं। सड़कें इतनी टूटी और बेहाल हैं, जैसे उनकी कभी मरम्मत हुई ही नहीं हो। ऐसा लगता कि प्रशासन नाम की कोई चीज ही नहीं है।
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सड़कों के किनारे हैं खुली, गंदी नालियां और कूड़े के इतने बड़े ढेर कि लगता है कि महीनों सड़ने के बाद कूड़े को हटाया जाता है। एक शिक्षित, जिम्मेदार नागरिक होने के नाते मैंने कई बार अपने विधायक से इन चीजों के बारे में बात की है और अनुरोध किया है, उनसे कि सड़कों की मरम्मत वह अपने विधायक कोष से करें और सफाई की व्यवस्था किसी निजी कंपनी द्वारा। अकसर जवाब मिला है कि यह सब उनका काम नहीं है और अगर शिकायतें हैं मुझे सफाई और सड़कों को लेकर, तो दिल्ली सरकार से करनी चाहिए।
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जो हाल मेरे गांव का है, वही भारत के हर गांव का है, हर शहर का है, हर महानगर का है, लेकिन ऐसा लगता है कि हम आदी हो गए हैं गंदगी के। हम राजनीतिक पंडित बड़ी-बड़ी बातें करते हैं आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों की, लेकिन भूल जाते हैं वे साधारण समस्याएं, जिनके समाधान के बिना भारत कभी विकसित देश नहीं बन सकेगा। मरते रहेंगे इस देश के बच्चे ऐसी बीमारियों के कारण, जो पैदा होती हैं सिर्फ गंदगी में और हर वर्ष मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में फैलती रहेंगी डेंगू जैसी बीमारियां।
मेरे गांव से थोड़ी ही दूर है गुड़गांव की चमकती इमारतें। शानदार मॉल हैं इन इमारतों में, नए किस्म के सिनेमा घर और उद्योगपतियों के आधुनिक दफ्तर। गुड़गांव में पिछले सप्ताह कई विदेशी निवेशक आए थे वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के भारत अधिवेशन में शामिल होने। यह वही संस्था है, जो हर साल दावोस में अपना बड़ा अधिवेशन करती है। भारत में विदेशी निवेशकों को लाने का इस संस्था ने खास काम किया है दिल्ली में वार्षिक अधिवेशन करके।
इस वर्ष गुड़गांव को चुना गया दिल्ली के बदले, ताकि विदेशी निवेशकों को इस अति आधुनिक शहर की चमक-दमक से लगे कि अर्थव्यवस्था का उतना बुरा हाल नहीं है, जितना विदेशों से लगता है इन दिनों। भारतीय अर्थव्यवस्था की वार्षिक वृद्धि जो तीन वर्ष पहले नौ फीसदी थी, अब आधी हो गई है और इसके कारण विदेशी निवेश कम हो गए हैं। गुड़गांव के एक नए पांच सितारा होटल में अधिवेशन रखने से शायद डब्ल्यूईएफ वालों को लगा होगा कि मायूसी में आस की किरण दिखेगी विदेशी निवेशकों को।
ऐसे कई लोग आए हैं बाहर से, जो एयरपोर्ट से सीधे गुड़गांव गए हैं, जिन्हें हरियाणा के इस शहर में दिखा होगा भारत का नया रूप। लेकिन वह सिर्फ तब, जब आप अपने होटल से बाहर झांककर न देखें। यह गलती अगर आप कर बैठे, तो एक दम दिख जाता है कि इस शहर की ऊंची इमारतें और चमकते मॉल इसके चेहरे पर मेकअप का ही काम कर रहे हैं। इस मेकअप के नीचे छिपा है भारत देश का असली रूप। वही गंदी नालियां, वही टूटी सड़कें, वही कूड़े के सड़ते ढेर और वही बुनियादी प्रशासन का गंभीर अभाव।
अधिवेशन में शामिल होने अपने कैग साहब विनोद राय भी आ पहुंचे और डटकर आलोचना की भारत सरकार के तौर-तरीकों की। उत्तरदायित्व की बातें की और साबित करने की कोशिश की कि उनके आने से उत्तरदायित्व भी आया है। ऐसी बड़ी-बड़ी बातें बहुत होती हैं अपने देश में। लेकिन शायद समय आ गया है उन छोटी चीजों की बातें करने का, जिनकी तरफ अकसर किसी का ध्यान नहीं गया है। वाकई अब जरूरी हो गया है भारत को विदेशी नजरों से देखना, तभी हम तसवीर बदल सकेंगे।