{"_id":"6513877544b69a721c0af955","slug":"lok-sabha-elections-2024-set-back-for-bjp-in-south-india-as-aiadmk-exit-nda-tamil-nadu-new-political-scenario-2023-09-27","type":"story","status":"publish","title_hn":"राजनीति: दक्षिण में भाजपा के लिए मुश्किल, तमिलनाडु में बदल सकते हैं सियासी दोस्त और दुश्मन","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
राजनीति: दक्षिण में भाजपा के लिए मुश्किल, तमिलनाडु में बदल सकते हैं सियासी दोस्त और दुश्मन
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
एआईएडीएमके महासचिव एडप्पादी के पलानीस्वामी।
- फोटो :
ANI
विस्तार
अन्नाद्रमुक का एनडीए से बाहर निकलना और लोकसभा चुनाव के लिए नए मोर्चे के गठन की घोषणा करना निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए एक बड़ा झटका है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता में तीसरी बार वापसी की रणनीति बना रही है। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम का असर तमिलनाडु की राजनीति पर पड़ सकता है और द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन की छोटी पार्टियां ज्यादा सीटें पाने के लिए अन्नाद्रमुक के साथ सौदेबाजी कर सकती हैं। इससे कांग्रेस भी प्रभावित हो सकती है। परिकल्पना कीजिए कि यदि यह सब होता है, तो इससे विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ गठबंधन पर भी असर पड़ सकता है, जिसके फलस्वरूप तमिलनाडु में द्रमुक-कांग्रेस के बीच गठजोड़ भी प्रभावित हो सकता है।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में अब करीब आठ महीने ही बचे हैं। ऐसे में अगर तमिलनाडु की राजनीति में उथल-पुथल और भ्रम की स्थिति बनी रही, तो जाहिर है कि इसका फायदा राज्य में सत्तारूढ़ दल यानी एमके स्टालिन की द्रमुक को मिलेगा। जयललिता के शासन काल में अन्नाद्रमुक भाजपा का एक भरोसेमंद और विश्वसनीय सहयोगी रहा है, जिसने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का समर्थन किया। जयललिता ने अन्नाद्रमुक के चुनावी घोषणा पत्र में इसे शामिल किया था। अन्नाद्रमुक समान विचारधारा वाली ऐसी पांचवीं पार्टी है, जो एनडीए से बाहर हुई है।
अकाली दल, शिवसेना, जनता दल (यूनाइटेड) इत्यादि ने पहले ही अपना समर्थन वापस ले लिया और नरेंद्र मोदी सरकार से खुद को अलग कर लिया था। निश्चित रूप से इसने एनडीए को प्रभावित किया। अन्नाद्रमुक द्वारा भाजपा से रिश्ता खत्म करने के बारे में कई कारण बताए जा रहे हैं। इस कहानी में अभी कई मोड़ आएंगे और इस बात की पूरी संभावना है कि अगले एक महीने में तमिलनाडु की राजनीति में काफी बदलाव आएगा। कयास लगाए जा रहे हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले 'इंडिया' में भी एक बड़ा संकट पैदा हो सकता है। यदि कांग्रेस को 20 लोकसभा सीटों की पेशकश की जाती है और वह अन्नाद्रमुक के साथ जाने के लिए तैयार हो जाती है, तो द्रमुक के अध्यक्ष एमके स्टालिन क्या करेंगे?
नई दिल्ली में भाजपा नेताओं ने अन्नाद्रमुक पर आरोप लगाया कि वह सनातन धर्म वाले मुद्दे पर चुप रही। अमित शाह ने एडप्पादी पलानीस्वामी से स्पष्ट रूप से कहा था कि अन्नाद्रमुक द्वारा उदयनिधि स्टालिन की आलोचना करते हुए एक प्रेस बयान जारी किया जाए। लेकिन अन्नाद्रमुक द्वारा भाजपा और एनडीए गठबंधन से नाता तोड़ने के पीछे कुछ और कारण बताए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, अन्नाद्रमुक चाहती थी कि भाजपा अपनी तमिलनाडु इकाई के प्रमुख के अन्नामलाई को पद से हटा दे या उस पर अंकुश लगाए। लेकिन जब भाजपा ने इससे इन्कार कर दिया, तो अन्नाद्रमुक ने एनडीए से रिश्ता खत्म करने की घोषणा कर दी।
बताया जाता है कि पिछले हफ्ते अन्नाद्रमुक के पांच सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल ने नई दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की थी और भाजपा नेता के अन्नामलाई को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग की थी, क्योंकि पिछले दिनों अन्नामलाई ने द्रविड़ नेता सीएन अन्नादुरई के खिलाफ एक आलोचनात्मक टिप्पणी की थी। लेकिन भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ऐसा नहीं करना चाहते थे। इस तरह से अन्नाद्रमुक सीट बंटवारे को लेकर नहीं, बल्कि राज्य भाजपा प्रमुख द्वारा अपने संस्थापकों के अपमान के कारण एनडीए गठबंधन से अलग हो गई।
गौरतलब है कि अन्नामलाई पूरे तमिलनाडु में ‘एन मन एन मक्कल’ यात्रा का नेतृत्व कर रहे हैं और राज्य में पार्टी के लिए एक मजबूत आधार बनाने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए भाजपा नेतृत्व अन्नामलाई का समर्थन कर रहा है। यह यात्रा आगामी 11 जनवरी, 2024 को चेन्नई में खत्म होगी, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सभी यात्रियों को माला पहनाकर स्वागत किए जाने की उम्मीद है। भाजपा नेताओं को आधिकारिक तौर पर इस मुद्दे पर कुछ न बोलने की सलाह दी गई है। लेकिन कम से कम दो भाजपा नेताओं ने बताया कि 'उम्मीद की किरण' अब भी बची हुई है, क्योंकि भाजपा को अब तमिलनाडु में 'अपने पैर जमाने' और 2024 के लोकसभा चुनाव में छोटे दलों के साथ गठबंधन करने का मौका मिला है। भाजपा के सूत्रों ने यह भी कहा कि अन्नाद्रमुक के इस कदम का उद्देश्य अल्पसंख्यक मतों को लुभाना है। भाजपा को अब भी उम्मीद है कि 'अन्नाद्रमुक अपने फैसले पर फिर से विचार करेगी और एनडीए गठबंधन में बनी रहेगी।'
आश्चर्य की बात है कि नई दिल्ली में भाजपा के कुछ शीर्ष नेता अब भी इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि अन्नाद्रमुक एनडीए में लौटेगी। पर्दे के पीछे उसे मनाने की कोशिश जारी है। जल्द ही एक शीर्ष स्तर का भाजपा नेता बातचीत शुरू करने के लिए चेन्नई पहुंचेगा। यदि भाजपा अन्नाद्रमुक को एनडीए में लाने में विफल रहती है, तो भाजपा 2022 में हैदराबाद में राष्ट्रीय कार्यकारिणी में लाए गए प्रस्ताव पर ध्यान केंद्रित करेगी, जिसमें कहा गया था कि पार्टी दक्षिण भारत के छह राज्यों से 50 लोकसभा सीटें हासिल करने पर जोर देगी। भाजपा नेताओं को इस बात का एहसास है कि पार्टी ने गुजरात, राजस्थान और हरियाणा में अपना चरम हासिल कर लिया है, लेकिन उन्हें कुछ राज्यों, जैसे कि पश्चिम बंगाल, पूर्वोत्तर के राज्यों और बिहार में भी ज्यादा सीटें खोने का डर है। जब तक भाजपा दक्षिण से ज्यादा सीटें नहीं जीतती, तब तक इस नुकसान की भरपाई कैसे की जा सकती है!
अन्नाद्रमुक के महासचिव एडप्पादी पलानीस्वामी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के समर्थन से चार साल तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। भाजपा के परोक्ष समर्थन के कारण ही उन्हें दो पत्तियों वाला चुनाव चिह्न मिला। पलानीस्वामी ने अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी ओ पन्नीरसेल्वम से कानूनी बाधाओं का मुकाबला किया। उन्हें बड़ी बाधाओं से निकालने के लिए भाजपा उनके साथ ठोस चट्टान की तरह खड़ी रही। तमिलनाडु के इस राजनीतिक घटनाक्रम को आप चाहे जिस भी नजरिये से देखें, यह भाजपा के लिए अच्छा नहीं है। हालांकि, इस पुरानी कहावत को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ‘राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता है’।