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इस मंथन से क्या निकलेगा

Fri, 22 Mar 2013 08:59 PM IST
Updated Fri, 22 Mar 2013 08:59 PM IST
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lok sabha election 2014

लोकसभा चुनाव को अभी एक वर्ष बचा है, मगर परिदृश्य में राजनीतिक दलों के भारी गर्जन-तर्जन का नजारा देखा जा सकता है। अंदरखाने हर पार्टी भावी तैयारियों में जुटी है। ऐसे में हर दल की स्थिति का मूल्यांकन समीचीन होगा। कांग्रेस में शीर्ष स्तर पर कोई विवाद नहीं है और अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष अपने काम में जुटे हैं।

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राहुल गांधी ने, जो चुनाव प्रभारी भी हैं, कई राज्यों का दौरा किया है। लेकिन मुश्किल यह है कि हर गुजरते दिन के साथ एक नया संकट पैदा हो जाता है। सपा एवं द्रमुक, दोनों संघर्ष की मुद्रा में हैं। बेशक इन मुद्दों का आंशिक तौर पर समाधान कर लिया जाएगा, लेकिन ऐसी स्थिति जारी रहेगी, क्योंकि 2014 के चुनाव के मद्देनजर हर राज्य में राजनीतिक मंथन तेज हो गया है।
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स्थानीय निकाय के चुनाव में कर्नाटक में जनता दल (एस) के साथ कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया है। इससे भी अहम बात यह है कि ये परिणाम रुझान का संकेत करते हैं और शायद पार्टी ने शहरी क्षेत्र में अपनी स्थिति सुधारी है।
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दूसरी तरफ भाजपा में शीर्ष पर संघर्ष लगातार जारी है। नरेंद्र मोदी ने कुछ नपे-तुले कदम उठाए हैं और आगे बढ़ गए हैं, लेकिन उनकी स्वीकार्यता को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। बिहार में सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) के साथ और भाजपा के भीतर भी मोदी की स्वीकार्यता को लेकर आपत्तियां स्पष्ट हैं।

इसके अलावा आगे भी बाधाएं आ सकती हैं, क्योंकि गुजरात की 15 से 18 लोकसभा सीटें केंद्र में दावेदारी के लिए पर्याप्त नहीं होंगी। आने वाले महीनों में चुनौतियां सामने आएंगी और अभी तो चुनाव में समय है।

अस्सी लोकसभा सीट होने के कारण केंद्र की सत्ता में उत्तर प्रदेश की भूमिका हमेशा से अहम रही है और आगे भी रहेगी। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह भी, जो अभी भाजपा अध्यक्ष हैं, प्रधानमंत्री पद के एक प्रबल दावेदार होंगे।

उसी तरह शिवराज सिंह चौहान भी एक दावेदार होंगे। वाम दलों को त्रिपुरा में कोई संकट नहीं है और सत्ता विरोधी रुझान के चलते पश्चिम बंगाल एवं केरल, दोनों राज्य में उसे फायदा हो सकता है। पर असली संकट तो कांग्रेस एवं भाजपा के लिए उन राज्यों में है, जहां स्थानीय नेतृत्व लोगों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है।

मैं राजनीतिक क्षेत्र के कई लोगों से बातें करता हूं और उनके भरोसे का सम्मान किया जाना चाहिए, इसलिए मैं गठबंधन के मसले पर गहराई में नहीं जाऊंगा, पर कुछ संकटपूर्ण राज्यों के हालात पर नजर डालिए।

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की अग्रणी भूमिका होगी, और इसमें कोई संदेह नहीं है कि कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर सपा की छवि खराब हुई है। राजा भैया का मुद्दा इसकी पुष्टि ही करता है।

ऐसे वक्त में जब कि गलती करने की कोई जरूरत नहीं है, सपा की गलतियों के कारण मैं बसपा को फायदा होते देख रहा हूं, उसी तरह कांग्रेस एवं भाजपा भी फायदे में रहेगी।

बसपा को वहां 22 से 27, कांग्रेस को 12 से 15 एवं भाजपा को 18 से 20 सीटें मिल सकती हैं। चूंकि अभी चुनाव में समय है, इसलिए इस आंकड़े में आगे बदलाव भी हो सकता है।

बिहार में चीजें तेजी से बदल रही हैं, क्योंकि जद (यू) ने एक बड़ा धमाका किया है। दिल्ली में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए एक विशाल रैली आयोजित की। नीतीश कुमार को अपना संख्याबल बचाने के लिए बिहार से बाहर निकलना पड़ेगा।

वह एक चतुर राजनेता हैं और इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि नेतृत्व कौशल के लिए स्वीकार्यता भी जरूरी है। जद (यू) के आगे बढ़ने से भाजपा भी दबाव में आ सकती है। राजद एवं लोजपा, दोनों भीड़ खींच रही है, लेकिन इससे उन दोनों को सीटों का फायदा होगा या नहीं, इसके बारे में कोई कयास लगाना जल्दबाजी होगा।

एक रणनीतिक गठजोड़ के जरिये बिहार एवं झारखंड, दोनों राज्यों के घटनाक्रमों से कांग्रेस फायदा उठा सकती है और यह लाजिमी भी है। दोनों राज्यों में कुल मिलाकर 54 लोकसभा सीटें हैं।

अड़तालीस सीटों वाले महाराष्ट्र में कांग्रेस-राकांपा के बीच यथास्थिति बरकरार है और भाजपा-शिवसेना में सभी मोर्चों पर मतभेद हैं, लेकिन हम 42 सीटों वाले आंध्र प्रदेश, 42 सीटों वाले पश्चिम बंगाल, 39 सीटों वाले तमिलनाडु, 26 सीटों वाले कर्नाटक, एवं 25 सीटों वाले राजस्थान में बदलाव देख सकते हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी संकट में हैं और लगता है कि आगामी पंचायत चुनाव में इसका असर दिखेगा। वाम दलों एवं कांग्रेस को थोड़ा ही फायदा होगा, पर असली समस्या तृणमूल के भीतर बढ़ते असंतोष से हो सकती है, नतीजतन जिलों के कद्दावर समूह अपनी ताकत का प्रदर्शन कर सकते हैं।

ममता बनर्जी अपनी पार्टी को एकजुट रखने के लिए हर तीन महीने पर मध्यावधि चुनाव की बात करती हैं, लेकिन चुनाव अभी एक वर्ष दूर है, क्या तब तक तृणमूल कांग्रेस एकजुट रह सकती है?


पश्चिम बंगाल की इस फायरब्रांड नेता ने कांग्रेस के साथ अपना सहज गठबंधन तोड़ लिया और भाजपा के साथ जाने में वह खुद को मुश्किल में पाती है, क्योंकि बिहार, केरल, उत्तर प्रदेश एवं आंध्र प्रदेश की तरह पश्चिम बंगाल में भी अल्पसंख्यक मतदाता हैं, जो कई सीटों के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए भाजपा के साथ जाना ममता बनर्जी के लिए फायदेमंद नहीं होगा, क्योंकि तृणमूल अल्पसंख्यक वोट जुटाने में लगी है और इसमें कोई रहस्य नहीं है।

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