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धर्म युद्ध में प्रज्ञा चक्षु, व्हाट्सएप पर देश बचाना चाहते हैं 'क्रांतिकारी'

Sun, 21 Apr 2019 10:41 AM IST
आसिम खान यशवंत व्यास
यशवंत व्यास Published by: आसिम खान Updated Sun, 21 Apr 2019 10:41 AM IST
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Lok Sabha Chunav 2019: Political satire on Sadhvi Pragya WhatsApp campaign by Yashwant Vyas
प्रतीकात्मक तस्वीर

इतना लाइव हास्य-व्यंग्य हो गया है कि अलग से कुछ भी लिखने का कौशल ही बेकार गया। भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में पड़े लोग जेल से ही क्रांतिकारी हो रहे हैं, जमानत पर बाहर घूम रहे लोग वायरल सत्य के उद्घोषक हो रहे हैं और चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिए गए लोग सीना चीरकर सैद्धांतिक सहयोगियों के मंच पर लोकतंत्र के शूरवीर हुए जा रहे हैं। 


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इतना लाइव हास्य-व्यंग्य हो गया है कि अलग से कुछ भी लिखने का कौशल ही बेकार गया। भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में पड़े लोग जेल से ही क्रांतिकारी हो रहे हैं, जमानत पर बाहर घूम रहे लोग वायरल सत्य के उद्घोषक हो रहे हैं और चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिए गए लोग सीना चीरकर सैद्धांतिक सहयोगियों के मंच पर लोकतंत्र के शूरवीर हुए जा रहे हैं। 

कोई तिनका कल तक बाढ़ में बहता किसी शिवलिंग पर जा उतरा था, आज वह किसी और ठिकाने पर नई बाढ़ और नए शंकरजी के लिए बाढ़ और तिनके के मुहावरे पर तालियां ठोक रहा है। सबसे दिलचस्प व्हाट्स एप क्रांति है। ये आपके फोन पर उतर ही आती है। एक धुरंधर जो कभी किसी के भयंकर समर्थक हुआ करते थे, अब भयंकर रूप से उनसे देश बचाना चाहते हैं। वजह? पांच साल होने को आए उनका कोई समर्थन मूल्य ही तय नहीं हुआ। 

अभी वे जातिविहीन समाज के विप्लवी प्रवक्ता हैं। कल उन्होंने व्हाट्स एप संदेश भेजा, ‘अपने क्षेत्र में जातियों का जो गणित है, उस हिसाब से कुल जातियां यों बैठती हैं- ब्राह्मण, वैश्य, राजपूत, एससी-एसटी और मुसलमान।’ मुसलमान एक साथ वोट करेंगे ही और अगर ब्राह्मणों में टूट हो जाए, तो एससी-एसटी और मुसलमान मिलकर हवा बदल देंगे। 

उनके हिसाब से मुसलमान धर्म नहीं, एक जाति थी और बाकी चार जातियां एक हिंदू धर्म नहीं, चार समुदाय थे। और इनको हिलाकर वे लोकतंत्र का धर्म बचा लेना चाहते थे। पर थे पक्के धर्म निरपेक्ष, पक्के जाति विरोधी। क्रांति का हुक्का ऐसा ही होता है, गुड़गुड़ाते कहीं हैं, आग कहीं लगी है, और धुआं जो है, कहीं और रखे पानी से छनकर आ रहा है।

अभी कल तक प्रियंका चतुर्वेदी कांग्रेस में बैठी, स्मृति ईरानी की डिग्री जांच रही थीं, बड़ी क्रांतिकारी लग रही थीं। शिवसेना में पहुंचते ही क्रांति को मोक्ष प्राप्त हो गया। एक महान सज्जन भाजपा से निकले, कांग्रेस में गए और सपा में अपनी श्रीमतीजी को भेजकर क्रांति की अवधारणा समझाने लगे। इसे राजनीति की आध्यात्मिक साधना में शक्तिपात कहते हैं। यह परमावस्था के अनुभव का परिणाम है।

कौन नहीं जानता कि मुंबई पर हुए आतंकी हमलों में आरएसएस की साजिश की पत्री बांचने वाले दिग्विजय सिंह को बाटला हाउस मुठभेड़ के शहीद मोहनचंद से ज्यादा आजमगढ़ के मासूम याद आते रहे हैं। उन्होंने तो हेमंत करकरे से बातें होने का हवाला भी दिया है। अब साध्वी प्रज्ञा जब सामने उतर आई है, तो संसदीय क्षेत्र का विकास तो एक तरफ रह गया, यातनाएं, षड़यंत्र और आतंक का ही सस्वर पाठ हो रहा है। 

लगता ऐसा है, जैसे पांच साल पहले तो देश में नफरत, बम विस्फोट, दंगे आदि का किसी ने नाम ही नहीं सुना था। उससे पहले तो सब चैन से इंडिया गेट पर बैठे लइया खाते रहते थे और मनोज कुमार के गीत सुनकर झूमते रहते थे। अब संकट आ गया है तो संघर्ष में कूद पड़े हैं। अब तो शपथ ले ली है। ‘हरा आतंकवाद’ और ‘भगवा आतंकवाद’ आज ही परमगति को प्राप्त हो जाने हैं।

एक बार महीनों पहले एक उदारवादी बौद्धिक गोवा पहुंचे। सुबह-सुबह उतरते ही उन्होंने एक फोटो ट्वीट किया, ‘वाह, भाजपा के राज के बावजूद बीफ का शानदार नाश्ता।’ जाहिर है, उन्हें आधे घंटे में समझ आ गया कि मजेदार नाश्ता व्यक्तिगत चीज है और वे मजे में चाहे जो खाने को आजाद हैं, मगर उसे दिखा-दिखाकर फोटो चिपकाने के साथ जो टिप्पणी उसमें चिपकाई गई है, वह चिढ़ाने के भाव में जाती है। 

वे संजीदा बौद्धिक थे, बारीकी एकदम समझ में आ गई। उन्होंने फोटो तुरंत हटा लिया। उनकी ईमानदारी ने कई का धंधा चौपट कर दिया। हजार ट्वीट क्रांतियां जन्म लेने से पहले ही मर गईं। अब व्यंग्य लिखता हूं, तो करुणा हो आती है। अगर कोई कांग्रेस की मूर्खताओं पर जरा कुछ कहता है, तो वह ‘भक्त’ हो जाता है। कोई भाजपा की कमियों पर सवाल उठाता है, तो वह ‘प्रेमी’ हो जाता है। 

जैसा कि अनुभव कहता है, प्रेम अंततः शक्ति में समाप्त होता है। प्रेमी और भक्त विद्वान, अध्येता, विश्लेषक, अफसर संसद में पहुंच जाते हैं। जो नहीं पहुंच पाते, वे पलटकर और भी भयंकर क्रांतिकारी हो जाते हैं। वे सिद्धांत के झोले से टीवी चैनल पैदा कर सकते हैं, आत्मा के चूल्हे से राष्ट्र कल्याण की चपातियां सेंक सकते हैं, तर्क के रिमोट झाडू से कोलकाता में लाहौर और न्यूयॉर्क में दिल्ली की सफाई कर सकते हैं। 

वे ईडी और इन्कम टैक्स की रेड में स्वयं के भगत सिंह बनने का शुभ अवसर देखते हैं। क्या शक है कि देश में जाति है। क्या शक है कि विभाजन से एक धर्म का अलग देश बतौर सबूत खड़ा है। क्या शक है कि दुनिया धर्म के नाम पर हो रहे आतंकवाद से जूझ रही है। क्या शक है कि समूहों की गोलबंद वोटिंग होती है। मगर इसमें भी क्या शक है कि गरीबी, अमीरी और समानता राजनीतिक सत्ताओं का सबसे प्रिय निवाला है। 

सत्ताएं ही सत्य निर्धारित करती हैं। इसलिए सभी सत्ता में आकर अपना सत्य ‘फिक्स’ कर देना चाहते हैं। जिनके प्रज्ञा चक्षु नकली नोट और बम- दोनों बनाने वालों को दर्शनशास्त्र सप्लाई करते हैं। जो केंचुए में सांप और कबूतर में गिद्ध चीन्ह लेते हैं, उनके धर्मयुद्ध का क्या कहना?

हाल में रिश्वत में पकड़े गए एक एडीएम ने कविता संग्रह छपाया था। उन कविताओं में न्याय, प्रेम, करुणा, रिश्ते और पत्ते बहुत थे। इसी का परिणाम था कि क्रमशः न्यायालय, विवाह, अनाथाश्रम, वृद्धाश्रम और वन-विभाग तक उन्होंने रिश्वत के रास्ते खोले। पक्का है, वे आगे चलकर चुनाव लड़ेंगे।

उनके भी प्रज्ञा चक्षु खुलेंगे, वे भी धर्म युद्ध में उतरेंगे। वे भी देश बचाएंगे। बस इतना ही कि वे अभी अपने धर्म के आधार पर सांखि्यकी का अध्ययन कर रहे हैं, जहां से दावेदारी ठोक सकें। 

प्रज्ञा, चक्षु, धर्म और युद्ध - ये सब दिग्विजय के ही प्राथमिक चरण हैं। अंतिम चरण में करुणा है। और करुणा जो है, व्यंग्य का विषय नहीं है- उसकी अंतर्धारा है। मणिशंकर अय्यर और गिरिराज सिंह- दोनों सुन रहे हैं ना?
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