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साहित्य का मेला और लेखक अकेला: मेलों की चकाचौंध से सामाजिक यथार्थ तक

Wed, 14 Jan 2026 06:56 AM IST
नई दिल्ली Published by: श्यौराज सिंह बेचैन Updated Wed, 14 Jan 2026 06:56 AM IST
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सार
मेलों में विविध रंग हैं, लेकिन लेखक का वास्तविक प्राप्य क्या है? समाज के परिवर्तनकामी साहित्यिकों और नायकों के बीच कहीं कोई पुल है?
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Literary Fair and Lone Writer From Glitz of World Book Fair to Social Reality
विश्व पुस्तक मेला - फोटो : ANI

विस्तार

नए साल का आगाज विगत वर्षों की भांति, विश्व पुस्तक मेले से ही हो रहा है, जहां साहित्य और साहित्येतर विविध विषयों, रुचियों, विधाओं और अलग अनुशासनों की किताबें उपलब्ध हैं। मानवीय सरोकार रखने वाले ऐसे लेखक जो किसान नहीं हैं, पर किसानों पर लिखते हैं, मजदूर नहीं हैं, मजदूरों पर लिख रहे हैं, दलित-आदिवासी नहीं हैं, पर दलितों-स्त्रियों के मसलों पर लिख रहे हैं। साहित्योत्सवों और मेलों का यह बौद्धिक त्योहार विशाल देश की सांस्कृतिक विविधता के विकास के ही लक्षण दर्शाता है। और इसके पीछे होता है लेखक। जब वह सृजन के संसार में आता है, तो मेले और उत्सवों की जमीन का ऊर्जावान उत्पादक बन नए पौधें रोपता है और  ‘नई फसलें’ उगाता है।


इस संदर्भ में हाल ही में गुजर गए कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल के कथन और सृजन से दो विशेष बातें संज्ञान में आती हैं, उन्होंने कहा है, ‘लेखक अंततः अपने आप को ही व्यक्त करता है।’ इसका मतलब कोई, किसी अन्य का विकल्प नहीं है, मतलब हाशिये का लेखक, उपेक्षित धारा का हो या मुख्यधारा का सम्मानित लेखक, दोनों अपना-अपना पक्ष ही रख पाएंगे। साहित्य की समृद्धि विविधता की पूरकता के लिए शेष साहित्य का खालीपन अधिकता का साहित्य नहीं भर सकता। डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने इसी ओर इंगित किया है। श्री शुक्ल की एक कविता, जिसमें गांव के लोगों का जिक्र है कि जब वे किसी मेले-ठेले जाते हैं, तो हमेशा भीड़ में एकसाथ चलते हैं। वे समूह में ही जाते हैं, इकट्ठे बैठते हैं, और अगर कोई गाड़ी में चढ़ने से छूट जाता है, तो बाकी लोग उसे छोड़ कर आगे नहीं बढ़ते। गांव की आपसी सद्भावना का यह चित्रण पात्रों की वस्तुस्थिति को दर्शाने वाला एक आईना और एक ही तस्वीर है। यह सामाजिक विविधता की साझी संवेदना का चित्रण नहीं है।


भारत का कोई भी गांव एक समूह में सिमट कर नहीं रहता। लोग ऊंची-नीची जातियों के अलग-अलग समूहों में जी रहे होते हैं। उनकी सहानुभूति स्व-जातियों के लिए ही खास होती है। बड़ी जातियों का समूह पीछे छूटे अपने ही गांव के किसी अस्पृश्य का इंतजार कभी नहीं करता। धोखे से भी वह समूह में आ जाए, तो भी वे उसका स्वागत नहीं करते, अपितु उनके लिए वह दूध में आ गिरी मक्खी समान लगता है। वह दृश्य तो पौराणिक कथा में आए समुद्र मंथन के बाद निकले ‘विष-अमृत’ वितरण के वक्त देवताओं के बीच आ बैठे राहू-केतु के समान होता है। तो एक रूप-एक रस साहित्य में पूर्णता कैसे आए? भारत की सच्ची सामाजिक तस्वीर कौन बनाए?

जाहिर है विविधता किसी एक बिंब या एक तस्वीर से नहीं मिलेगी अथवा एक दर्पण सब रंगों को प्रतिबिंबित नहीं कर सकेगा। गांव-समाज में जितने सामाजिक समूह हैं, उनकी उतनी ही कथा-अभिव्यक्तियां हैं। साहित्य उत्सवों, मेलों और उन पाठकों को, जिन्हें अपनी-अपनी जिंदगियों के विविध रंग दिखेंगे, छोड़कर स्वयं लेखक का प्राप्य क्या है? इन मेले-ठेलों को आबाद करने वाला लेखक प्राण-हंस तो सब छोड़ कर उड़ जाता है। तो साहित्य से सधता क्या है? इसका प्रयोजन क्या है? क्या साहित्य क्रांति घटित करता है? जिसके लिए साहित्यकार  को मानपत्रों-पुरस्कारों से नवाजा जाता है। समाज के परिवर्तनकामी साहित्यिकों और नायकों के बीच कहीं कोई पुल है या उनकी मान्यताएं अलग-अलग ध्रुवों पर खड़ी होती हैं, क्रांति से किसका सरोकार है?

डॉ. आंबेडकर ने सौ साल पहले अपने एक लेख ‘क्रांति किसे कहते हैं?’ में विचारों-संस्कारों में क्रांति आना प्राथमिक माना था। सातवें दशक में साहित्यकारों ने सवाल उठाया था, ‘क्या जेपी का भी क्रांति से कुछ लेना-देना था? कमलेश्वर ने एक साक्षात्कार में कहा था, ‘जयप्रकाश नारायण (जेपी) की संपूर्ण क्रांति’ की परिकल्पना से भी हमारे समांतरवादी और मैं सहमत नहीं था, क्योंकि जेपी ने संप्रदायवादी शक्तियों को भी परिवर्तन का समर्थक माना था। फणीश्वरनाथ रेणु ने उनसे कहा था, ‘आप इस परिवर्तनकामी क्रांति के लिए हिंदी के नए लेखकों से मिलिए।’ इसलिए जेपी ने मुझे मिलने बुलाया था। मुलाकात में मैंने पूछा था, ‘आपकी संपूर्ण क्रांति की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूपरेखा क्या है? तो उनका उत्तर था, क्रांति, क्रांति होती है, किसी व्यक्ति के सवाल का जवाब नहीं होती।’ मैंने पाया कि इस संपूर्ण क्रांति का परिवर्तन और उसकी मूल्यगत अवधारणा का दलितों की मुक्ति की कामना से कोई लेना-देना नहीं था। इसमें परिवर्तन की बात एक भ्रम थी।’

आज समाज और साहित्य की विविधताएं, ज्ञान और अनुभव के परंपरागत उत्पाद के साथ हमें अपने जमाने का होशो-हवास रखने की जरूरत है। तकनीकी विज्ञान और सूचना क्रांति के नए-नए आयाम और फिर कृत्रिम मेधा की उपादेयता बहस तलब है। ‘एआई समिट  2026’ अगले माह ही भारत की मेजबानी में होने जा रहा है, जिसमें 20 देश शिरकत करेंगे। क्या साहित्य इससे निष्प्रभावी और स्वायत्त रह पाएगा? बेशक विचार मशीन पर निर्भरता से गुरेज करें, पर उपयोग से परहेज तो बिल्कुल नहीं चलेगा।        

-लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ प्रोफेसर हैं।
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