फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Lonely chidambram in Davos!

दावोस में अकेले चिदंबरम!

Tue, 28 Jan 2014 12:52 AM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Tue, 28 Jan 2014 12:52 AM IST
विज्ञापन
Lonely chidambram in Davos!

बीते 20 वर्षों से गणतंत्र दिवस के मौके पर मैं अक्सर दावोस में होती हूं। सो, इस साल भी ऐसा ही हुआ। स्वीट्जरलैंड के इस छोटे बर्फीले शहर में इकट्ठा होते हैं, दुनिया के सबसे धनी निवेशक, सबसे प्रसिद्ध बुद्धिजीवी और सबसे बड़ी कंपनियों के अफसर।

विज्ञापन


ये लोग विश्व आर्थिक मंच के वार्षिक सम्मेलन में शामिल होने के लिए दावोस आते हैं। यहां पता चलता है कि आने वाले साल में कौन से खास राजनीतिक और आर्थिक मुद्दे होंगे। यकीन मानिए कि इंटरनेट के बारे में मुझे पहली बार दावोस में ही जानकारी मिली थी और पहला ई-मेल भी मैंने इसी सम्मेलन में भेजा। कितना बदल गया है तबसे जमाना।
विज्ञापन


पहली बार जब मैं यहां आई थी, 1995 में, तो भारत से बहुत कम लोग आया करते थे, और भारत की हैसियत भी न होने के बराबर थी। जैसे-जैसे भारत में आर्थिक सुधार की वजह से संपन्नता के आसार दिखने लगे, वैसे-वैसे दावोस में भारत की इज्जत बढ़ती गई और कुछ साल तो ऐसे थे, जिनमें यहां भारत छाया रहा। फिर शुरू हो गया देश में मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल के तहत आर्थिक मंदी का दौर और भारत गायब हो गया दावोस से और विदेशी निवेशक भूल-से गए हमें।
विज्ञापन
विज्ञापन


इस साल भी यही हाल है। सम्मेलन की पहली सुबह, मैं जल्दी उठकर तैयार हुई, क्योंकि अपने वित्त मंत्री के साथ खास बातचीत कर रहे थे ब्रिटेन के फाइनेंशियल टाइम्स के संपादक लिओनेल बारबेर। सम्मेलन में जाने से पहले रेस्तरां में नाश्ते के लिए गई, तो देखा कि वित्त मंत्री अकेले बैठकर नाश्ता कर रहे थे। कमरे में कुछ भारतीय उद्योगपति थे, जिन्होंने चिदंबरम साहब को सलाम-नमस्ते किया, कुछ बातें कीं, लेकिन ऐसा लगा कि जो विदेशी मेहमान थे वहां, उनमें से किसी को मालूम ही नहीं था कि भारत के वित्त मंत्री उनके बीच चुपके से नाश्ता कर रहे हैं।

सम्मेलन में वित्त मंत्री को सुनने पहुंची, तो देखा कि जिस छोटे-से कमरे में उनकी खास मुलाकात रखी गई थी, वहां तकरीबन सारे लोग भारतीय थे। यानी कि भारत के वित्त मंत्री की बातें सुनने विदेशी निवेशक आए ही नहीं। वित्त मंत्री ने बातें काफी अच्छी कीं। उन्होंने स्वीकार किया कि सोनिया-मनमोहन सरकार के दशक लंबे शासनकाल में सबसे सुनहरे साल थे 2004 से लेकर 2008 तक, जब अर्थव्यवस्था की वार्षिक दर नौ फीसदी तक पहुंच गई थी। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उसके बाद मंदी का मौसम शुरू हो गया, लेकिन इसका दोष उन्होंने दिया अंतरराष्ट्रीय कारणों को। और कह भी क्या सकते थे? कैसे मान सकते थे कि मंदी के मुख्य कारण अंदरूनी थे, जो पूरी तरह से जुड़े थे भारत सरकार की कुछ गलत नीतियों से।

अगर ऐसी बातें करते तो वतन वापस लौटते ही इस्तीफा तक देने की नौबत आ सकती थी, क्योंकि जिन गलत नीतियों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था में मंदी आई है उन सबके पीछे थी, सोनिया गांधी और उनकी राष्ट्रीय सलाहकार समिति। सोनिया और उनके सलाहकारों ने प्रधानमंत्री के आर्थिक सुधारों का विरोध किया इस आधार पर कि इनसे गरीबों का भला नहीं हुआ है। इसको सुधारने के लिए शुरू की गई थी मनरेगा जैसी समाज कल्याण योजना, जिस पर लाखों-करोड़ रुपये खर्चे गए हैं, पिछले दशक में बिना यह देखे कि इनसे गरीबी कम हुई भी या नहीं। सो सरकारी खर्चे बढ़ते गए और आमदनी कम होती गई।

ऐसा नहीं कह रही हूं मैं कि गरीबी हटाने को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए, पर मनरेगा पर जो पैसा खर्चा गया, अगर बिजली, पानी, सड़कों और स्कूलों के निर्माण पर खर्च किया गया होता, तो ग्रामीण भारत की शक्ल आज कुछ और ही होती। खैर, जो हो गया सो हो गया, अब क्या रोना। लेकिन इतना कहना जरूरी है कि दुनिया की नजरों में आज भारत वही पुराना भारत बन गया है, जिसमें निवेशक का पैसा सुरक्षित नहीं माना जाता था और जिसमें अर्थव्यवस्था को चलाया करते थे, सिर्फ सरकारी अधिकारी।


मुझे याद है कि ये आला अधिकारी घमंड से कहा करते थे कि चाहे कुछ भी हो, विदेशी निवेशकों को आना ही होगा भारत, क्योंकि हमारा बाजार इतना विशाल है। ऐसा अब नहीं कहते हैं, क्योंकि जानते हैं कि मामला उलटा हो गया है और जरूरत भारत को है विदेशी निवेशकों की, वरना मुश्किल होता जाएगा भारत निर्माण।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed