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किस की सुनें और किस की नहीं
अरुणेन्द्र नाथ वर्मा
Updated Tue, 18 Nov 2014 08:07 PM IST
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कई वर्षों से अमेरिका में रहने वाले एक मित्र दिल्ली आए, तो मैं उन्हें मेट्रो स्टेशन ले गया। लेकिन स्टेशन पर जबर्दस्त हंगामे का माहौल दिखा। पता चला कि दिल्ली की तेज-तर्रार युवा पीढ़ी स्टेशन पर खुलेआम चुंबन समारोह मनाने आई थी। उधर भारतीय संस्कृति की रक्षा को प्रतिबद्ध बहुत से संस्कृति पहरुए इन प्रदर्शनकारियों को पीटकर और उनके कपड़े फाड़कर देश की लाज बचाने पहुंचे थे। उन दोनों के बीच ‘आपके लिए सदा आपके साथ’ रहने का दावा करने वाली दिल्ली पुलिस अजीब पसोपेश में फंसी थी। दिल्ली पुलिस के सामने अजीब दुविधा थी कि किसका साथ दें और किसे रोकें-एक तरफ निजी स्वतंत्रता और दूसरी तरफ संस्कृति की रक्षा का सवाल था।
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मेरे मित्र थोड़ी देर तक तमाशा देखते रहे, फिर बोले, जब बॉलीवुड की फिल्मों में चुंबन की खुली छूट है, जिसे लोग आराम से बैठकर घरों में देखते हैं, तो स्टेशन की आपाधापी में उसे देखने की भला किसे फुर्सत होगी? फिर इस विशाल गणतंत्र में कुछ लोग अपने विचार और संस्कार दूसरों पर आखिर कैसे थोप सकते हैं? यदि भारत इसी राह पर चलता रहा, तो अगले किसी मोड़ पर जल्द ही उसकी मुलाकात तालिबान से भी हो जाएगी। मुझे उनकी बातें सही तो लगीं, मगर अपने संस्कारों के कारण थोड़ी अटपटी भी लगीं।
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मित्र ने मेरी दुविधा भांपकर कहा, इन दिनों देश भर में स्वच्छता का आंदोलन छिड़ा हुआ है। जगह-जगह शौचालय बनाए जा रहे हैं। अब परंपरावादी सोच को किसिंग में भी पिसिंग की तरह गंदगी दिखती है, तो सार्वजनिक शौचालय की तर्ज पर सार्वजनिक चुंबनालय क्यों नहीं बनवा देते? जब शहरों में माचिस की डिब्बियों जैसे घरों में बुजुर्गों के साथ रहने वाले युवाओं को अपने प्रेम का इजहार करने के लिए कहीं जगह ही न मिले, तो खुले मैदान में किस-किस को किस करने से रोका जा सकता है।
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मुझे लगा तर्क तो दोनों पक्षों के दमदार हैं। ऐसे में किसकी सुनें और किसकी न सुनें।