खाद्य सुरक्षा से जुड़ा है पशुधन, पवित्रता का प्रतीक है गाय

वीर सिंह Updated Sun, 22 Nov 2020 02:49 AM IST
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गोवंश
गोवंश - फोटो : अमर उजाला

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गाय, निस्संदेह, वैदिक युग से भारतीय सभ्यता के केंद्रीय प्रतीकों में से एक रही है। 'पवित्र गाय' एक कहावत है, जो दुनिया भर में प्रचलित है, और जिससे यह भी स्पष्ट होता है कि दुनिया भर में गाय को पवित्र और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक गाय कामधेनु की महिमा उसके अत्यधिक मात्रा में अमृत जैसा दूध देने के लिए गाई जाती है। लगभग दस हजार वर्ष पूर्व अस्तित्व में आई कृषि ने गाय की महत्ता को और अधिक बढ़ा दिया, न केवल उसके पौष्टिक दूध के कारण, बल्कि उसके बैलों से मिलने वाली शक्ति और मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को बनाए रखने के कारण भी। दूसरे शब्दों में, हजारों वर्षों से हमारी खाद्य सुरक्षा बैलों के कंधों पर टिकी रही है। गाय का यह ऐसा उपादान है, जिसका शायद ही कोई सानी हो। परंतु विडंबना यह है कि हमारे आज के राजनीतिक वातावरण में गाय दोराहे पर खड़ी है, जहां कुछ लोग उसे संरक्षण के योग्य मानते हैं, और कुछ भक्षण की वस्तु।
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गौ पशुओं की 20 करोड़ से भी अधिक संख्या के साथ भारत दुनिया में प्रथम स्थान पर है और विश्व की गौ पशुओं की कुल आबादी का 33.39 प्रतिशत उसके पास है। 22.64 प्रतिशत के साथ ब्राजील और 10.03 प्रतिशत के साथ चीन दुनिया के गौ पशुओं की आबादी की दृष्टि से क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। यह जानकर, कि हम दुनिया में दूध के सबसे बड़े उत्पादक हैं, हर भारतीय को गर्व की अनुभूति होती है। वर्ष 2016-17 में कुल दूध उत्पादन लगभग 1,550 लाख टन था, जो 2021-22 में बढ़कर 2,100 लाख टन होने की संभावना है। यह भारत की गायों की आबादी के कारण ही है कि हम पिछले 10 वर्षों से दुग्ध उत्पादन में चार फीसदी की वार्षिक वृद्धि कर रहे हैं। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अध्यक्ष को अगले कुछ वर्षों के दौरान 7.8 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि की उम्मीद है। इस प्रकार, श्वेत क्रांति, हरित क्रांति से अधिक टिकाऊ रही है। भारत में प्रति व्यक्ति दूध उत्पादन भी 1991-92 में मात्र 178 ग्राम से बढ़कर 2015-16 में 337 ग्राम हो गया था और कुछ वर्षों में यह बढ़कर 500 ग्राम प्रतिदिन हो जाएगा। इस प्रकार, भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए पशुधन का, विशेष रूप से गौवंश का, बहुत बड़ा योगदान है, जो हमें गर्व से भर देता है।
गौवंश का योगदान केवल उनके दूध उत्पादन के संदर्भ में गिना जाता है। लेकिन ऊर्जा पशुओं के रूप में वे और भी अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हल खींचने, पाटा लगाने, बुआई करने, गन्ना पेरने, धान के लिए कीचड़-भरा खेत तैयार करने, अनाज की गहाई करने, खेत से घर तक उत्पाद ढोने, बाजार तक उत्पाद ढोने, मिल तक गन्ना ले जाने आदि खेती-किसानी से जुड़े कामों में गौ-वत्सों-यानी बैलों- का कितना योगदान है! देश की खाद्य सुरक्षा में उनका कितना योगदान है!
न केवल गौपशुओं की आबादी और दूध उत्पादन में भारत सर्वोच्च है, बल्कि मवेशियों की नस्लों की विविधता में भी है। भारत में गाय की कोई 30 नस्लें अच्छी तरह से वर्णित हैं। गैर-वर्णित नस्लों की संख्या अब भी कहीं  अधिक है। प्रत्येक नस्ल में विशिष्ट गुण होते हैं, जैसे कि दूध देने की क्षमता, खेती कार्यों की क्षमता, चारे की उत्पाद में रूपांतरण दक्षता, भौगोलिक क्षेत्र के अनुरूप कृषि क्रियाओं की नैसर्गिक दक्षता आदि। कुछ भारतीय नस्लें, जैसे साहीवाल, गिर, लाल सिंधी, थारपारकर और राठी दुधारू नस्लों में से हैं। हरियाणा, अमृतमहल, कंकरेज, ओंगोल, लाल कंधारी, मालवी, निमाड़ी, नगोरी, कंगयम, हल्लीकर, डांगी, खलारी, बारगुरु, केनकाठा, सिरि, बाचौर, पोंवार, खेरीगढ़, मेवाती, आदि बैलों की जानी-मानी नस्लें हैं।

भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता और खाद्य सुरक्षा बड़े पैमाने पर छोटे और सीमांत किसानों (जो कुल भूमि जोत के 83 प्रतिशत हिस्से पर खेती करते हैं) के कंधों पर टिकी है। लघु और सीमांत किसान अधिकांशतः पशुधन के सहारे खेती करते हैं, जब कि बड़ी जोत वाले किसान ही प्रायः कृषि मशीनरी पर निर्भर हैं। आंकड़े बोलते हैं कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करने में कृषि का योगदान 32 प्रतिशत है, यानी लगभग एक-तिहाई।

अब कुछ गोमांस के बारे में। मांस उद्योग सबसे क्रूर जलवायु खलनायकों में से एक है, जो वायुमंडल में बहुत बड़े कार्बन पदचिह्न छोड़ रहा है। औद्योगिक युग की शुरुआत के बाद से जब दुनिया ने जीवाश्म ईंधन जलाना शुरू किया, हमने दुनिया को 0.8 डिग्री सेल्सियस तक गर्म कर दिया है। सीएनएन की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों के कारण सबसे बड़ा कार्बन पदचिह्न गोमांस के कारण होता है, जो बीन्स, मटर और सोयाबीन (शाकाहारी आहार) से बने आहार की तुलना में लगभग 60 गुना ज्यादा है। कहने की जरूरत नहीं कि गाय को भारत के सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक विकास का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाना चाहिए।
 
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