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लंबा संघर्ष : न्यूनतम समर्थन मूल्य लाभकारी बने

Wed, 01 Dec 2021 06:33 AM IST
K C Tyagi के. सी. त्यागी
Updated Wed, 01 Dec 2021 06:33 AM IST
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सार
किसानों के बड़े हिस्से में एमएसपी पर होने वाली बिक्री को लेकर जागरूकता के स्तर में भी कमी पाई गई है। अब किसान संगठनों ने कुछ बुनियादी प्रश्नों को भी उठाना शुरू कर दिया है, जो सरकारी पक्ष के लिए काफी असुविधाजनक साबित हो रहे हैं।
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Long Struggle: Minimum Support Price or MSP turned profitable
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एक वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद केंद्र सरकार द्वारा तीनों कृषि कानूनों को संसद के द्वारा खारिज किया जाना किसान आंदोलन की बड़ी उपलब्धि है। महत्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में वापसी को लेकर अफसोस भी जाहिर किया और क्षमा प्रार्थना की है। आमतौर पर शासन प्रमुख द्वारा इस प्रकार के विनम्रतापूर्वक संबोधन कम ही उपलब्ध हैं, किसान मोर्चा के घटक दलों द्वारा इस निर्णय का स्वागत तो अवश्य किया गया है, लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी प्रावधान के तहत लाने की मांग पर कायम रहते हुए उन्होंने धरना खत्म करने का सुझाव खारिज कर दिया है।


केंद्र सरकार द्वारा लगभग 23 फसलों के लिए एमएसपी लागू किया गया है, लेकिन एनएसओ की ताजा रपट के अनुसार, वास्तविकता यह है कि मात्र पांच फसलें ऐसी हैं, जिनकी 10 फीसदी या इससे अधिक पैदावार एमएसपी पर बिक पाती है। प्राप्त आंकड़े बेहद निराशाजनक तस्वीर पेश करने वाले हैं। धान, गेहूं और गन्ने की ही एमएसपी पर अच्छी बिक्री होती है, लेकिन यह भी अधिकतम चालीस फीसदी दर्ज की गई है।

 

मसलन, जुलाई-दिसंबर 2019 के बीच कुल 13 फसलों की एमएसपी पर बिक्री का ब्यौरा एकत्र किया गया है, इसके अनुसार धान की उपज का 23.7 फीसदी, गन्ने की 18.4 फीसदी, सोयाबीन की 13 फीसदी, उड़द की 1.5 फीसदी तथा मूंगफली की 10.9 फीसदी उपज ही एमएसपी के भाव पर बिक पाई है, जबकि आठ अन्य फसलें जिसमें ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, अरहर, मूंग, नारियल तथा कपास शामिल हैं, उनका 10 फीसदी हिस्सा भी एमएसपी के भाव नहीं बिक पाया।


किसानों के बड़े हिस्से में एमएसपी पर होने वाली बिक्री को लेकर जागरूकता के स्तर में भी कमी पाई गई है। अब किसान संगठनों ने कुछ बुनियादी प्रश्नों को भी उठाना शुरू कर दिया है, जो सरकारी पक्ष के लिए काफी असुविधाजनक साबित हो रहे हैं। वर्तमान में लगभग 11 करोड़ परिवार कृषि में लगे हैं, इनमें से लगभग 70 फीसदी किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम कृषि योग्य भूमि है। अगर समृद्ध राज्य पंजाब का उदाहरण लें, तो वहां एक हेक्टेयर भूमि में लगभग 50 क्विंटल गेहूं पैदा करने की क्षमता है, लेकिन उत्तर प्रदेश में सीमित सींचित साधनों के कारण गेंहू की क्षमता 35 क्विंटल मात्र आंकी गई है।


पंजाब का किसान, सरकारी आंकड़ों के अनुसार फसल से वर्ष में एक हेक्टेयर भूमि में लगभग 35,000 रुपये मूल्य अर्जित कर पाता है, जबकि उत्तर प्रदेश में किसान को मात्र प्रति हेक्टेयर फसल वर्ष में 15,000 रुपये के मुनाफे से संतोष करना पड़ता है। यह स्थिति उन परिस्थितियों के लिए है, जब सरकार द्वारा घोषित मूल्य पर बिक्री संभव है। निष्कर्ष है कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत समूचे देश के किसानों को मंडी और आढ़ती पर निर्भर रहना पड़ता है और औने-पौने दामों पर ही फसल का निपटारा करना पड़ता है।

 

खेती और किसानों के संकट का परिणाम है कि लगभग 52.5 फीसदी किसानों के ऊपर कर्ज का बोझ है। किसान संगठनों का मत है कि जब तक कृषि लागत और मूल्य आयोग को सांविधानिक दर्जा प्राप्त न हो और इसके द्वारा दिए गए सुझाव पूर्णतया मान्य न हों, तब तक इन संस्थाओं का कोई अर्थ नहीं है। यूपीए और एनडीए में शामिल दलों ने अपने घोषणा पत्रों में डॉ. स्वामीनाथन फॉर्मूला लागू कर समर्थन मूल्य तय करने का वादा किया था, जिसे किसी भी शासनकाल में पूरा नहीं किया गया।

संयुक्त किसान मोर्चा महसूस करता है कि सरकार ने जो एमएसपी घोषित की है, उससे तो किसान को अलग-अलग फसलों पर 611 रुपये से 2027 रुपये प्रति क्विंटल का नुकसान होगा। सरकारें मूल्य घोषित करते-करते बड़े ढिंढोरे पीटती हैं कि किस प्रकार लाभकारी मूल्य में वृद्धि हुई है, लेकिन घोषणा में सी-2+50 फीसदी के फॉर्मूले को पूरी तरह नजर अंदाज किया जाता है। यही उपयुक्त समय है, जब एक नए किसान आयोग का गठन किया जाए, जिसे अन्य आयोगों की तरह सांविधानिक दर्जा हो और जिसके निर्णय लागू करने के लिए सरकारें बाध्य हों।

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