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जिंदगी में आए कुछ भूले-बिसरे गीत
Sat, 25 Apr 2020 09:20 AM IST
संजीव कुमार झा
सुभाष घई(मशहूर फिल्म निर्देशक)
सुभाष घई(मशहूर फिल्म निर्देशक)
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Sat, 25 Apr 2020 09:20 AM IST
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सुभाष घई
- फोटो : सोशल मीडिया
जब भी कोई संकट आता है, तो हम सब मिलकर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। कभी श्लोकों के जरिये, कभी गीतों के जरिये तो कभी मौन रहकर। धर्म भी यही शिक्षा देते हैं और ईश्वरीय संदेश भी यही है। मनुष्य जब कष्ट में हो, तो जरूरी है कि वह भजन करे, ध्यान करे और अपनी आतंरिक शक्ति को मजबूत करे। इतने लंबे समय तक घर में बैठना आसान नहीं है।
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ललित कलाओं ने इस गाढ़े समय में लोगों को बहुत राहत दी है। सिनेमा, वेब सीरीज, टीवी के समाचारों और धारावाहिकों ने घरों में बैठना कुछ हद तक आसान बनाया है। यह पहली बार नहीं है, जब भारत पर कोई गहरा संकट आया है। लेकिन हम भारतीय ऐसे आघातों से रुकते नहीं हैं। अकाल में उत्सव की परंपरा हम सबके रक्त में युगों-युगों से प्रवाहित होती आई है। धार्मिक प्रार्थनाएं, संतों के उपदेश और महाकाव्यों के प्रसंग हमें प्रेरित करते हैं।
आध्यात्मिकता से उपजा आत्मविश्वास भारत के लोगों की शक्ति का स्रोत है। देश पर कितने आक्रमण हुए, कितने राजे-महाराजे आए और गए, लेकिन लोगों के अंदर भारतीयता की पहचान और अपनी संस्कृति की महानता का बोध खत्म नहीं हुआ। राम और कृष्ण, जो परमेश्वर के अवतार माने जाते हैं, का जीवन भी अनेक झंझावातों से घिरा हुआ था। अगर राम 14 साल वनवास में रह सकते हैं, तो हम लोग कुछ हफ्ते घर के अंदर क्यों नहीं रह सकते!
हर भारतवासी के अंदर इतना आत्मबल तो अवश्य है। हम रात में चंदा मामा को देखकर सोने और सुबह सूरज की रोशनी से नहाने वाले लोग हैं। हिंदुस्तान सारे जहां से अच्छा इसलिए नहीं है कि यहां के लोग बहुत रईस हैं। यह इसलिए है कि हम लोग ताकतवर और जीवट वाले हैं। यह समय अंधेरे में हाथ थामने का है। सुनसान में गुनगुनाने का है। सहारा देने का है। एक दूसरे को धीरज बंधाने का, अडिग रहने, साथ चलने और भूले-बिसरे पुराने गीतों को याद करने का है।
याद करके देखें, बड़ा सुकून मिलेगा। मन जब बीते कल में जाता है, तो आने वाले कल के लिए नई ऊर्जा मिलती है। जो गीत कभी होंठो पर खिलखिलाते थे, उन गीतों को याद करना भी सुखद लगता है। वे गीत फिर से जिंदगी की कहानी सुनाते हैं। पहले भी कई महामारियां आईं, लेकिन सभ्यताएं इनको पीछे छोड़कर फलती-फूलती रही हैं। हजारों सालों से ऐसे ही चलता आया है। 100 साल पहले, न तो आज की तरह सुविधाएं थीं, न ही तकनीक इतनी विकसित थी।
हमारे दादा-परदादा उस दौर की चुनौतियों से डटकर लड़े, खुद के लिए, अपने परिवार के लिए। तभी तो आज हम सबका अस्तित्व है। हम लोग खुशनसीब हैं कि अब इतनी सुविधाएं हमें मयस्सर हैं। कुछ महीनों की मुसीबत आसानी से काटी जा सकती हैं। कहते हैं, समय बहुत बलवान होता है। अब घर का कचरा उठाते समय उसमें से उठती बदबू इस बात का एहसास दिलाती है कि सफाईकर्मियों का काम कितना मुश्किल है! सड़कों पर पुलिसकर्मी लोगों से हाथ जोड़कर घर में रहने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं।
डॉक्टर खुद संक्रमित होने के खतरों के बीच भगवान बनकर लोगों का इलाज कर रहे हैं। अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर ये लोग हम सबके लिए कर्तव्य पथ पर जुटे हुए हैं। इस सेवा की कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती। कमियां गिनाने के लिए बहुत वक्त मिलेगा, लेकिन फिलहाल कोरोना से जंग में एकजुटता दिखानी होगी। एक-दूसरे की ताकत बनना होगा। हम सबके सामने एक सवाल है, देश और मानवता को बचाने का।
प्रकृति के विधानों को सीखने का इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा। मैं तो बस यही कहूंगा कि जिंदगी हर कदम एक नई जंग है, जीत जाएंगे हम, तू अगर संग है...।